कविता

पर्यावरण

प्रकृति बचेगी तो मानव बचेगा,
नही तो धरा पर तांडव मचेगा।
जल और वायु होंगे जो दूषित,
मृत्यु से पहले नित मानव मरेगा।

फल फूल वृक्ष जो धरा पर न होंगे,
तितली भौंरे फिर धरा पर न होंगे।
न दिखेंगे परिंदे, न पशु पक्षी वन में,
तब इन्द्रधनुषी रंग धरा पर न होंगे।

बस बंजर ही बंजर, चहूँ ओर होगा,
मुश्किल में जीवन, मानव का होगा।
शीतल हवा, न कहीं जल मिलेगा,
सूरज का धरा पर, साम्राज्य होगा।

आओ मिलकर धरा को बचायें,
वृक्षों से धरा का आँचल सजायें।
विकास के लिए कुछ वृक्ष काटें,
एक के बदले पचास रोप आयें।

— डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन

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