ग़ज़ल
— बहारों में, नज़ारों पर उतर जा
तू ख़ुशबू है फिज़ाओं में बिखर जा
किया है वा’दा गर तूने किसी से
गुज़रना भी पड़े हद से, गुज़र जा
ये माना छोड़ आया था कभी सब
भटकना छोड़ पर अब तो, तू घर जा
टिकी हैं आँखें चौखट पर पिता की
सुकूनो-चैन गर चाहे, उधर जा
मिलाता जा रहा है हाँ में हाँ क्यों ?
कभी तो अपने मन की कर, मुकर जा
— पूनम माटिया
