कविता

उदास

उदास होता हूँ
मन टूटा हो जब,
तब याद आता है
मेरे भीतर का वो आदमी
जो उछल-कूद करता था,
बिना शर्माए-घबराए, नाचता-खेलता था,
सबको खुश रखता,
कभी दुखी नहीं होता था।
जैसे-जैसे मैंने दुनिया को समझा,
वैसे-वैसे उस उल्लास का दम घुटता रहा।
आज जब सोचता हूँ उसके बारे में,
तो जान पाता हूँ—
वो मर गया।

— सुरेन्द्र कल्याण बुटाना

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना

करनाल, हरियाणा मो.: 8708889653 ईमेल: surenderkalyan007@gmail.com

Leave a Reply