सामाजिक

हर बच्चा भविष्य का पृष्ठ : लेकिन हम पन्ने भर रहे हैं या लिख रहे हैं?

हर जन्म नई संभावना लेकर आता है, लेकिन हर संभावना उपलब्धि में नहीं बदलती। यही प्रश्न विश्व जनसंख्या दिवस हमारे सामने खड़ा करता है। किसी भी राष्ट्र का भविष्य जनगणना की तालिकाओं में नहीं, बल्कि उन चेहरों में लिखा होता है जिन्हें हम अक्सर केवल संख्या मान लेते हैं। एक नवजात शिशु किसी परिवार का नया सदस्य भर नहीं, बल्कि देश के भविष्य का पहला पृष्ठ होता है। विडंबना यह है कि उस पृष्ठ पर भविष्य लिखने की तैयारी किए बिना हम हर वर्ष नई प्रतियां जोड़ते जा रहे हैं। इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि भारत में कितने लोग हैं, बल्कि यह है कि उनमें कितनी संभावनाओं को अवसर मिला और कितनों को परिस्थितियों के भरोसे छोड़ दिया।

आज भारत 1.47 अरब से अधिक लोगों के साथ दुनिया का सबसे बड़ा जनसमूह है। इसे केवल भीड़ कहना उतनी ही बड़ी भूल होगी, जितनी बिना तैयारी के इसे शक्ति मान लेना। संख्या न वरदान है, न अभिशाप; वह केवल संभावनाओं का भंडार है, जिसका मूल्य इस बात से तय होता है कि राष्ट्र उसकी ऊर्जा को किस दिशा में ले जाता है। भारत की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। अनेक विकसित देश घटती जन्म दर और वृद्ध होती आबादी की चुनौती से जूझ रहे हैं, जबकि हमारे पास युवा शक्ति का अवसर है, जो इतिहास बार-बार नहीं देता। किंतु अवसर तभी उपलब्धि बनता है, जब उसके पीछे दूरदर्शी व्यवस्था हो। केवल युवाओं की संख्या से राष्ट्र समृद्ध नहीं होता; शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और रोजगार का सुदृढ़ आधार भी उतना ही आवश्यक है।

यहीं सबसे बड़ी विडंबना है। युवाओं की ऊर्जा प्रचुर है, लेकिन उसे दिशा देने वाली व्यवस्था अब भी अपेक्षाओं से पीछे है। शिक्षा डिग्री दे रही है, दक्षता नहीं; स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं, पर समान नहीं; रोजगार की आकांक्षाएं बढ़ रही हैं, लेकिन अवसर उसी गति से नहीं। परिणामस्वरूप युवा निराशा, असुरक्षा और दिशाहीनता के बीच अपने महत्वपूर्ण वर्ष गंवा देते हैं। यह केवल व्यक्तिगत नहीं, राष्ट्रीय हानि है। जिस ऊर्जा से नवाचार, अनुसंधान, उद्योग और सामाजिक परिवर्तन संभव थे, वही बेरोजगारी, पलायन और असंतोष में बदल जाती है। जनसंख्या का वास्तविक संकट यहीं से प्रारंभ होता है।

अब समय है कि बहस जनसंख्या नियंत्रण से आगे बढ़कर जनसंख्या की गुणवत्ता पर केंद्रित हो। किसी बच्चे का जन्म केवल जैविक घटना नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। उसे स्वस्थ शरीर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक कौशल और सम्मानजनक अवसर देना ही वास्तविक परिवार नियोजन है। शहरों में महंगाई और करियर की चुनौतियों ने बच्चों का पालन-पोषण महंगी जिम्मेदारी बना दिया है, वहीं गांवों में अवसरों का अभाव युवाओं को शहरों की ओर धकेल रहा है। परिणामस्वरूप गांव खाली हो रहे हैं और शहर अनियोजित विस्तार व भीड़ के दबाव से जूझ रहे हैं। इसलिए जनसंख्या नीति का संबंध केवल जन्म दर से नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, रोजगार और संतुलित क्षेत्रीय विकास से होना चाहिए। तभी हर नया नागरिक देश की संपत्ति बनेगा, बोझ नहीं।

आज का युवा जीवित रहने के लिए नहीं, बल्कि सम्मानजनक और सार्थक जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है। उसकी आकांक्षाओं में अच्छी नौकरी, सुरक्षित भविष्य, स्वच्छ पर्यावरण, समान अवसर, नवाचार और व्यक्तिगत विकास शामिल हैं। यदि ये अपेक्षाएं अधूरी रहीं तो आने वाले वर्षों में जन्म दर स्वाभाविक रूप से प्रभावित होगी और हमारे सामने भी वही स्थिति आ सकती है, जिससे आज कई विकसित राष्ट्र गुजर रहे हैं। इसलिए विश्व जनसंख्या दिवस का संदेश परिवार नियोजन तक सीमित नहीं रह सकता। इसे युवा सशक्तिकरण, लैंगिक समानता, महिला शिक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा और सतत विकास के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ना होगा। जब प्रत्येक युवा अपनी क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ सकेगा, तभी जनसंख्या राष्ट्रीय संपदा बनेगी।

पर्यावरण और संसाधनों को लेकर हमारी सोच भी बदलनी होगी। यह कहना आसान है कि बढ़ती आबादी संसाधनों पर दबाव बढ़ा रही है, किंतु यह आधा सत्य है। वास्तविक प्रश्न यह है कि उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कैसे हो रहा है। असंतुलित उपभोग, अपव्यय और विकास की असमान शैली कई बार जनसंख्या से अधिक नुकसान पहुंचाती है। यदि तकनीक, नवाचार, नवीकरणीय ऊर्जा, स्मार्ट शहर, आधुनिक कृषि और संसाधनों के विवेकपूर्ण प्रबंधन को प्राथमिकता मिले, तो बड़ी आबादी भी सतत विकास की साझेदार बन सकती है। केवल जनसंख्या को दोष देकर नीतिगत कमजोरियों और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्ति नहीं मिल सकती।

भारत जैसा विविधताओं से भरा देश एक जैसी नीति से नहीं चल सकता। अलग-अलग राज्यों, क्षेत्रों, संस्कृतियों और आर्थिक परिस्थितियों की अपनी चुनौतियां हैं। इसलिए जनसंख्या प्रबंधन स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप लचीला होना चाहिए। शिक्षा में निवेश, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, कौशल विकास और रोजगार सृजन—यही भविष्य के भारत के आधार स्तंभ हैं। इतिहास साक्षी है कि जब भी भारतीय मानव संसाधन को सही दिशा मिली, उसने असंभव को संभव बनाया। स्वतंत्रता आंदोलन से सूचना प्रौद्योगिकी और स्टार्टअप क्रांति तक हर उपलब्धि के पीछे संख्या नहीं, बल्कि प्रशिक्षित और प्रेरित मानव शक्ति ही निर्णायक रही है।

विश्व जनसंख्या दिवस हमें नई दृष्टि अपनाने का अवसर देता है। हमें लोगों की गिनती से आगे बढ़कर उनमें छिपी संभावनाओं को पहचानना होगा। देश की सबसे बड़ी पूंजी उसके खनिज, इमारतें या बजट नहीं, बल्कि उसके नागरिक होते हैं। यदि हर बच्चे की शिक्षा में निवेश होगा, हर युवा को अवसर मिलेगा, हर महिला सुरक्षित और सशक्त होगी तथा हर क्षेत्र संतुलित विकास का सहभागी बनेगा, तो भारत केवल दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि सक्षम, समृद्ध और प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में पहचाना जाएगा। तब विश्व जनसंख्या दिवस केवल औपचारिक तिथि नहीं रहेगा, बल्कि उस राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक बनेगा, जिसमें हर जन्म को बढ़ती संख्या नहीं, भविष्य की संभावना माना जाएगा।

— कृति आरके जैन

कृति आरके जैन

बड़वानी (मप्र) संपर्क: 79992 40375 ईमेल: kratijainemail@gmail.com

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