सामाजिक

शहरों में पैदल चलने का अधिकार या संघर्ष? 

भारत के शहर तेजी से बदल रहे हैं। चौड़ी सड़कों, ऊँचे फ्लाईओवरों, एक्सप्रेस-वे, मेट्रो नेटवर्क और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं को आधुनिक विकास का प्रतीक माना जा रहा है। लेकिन इस चमकदार विकास के बीच एक बुनियादी प्रश्न लगातार उपेक्षित रहा है—क्या हमारे शहर इंसानों के लिए बने हैं या केवल वाहनों के लिए? क्या एक नागरिक को सुरक्षित, सम्मानजनक और सुविधाजनक ढंग से पैदल चलने का अधिकार वास्तव में उपलब्ध है?

‘राइट टू वॉक’ (Right to Walk) केवल परिवहन का मुद्दा नहीं है, बल्कि आधुनिक शहरी परिदृश्यों में स्थानिक न्याय (Spatial Justice), सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा का गंभीर प्रश्न है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सार्वजनिक स्थानों पर समान अधिकार प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सड़क पर सुरक्षित रूप से पैदल नहीं चल सकता, तो यह केवल यातायात की समस्या नहीं बल्कि उसके नागरिक अधिकारों के सीमित होने का संकेत है।

भारत में करोड़ों लोग आज भी अपनी दैनिक यात्राओं का बड़ा हिस्सा पैदल तय करते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएँ, दिव्यांगजन, मजदूर, छोटे दुकानदार और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने वाले अधिकांश लोग किसी न किसी चरण में पैदल ही चलते हैं। इसके बावजूद हमारी शहरी योजना में पैदल यात्रियों को सबसे कम प्राथमिकता दी जाती है। फुटपाथ या तो हैं ही नहीं, या अतिक्रमण से घिरे हैं, या उनकी स्थिति इतनी खराब है कि लोग मजबूर होकर सड़क पर चलने लगते हैं। परिणामस्वरूप सड़क दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या पैदल यात्रियों की होती है।

विडंबना यह है कि जिन लोगों के पास निजी वाहन नहीं हैं, वही सबसे अधिक जोखिम उठाते हैं। जिनके पास कार है, उनके लिए चौड़ी सड़कें बनती हैं; जिनके पास वाहन नहीं, उनके लिए सुरक्षित फुटपाथ भी उपलब्ध नहीं। यह असमानता केवल आर्थिक नहीं बल्कि स्थानिक अन्याय का उदाहरण है।

स्थानिक न्याय का अर्थ है कि शहर के सार्वजनिक संसाधनों, स्थानों और सुविधाओं पर सभी नागरिकों का समान अधिकार हो। यदि शहर का अधिकांश सार्वजनिक स्थान वाहनों को समर्पित कर दिया जाए और पैदल चलने वालों, साइकिल चालकों तथा दिव्यांगजनों के लिए पर्याप्त व्यवस्था न हो, तो यह सार्वजनिक स्थानों के असमान वितरण को दर्शाता है।

भारतीय शहरों की अधिकांश सड़कें वाहन-केंद्रित सोच के साथ विकसित हुई हैं। यातायात प्रबंधन का प्रमुख उद्देश्य वाहनों की गति बढ़ाना माना जाता है, जबकि सड़क का वास्तविक उद्देश्य लोगों को सुरक्षित रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाना होना चाहिए। यही कारण है कि कहीं फुटपाथ अचानक समाप्त हो जाते हैं, कहीं बिजली के खंभे, ट्रांसफार्मर या ठेले उनके बीच खड़े मिलते हैं, तो कहीं पार्किंग ने पूरी जगह घेर रखी होती है।

महिलाओं के लिए सुरक्षित पैदल मार्ग केवल सुविधा नहीं बल्कि स्वतंत्रता का प्रश्न है। यदि किसी महिला को शाम के समय अंधेरे, सुनसान अथवा टूटी हुई सड़क से गुजरना पड़े तो उसकी आवाजाही सीमित हो जाती है। इसी प्रकार बुजुर्गों के लिए ऊँचे फुटपाथ, बिना रैंप के क्रॉसिंग और तेज रफ्तार यातायात गंभीर बाधाएँ उत्पन्न करते हैं। दिव्यांगजन तो अनेक बार सार्वजनिक स्थानों का उपयोग ही नहीं कर पाते।

यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDGs) समावेशी, सुरक्षित और सुलभ शहरों पर विशेष बल देते हैं। शहर तभी समावेशी कहलाएँगे जब प्रत्येक नागरिक—चाहे उसकी आय, आयु, लिंग या शारीरिक क्षमता कुछ भी हो—समान सम्मान के साथ सार्वजनिक स्थानों का उपयोग कर सके।

आज शहरी विकास में एक बड़ी विडंबना यह है कि विकास का मूल्यांकन प्रायः इस आधार पर किया जाता है कि सड़क पर कितनी तेजी से वाहन चल सकते हैं। जबकि किसी भी विकसित शहर का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि वहाँ पैदल चलना कितना सुरक्षित, आरामदायक और सहज है।

विश्व के अनेक देशों ने पिछले वर्षों में ‘वॉकेबल सिटी’ की अवधारणा को अपनाया है। उन्होंने महसूस किया कि अत्यधिक वाहन-निर्भरता प्रदूषण, ऊर्जा संकट, मानसिक तनाव, सड़क दुर्घटनाओं और सामाजिक अलगाव को बढ़ाती है। इसके विपरीत पैदल चलने योग्य शहर स्वास्थ्य, पर्यावरण, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक संवाद को मजबूत करते हैं।

जब लोग पैदल चलते हैं तो स्थानीय बाजारों में अधिक खरीदारी करते हैं, छोटे व्यवसायों को लाभ मिलता है, सामुदायिक संबंध मजबूत होते हैं और शहर अधिक जीवंत बनते हैं। पैदल चलना सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी है। नियमित पैदल चलना मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी अनेक जीवनशैली संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम करता है। यदि शहर लोगों को पैदल चलने के लिए प्रेरित करें तो स्वास्थ्य पर होने वाला सार्वजनिक व्यय भी कम हो सकता है।

पर्यावरणीय दृष्टि से भी ‘राइट टू वॉक’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत के अधिकांश बड़े शहर वायु प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन और ट्रैफिक जाम की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। यदि छोटी दूरी की यात्राओं के लिए लोग पैदल चलने लगें तो ईंधन की खपत कम होगी, प्रदूषण घटेगा और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में भी सहायता मिलेगी।

स्मार्ट सिटी की अवधारणा केवल डिजिटल तकनीक या निगरानी प्रणाली तक सीमित नहीं होनी चाहिए। वास्तविक स्मार्ट सिटी वह है जहाँ बच्चा सुरक्षित स्कूल जा सके, बुजुर्ग बिना भय के पार्क तक पहुँच सके, महिला रात में भी आत्मविश्वास के साथ चल सके और दिव्यांग व्यक्ति बिना किसी बाधा के सार्वजनिक स्थानों का उपयोग कर सके।

भारत में सड़क सुरक्षा की चुनौती भी ‘राइट टू वॉक’ से गहराई से जुड़ी हुई है। तेज गति, अवैध पार्किंग, अतिक्रमण, अव्यवस्थित ट्रैफिक और पैदल पारपथों की कमी प्रतिवर्ष हजारों लोगों की जान लेती है। अनेक दुर्घटनाएँ केवल इसलिए होती हैं क्योंकि लोगों को सड़क पार करने के लिए सुरक्षित व्यवस्था उपलब्ध नहीं होती।

शहरों में अक्सर देखा जाता है कि फुटओवर ब्रिज या सबवे तो बनाए जाते हैं, लेकिन उनकी उपयोगिता, दूरी और पहुँच का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा जाता। कई बार बुजुर्ग, महिलाएँ या दिव्यांगजन उनका उपयोग नहीं कर पाते और मजबूर होकर सड़क पार करते हैं। इसलिए केवल संरचना बना देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे मानव-केंद्रित बनाना आवश्यक है।

राइट टू वॉक सामाजिक न्याय से भी जुड़ा हुआ है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग सार्वजनिक परिवहन और पैदल यात्रा पर अधिक निर्भर रहता है। यदि शहर पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित नहीं होंगे तो सबसे अधिक नुकसान इन्हीं वर्गों को होगा। दूसरी ओर निजी वाहन रखने वाले अपेक्षाकृत सुरक्षित और सुविधाजनक यात्रा कर पाएँगे। इस प्रकार शहरी ढाँचा अनजाने में सामाजिक असमानताओं को और गहरा कर देता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सड़कों की योजना बनाते समय पैदल यात्रियों को प्राथमिक उपयोगकर्ता माना जाए। फुटपाथ पर्याप्त चौड़े, समतल, बाधा-मुक्त और निरंतर होने चाहिए। प्रत्येक प्रमुख चौराहे पर सुरक्षित ज़ेब्रा क्रॉसिंग, ट्रैफिक सिग्नल, रैंप, टैक्टाइल पाथ और दिव्यांग-अनुकूल सुविधाएँ अनिवार्य बनाई जानी चाहिए। सड़क किनारे अवैध पार्किंग और अतिक्रमण पर प्रभावी नियंत्रण भी उतना ही आवश्यक है।

शहरी स्थानीय निकायों को प्रत्येक सड़क परियोजना के साथ ‘पैदल प्रभाव आकलन’ (Pedestrian Impact Assessment) जैसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नई सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं बल्कि नागरिकों के लिए बन रही हैं। नगर नियोजन में ‘कम्प्लीट स्ट्रीट्स’ (Complete Streets) की अवधारणा को व्यापक रूप से अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें पैदल यात्री, साइकिल चालक, सार्वजनिक परिवहन और मोटर वाहन—सभी के लिए संतुलित स्थान सुनिश्चित किया जाता है।

विद्यालयों, बाजारों, अस्पतालों और सार्वजनिक संस्थानों के आसपास विशेष ‘पैदल सुरक्षा क्षेत्र’ विकसित किए जाने चाहिए, जहाँ वाहनों की गति सीमित हो और पैदल यात्रियों को प्राथमिकता मिले। बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल मार्ग, महिलाओं के लिए बेहतर प्रकाश व्यवस्था और बुजुर्गों के लिए आरामदायक बैठने की व्यवस्था जैसे छोटे कदम भी शहरों को अधिक मानवीय बना सकते हैं।

साथ ही नागरिकों के व्यवहार में भी परिवर्तन आवश्यक है। फुटपाथ पर वाहन खड़े करना, ज़ेब्रा क्रॉसिंग पर गाड़ी रोकना, पैदल यात्रियों को रास्ता न देना और तेज गति से वाहन चलाना केवल यातायात नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि दूसरे नागरिकों के अधिकारों का हनन है। सड़क साझा सार्वजनिक स्थान है, जहाँ हर व्यक्ति का समान अधिकार है।

अंततः ‘राइट टू वॉक’ किसी विलासिता की माँग नहीं है। यह जीवन, समानता, गरिमा, सुरक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ा एक मूलभूत नागरिक अधिकार है। यदि शहर केवल कारों के लिए विकसित होंगे तो वे आर्थिक रूप से भले आधुनिक दिखें, लेकिन सामाजिक रूप से असमान और मानवीय दृष्टि से अधूरे रहेंगे।

एक सभ्य और संवेदनशील शहर की पहचान उसकी सबसे चौड़ी सड़क या सबसे ऊँची इमारत नहीं होती, बल्कि यह होती है कि वहाँ सबसे कमजोर नागरिक कितनी सुरक्षा, सहजता और सम्मान के साथ पैदल चल सकता है। इसलिए समय आ गया है कि शहरी विकास की दिशा वाहन-केंद्रित सोच से हटकर मानव-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर बढ़े। क्योंकि जब हर नागरिक बिना भय, बिना बाधा और बिना भेदभाव के चल सकेगा, तभी लोकतंत्र का सार्वजनिक स्थान वास्तव में सबका होगा और ‘राइट टू वॉक’ केवल एक नारा नहीं बल्कि जीवंत वास्तविकता बन सकेगा।

— डॉ. सत्यवान सौरभ

*डॉ. सत्यवान सौरभ

✍ सत्यवान सौरभ, जन्म वर्ष- 1989 सम्प्रति: वेटरनरी इंस्पेक्टर, हरियाणा सरकार ईमेल: satywanverma333@gmail.com सम्पर्क: परी वाटिका, कौशल्या भवन , बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045 मोबाइल :9466526148,01255281381 *अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों भाषाओँ में समान्तर लेखन....जन्म वर्ष- 1989 प्रकाशित पुस्तकें: यादें 2005 काव्य संग्रह ( मात्र 16 साल की उम्र में कक्षा 11th में पढ़ते हुए लिखा ), तितली है खामोश दोहा संग्रह प्रकाशनाधीन प्रकाशन- देश-विदेश की एक हज़ार से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशन ! प्रसारण: आकाशवाणी हिसार, रोहतक एवं कुरुक्षेत्र से , दूरदर्शन हिसार, चंडीगढ़ एवं जनता टीवी हरियाणा से समय-समय पर संपादन: प्रयास पाक्षिक सम्मान/ अवार्ड: 1 सर्वश्रेष्ठ निबंध लेखन पुरस्कार हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी 2004 2 हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड काव्य प्रतियोगिता प्रोत्साहन पुरस्कार 2005 3 अखिल भारतीय प्रजापति सभा पुरस्कार नागौर राजस्थान 2006 4 प्रेरणा पुरस्कार हिसार हरियाणा 2006 5 साहित्य साधक इलाहाबाद उत्तर प्रदेश 2007 6 राष्ट्र भाषा रत्न कप्तानगंज उत्तरप्रदेश 2008 7 अखिल भारतीय साहित्य परिषद पुरस्कार भिवानी हरियाणा 2015 8 आईपीएस मनुमुक्त मानव पुरस्कार 2019 9 इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ रिसर्च एंड रिव्यु में शोध आलेख प्रकाशित, डॉ कुसुम जैन ने सौरभ के लिखे ग्राम्य संस्कृति के आलेखों को बनाया आधार 2020 10 पिछले 20 सालों से सामाजिक कार्यों और जागरूकता से जुडी कई संस्थाओं और संगठनों में अलग-अलग पदों पर सेवा रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 9466526148 (वार्ता) (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) 333,Pari Vatika, Kaushalya Bhawan, Barwa, Hisar-Bhiwani (Haryana)-127045 Contact- 9466526148, 01255281381 facebook - https://www.facebook.com/saty.verma333 twitter- https://twitter.com/SatyawanSaurabh

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