सामाजिक

बिच्छू के स्वभाव को बदलने की कोशिश व्यर्थ

​यदि आप कभी यह सुनें कि कोई विशाल पर्वत अपनी जगह से हिल गया है, तो आप उस पर विश्वास कर सकते हैं, क्योंकि प्रकृति में ऐसी भौगोलिक घटनाएं संभव हैं, लेकिन यदि कोई आपसे यह कहे कि किसी व्यक्ति का मूल स्वभाव या उसकी फ़ितरत पूरी तरह बदल गई है, तो उस पर कभी भरोसा मत करना, क्योंकि इंसान अपनी आदतें तो बदल सकता है, लेकिन अपनी मूल फितरत को कभी नहीं बदल सकता। नीतिशास्त्र और लोककथाओं में इसी बात को समझाने के लिए एक बेहद सटीक उदाहरण अक्सर सुनने को मिलता है कि बिच्छू का स्वभाव डंक मारना है, चाहे आप उसे कितनी भी मखमली जगह पर क्यों न रख दें। यह मात्र एक कहावत नहीं, बल्कि मानव व्यवहार और प्रकृति के एक कड़वे सच को उजागर करता हुआ एक गहरा जीवन-दर्शन है, जिसे समझे बिना हम अक्सर व्यावहारिक जीवन में धोखा खा जाते हैं। इस बात की गहराई को समझने के लिए हमें सबसे पहले आदत और फ़ितरत यानी स्वभाव के महीन अंतर को समझना होगा; आदत वह व्यवहार या कार्य है जिसे कोई भी व्यक्ति बार-बार दोहराकर, अपने माहौल, मजबूरी या ज़रूरत के हिसाब से सीखता है और इसे समय, प्रयास तथा इच्छाशक्ति से बदला जा सकता है, जैसे देर से सोकर उठने वाला व्यक्ति यदि ठान ले, तो वह सुबह जल्दी उठने की आदत डाल सकता है, या कोई अनुशासनहीन व्यक्ति अभ्यास से अनुशासित हो सकता है। इसके विपरीत, फितरत या स्वभाव इंसान का वह मूल तत्व है जिसके साथ वह पैदा होता है और जो उसके चरित्र की सबसे गहरी परतों में समाया होता है, जिसे बदलना लगभग असंभव होता है। बुजुर्गों द्वारा पहाड़ के हिलने का उदाहरण देना यह दर्शाता है कि भौतिक रूप से जो चीज नामुमकिन लगती है, वह भी किसी बड़े भूकंप या प्राकृतिक उथल-पुथल से मुमकिन हो सकती है, लेकिन किसी इंसान के आंतरिक चरित्र का बुनियादी रूप से बदल जाना इस भौतिक चमत्कार से भी ज्यादा दुर्लभ है। हम अक्सर सोचते हैं कि किसी जीव या व्यक्ति को अगर बेहतर सुविधाएं, प्रेम और मखमली परिवेश दिया जाए, तो उसके भीतर का संताप या नकारात्मकता खत्म हो जाएगी, लेकिन बिच्छू के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि परिवेश केवल बाहरी आवरण को बदल सकता है, आंतरिक प्रवृत्ति को नहीं, क्योंकि मख़मल भले ही आराम, विलासिता और सुरक्षा का प्रतीक हो, पर एक बिच्छू के लिए उस मखमल के कोई मायने नहीं हैं और उसका डंक मारना कोई सोची-समझी साजिश या गुस्सा नहीं, बल्कि उसका मूलभूत आत्मरक्षा तंत्र और स्वभाव है। अक्सर लोग अपने किसी तात्कालिक लाभ, स्वार्थ, डर या किसी विशेष परिस्थिति के कारण कुछ समय के लिए अपने व्यवहार और आदतों को बदल लेते हैं, जिससे सामने वाले को यह भ्रम हो जाता है कि वह व्यक्ति पूरी तरह सुधर गया है या बदल गया है, परंतु जैसे ही वह अनुकूल परिस्थिति या स्वार्थ समाप्त होता है और व्यक्ति पर से दबाव हटता है, उसकी असली फितरत दोबारा पूरी तीव्रता के साथ बाहर आ जाती है। इस आलेख का मुख्य उद्देश्य बिच्छू की जीवविज्ञान को समझना नहीं, बल्कि इसके बहाने इंसानी फ़ितरत को टटोलना है, क्योंकि हमारे आस-पास भी ऐसे कई लोग होते हैं जिनका स्वभाव दूसरों को नुकसान पहुँचाना, ईर्ष्या करना या धोखा देना होता है, और आप उन्हें कितना भी सम्मान दें, प्रेम दें या उनके लिए मखमली बिछौना बिछा दें, लेकिन अगर उनकी फ़ितरत में ‘डंक मारना’ लिखा है, तो वे अपने पहले अवसर पर आपको चोट ज़रूर पहुँचाएंगे। ऐसे लोगों को सुधारने के भ्रम में अक्सर सीधे और संवेदनशील लोग अपना ही नुक़सान कर बैठते हैं, इसलिए यह समझना ज़रूरी है कि हर किसी को बदला नहीं जा सकता। यह विचार हमें हमारे दैनिक जीवन और सामाजिक रिश्तों को लेकर एक बहुत बड़ी सीख देता है और सचेत करता है कि किसी भी व्यक्ति के तात्कालिक अच्छे व्यवहार या दिखावे में आकर हमें उस पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए, विशेषकर तब जब उस व्यक्ति का इतिहास अतीत में धोखा देने या नुकसान पहुंचाने का रहा हो। जब हम इस सच को स्वीकार कर लेते हैं कि हम किसी दूसरे की फ़ितरत को नहीं बदल सकते, तो हम दूसरों से अनावश्यक और अत्यधिक उम्मीदें लगाना छोड़ देते हैं, जिससे हम मानसिक रूप से सुरक्षित रहते हैं और यह समझ हमें जीवन में मिलने वाले कई मानसिक आघातों, धोखों और निराशाओं से बचाती है। इसके साथ ही, यह कथन हमें आत्म-निरीक्षण की प्रेरणा भी देता है कि हम स्वयं अपने भीतर झांकें और यह सुनिश्चित करें कि हमारी फ़ितरत में कोई ऐसी बुराई न हो जो दूसरों को ठेस पहुंचाए, तथा हम हमेशा अपनी आदतों को अच्छाई की ओर मोड़ते रहें। अंततः, बिच्छू को मखमल पर रखने से न तो मख़मल की कीमत कम होती है और न ही बिच्छू का ज़हर बदलता है, इसलिए समझदारी इसी में है कि हम बिच्छू के स्वभाव को बदलने की व्यर्थ कोशिश में अपना समय और ऊर्जा बर्बाद न करें, बल्कि संसार में शांति से जीने के लिए लोगों को उनकी वास्तविक फ़ितरत के साथ पहचानना सीखें, अच्छे लोगों का सम्मान करें और जिनके स्वभाव में नुक़सान पहुंचाना शामिल हो, उनसे एक सुरक्षित और समझदारी भरी दूरी बनाए रखते हुए ख़ुद को उनके डंक से बचाकर जीवन में आगे बढ़ें।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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