अँगूठे पर अभिमान
अभी अँगूठे का ही जमाना है। पहले लोगों को ऊँगली या अँगूठा दिखा दो तो लोग लाठियाँ निकाल लेते थे। पुराने समय में किसी को अँगूठा दिखाना का अर्थ था कि आप उसका मखौल या मजाक उड़ा रहे हैं। मजाक- मजाक में लोगों की पहले अँगूठा दिखाने पर दाँत मुँह टूट जाते थे। आज के जमाने में लोग जब तक सुबह शाम किसी कि पोस्ट पर अँगूठा नहीं लगा देते। तब तक उनको चैन नहीं पड़ता। दिन भर बस एक लाईक के लिए या एक अँगूठे के लिए वो बेकरारी से मरते हैं। वो इंतजार करते हैं। अपनी पोस्ट पर लागू अँगूठों को देखने के लिए। तो जो अभी जमाना जो है वो अँगूठे का है।
राशन उठाने जाना है, तो अँगूठा लगाईए। और राशन पाईए। अँगूठा कटने पर या अँगूठा माँगने पर एकलव्य का प्रसंग याद आता है। उस समय गुरूजी ने गुरू दक्षिणा में अँगूठा माँग लिया था। तो अँगूठे पर विवाद हो गया था। आज हर आदमी चाहे वो पढ़ा-लिखा हो या ना हो। लेकिन हर जगह अँगूठा ही लगा रहा है। इस कलियुग में लोग सोशल मीडिया पर दिन भर अँगूठा लगाने की बात कर रहें है़ं। कृपया ऊँगली-अँगूठा लगाईए। और हमें वायरल बनाईए। सरकार सीजन और चुनावों में ऊँगली और अँगूठे लगवा रही है। आपका हर काम अँगूठा से ही होता है। पाँच ऊँगलियों में अगूँठे का उतना ही महत्व है जितना पुल में पायों का। जैसे पुल बिना पायों के खड़े नहीं रह सकता। पहले अँगूठा छाप होने में बेइज्जती होती थी। आज हमारे दोस्त मित्र संगी साथी बस- और- बस एक ही अँगूठे के लिए मरे जा रहे हैं। कितने तो इनबाॅक्स में आकर अँगूठा लगाने की गुजारिश कर रहें हैं, कि प्रभु अँगूठा लगाकर हमें लाईक कीजिए।
— महेश कुमार केशरी
