सामाजिक

एक बार चिन्तन आवश्यक है

दिनाँक 14 अप्रेल, 2026 को दैनिक नवज्योति समाचार-पत्र के पृष्ठ संख्या 11 में व्हाट्सअप पर ‘‘खूब चला’’ शीर्षक के अर्न्तगत प्रकाशित समाचार ‘‘कब सुधरेंगे हम?’’ में एक व्यंग्य पढ़ने को मिला। उस समाचार को पढ़ कर हंसी भी आई लेकिन कहीं-न-कहीं जो बात उसमें लिखी थी वह चिन्तनीय भी थी। उसमें यह था कि यदि किसी की मृत्यु हो जाए तो उसके तीसरे दिन (तीये/उठावनें) की बैठक में शोक संतृप्त परिवार को सांत्वना देने के लिए समाज के लोगों के अलावा बहुत सारे जान-पहचान वाले भी आते हैं। उनमें से कुछ अपने साथ संवेदनाएँ-पत्र भी लाते हैं। वे पत्र सिर्फ उसी परिवार को सांत्वना देने के लिए ही होते हैं जिनके घर में शोक हुआ हो।
अभी हॉल ही में एक तीये की बैठक में जाना पड़ा। वहाँ भी शोक संतृप्त परिवार को समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों, संस्थाओं, प्रतिष्ठानों एवं ट्रस्टों द्वारा बहुत सारे संवेदना-पत्र प्राप्त हुए। उन सभी संवेदना-पत्रों को वहाँ पर उपस्थित परिवारजनों, सगे-सम्बन्धियों, जान-पहचान वालांे तथा समाज के पुरुष एवं महिलाओं के बीच सबके सामने पढ़े गये। संवेदना-पत्र देना गलत नहीं है। संवेदना-पत्रों का सार सिर्फ एक ही होता है कि परमपिता परमेश्वर उस दिवंगत महान् आत्मा को शान्ति प्रदान करें तथा अपने श्रीचरणों में स्थान दें। साथ ही उस शोक संतृप्त परिवार को उन पर बीते दुःख की घड़ी को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
संवेदना पत्रों को सुनने के बाद ऐसा लगा कि जिस किसी ने भी अपने-अपने पत्र उस परिवार को दिये, उन्हें उस शोकाकुल परिवार के प्रति साहनुभूति तो है और वे स्वयं उस शोक सभा में उपस्थित भी है। फिर भी अपने नाम से, अपनी संस्था के नाम से संवेदना-पत्र देते हैं। इन सबके पीछे जो मकसद उनका नजर आया कि वे सिर्फ अपना नाम, अपनी संस्था के पदाधिकारियों के नाम अथवा प्रतिष्ठान का नाम उपस्थित भीड़ को सुनाना चाहते हैं।
यदि वाकई में आपको उस परिवार के प्रति संवेदना है तो स्वयं तथा अपनी संस्था के पदाधिकारियों को साथ में लेकर शोकाकुल परिवार के घर पर उपस्थित होकर उन्हें देकर आए तथा कुछ समय उनके पास बैठे। उनको भी लगें कि सही माइने में आपको उनके प्रति संवेदना हैं। क्योंकि बैठक का समय तो निश्चित होता है। इससे अच्छा तो यह होगा कि किसी आध्यात्मिक गुरु (प्रवचनाकार) को वहाँ पर बुलाकर उससे आत्मा एवं मोक्ष के बारे में प्रवचन सुना जाए। और यदि सभी संवेदना-पत्रों को उपस्थित भीड़ के सामने पढ़ना इतना ही आवश्यक है तो सिर्फ और सिर्फ देने वाले का नाम तथा देने वाली संस्था का नाम ही पढ़ा जाए ताकि समय की बचत हो सके।
हाँ, एक बात और जो वहाँ देखने को मिली वो मुझे थोड़ी सी अजीब लगी की शोक सभा में उपस्थित महानुभावों में से कईयों को तो किसी से मिलना था तो वह वहाँ आ गया, कईयों को बैठक के पश्चात् उस क्षेत्र में अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ जाना था। इससे भी अजीब बात यह दिखी कि उनमें से कई तो अपने बच्चों के रिश्तें कराने की जानकारी भी वहीं से प्राप्त कर लेते हैं। यह सब हम सभी वहां उपस्थित रहकर महसूस करते भी हैं। इस चिन्तन से यदि किसी को कोई बात बुरी लगी हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ।

— राजीव नेपालिया (माथुर)

राजीव नेपालिया

401, ‘बंशी निकुंज’, महावीरपुरम् सिटी, चौपासनी जागीर, चौपासनी फनवर्ल्ड के पीछे, जोधपुर-342008 (राज.), मोबाइल: 98280-18003

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