Author: सुरेन्द्र कल्याण बुटाना

कविता

मनुष्य अपने ही विरुद्ध

मनुष्य नेसबसे पहलेदूसरों को नहीं,स्वयं को हराया।उसनेअपने ही हाथोंविश्वास का गला घोंटा,और फिरईश्वर सेसत्य माँगता रहा।वहलोहे सेशहर बनाता रहा,परअपने भीतरएक

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