हाथों में किताबें, राह में दलदल
हाथों में किताबें, आँखों में उजियारा,
पर राह में फैला कीचड़ इतना सारा।
नन्हें-नन्हें कदमों का यह कैसा सफ़र,
हर मोड़ पे है ठहरा विकास बेअसर।
कंधों पे बस्ता, मन में दौड़ते अरमान,
फिर भी ‘मुश्किलों’ से होती पहचान।
जहाँ सड़क होनी थी, वहाँ दलदल है,
बचपन का हर कदम आज घायल है।
कहते हैं शिक्षा से बदलता रहा हैं देश,
फिर क्यों बच्चों को मिले संघर्ष शेष?
क्या यही ‘तरक्की’, क्या यही विकास,
जब राह बन जाए प्रतिदिन का त्रास?
आओ मिल के हम ऐसी तस्वीर बदलें,
हर गाँव की राहों को पक्की सड़क दें।
शिक्षा बने सचमुच सभी का अधिकार,
ताकि हरेक बच्चे के सपने हों साकार।
— संजय एम तराणेकर
