कलम
कलम का सर कलम कर, सोचता सच दब गया,
घोप कर सीने में खंजर, तू सोचता सच मर गया?
हौसले मरते नही, कभी हौसलों को यूँ तोड़ने से,
सच उठेगा शक्ति संजोकर, सोचता सच डर गया।
कलम का काम लिखना, सच लिखो या झूठ हो,
मन कर्म चिन्तन मनन हो, सच लिखो या झूठ हो।
भावों का प्रवाह अगाध हो, राष्ट्र हित चिन्तन रहे,
कलम से लिखकर अमिट, सच लिखो या झूठ हो।
— डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन
