कविता

हरियाली धरती का श्रृंगार

पेड़ों से हरियाली है, और धरती का श्रृंगार है
चलो इसको सजाएं, आएगी इससे बहार है।

हरियाली जरूरी है, इसी से बेहतर जीवन है
जब होगी हरियाली, ये धरती बनेगी मधुबन है।

ये धरती चीख रही है, और अगाह कर रही है
अरे!मानव होश में आओ,ऐसे यह बता रही है।

अंधाधुन पेड़ों की कटाई से, मचा हाहाकार है
धरती दिनों-दिन तप रही, आ रही चित्कार है।

कोई चित्कार नही सुन रहा, करते मनमानी हैं
जल-जंगल सुख गये,नदी की यही कहानी है।

पेड़ों की पोषाकें,टहनीयों में तब्दील हो रही है
फल-फूल नदारद हुए,हवा बेफिजूल हो रही है।

पेड़ों से पंछियों का कुकना चहकना बंद हुई है
फिजाओं से संगीत का, घुलना अब बंद हुई है।

— अशोक पटेल “आशु”

*अशोक पटेल 'आशु'

व्याख्याता-हिंदी मेघा धमतरी (छ ग) M-9827874578

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