ग़ज़ल
न थी सुध, इश्क़ में बदनाम होगी
भुगतती ज़िंदगी अंज़ाम होगी
मुहैया जो कराई थी छली ने
मयस्सर फिर न वैसी शाम होगी
न देंगे साथ अपने लोग भी जब
अकेली ज़िंदगी नीलाम होगी
पसीना, ख़ून कम है अश्क़ के बिन
हमारी चाकरी बिन दाम होगी
सिया ने था कहा कलयुग चलेगा
तुम्हारी लूट काफ़ी राम होगी
विरह की पीर छोड़े नींद में क्यों
मिलन तक पीर आठों याम होगी
ग़ज़ल की पाण्डुलिपि तैयार करता
समर्पित जो प्रिये के नाम होगी
— केशव शरण
