राजनीति

रेनियम डील से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता भारत

दुनिया इस समय ऊर्जा परिवर्तन के सबसे महत्वपूर्ण दौर से गुजर रही है। एक ओर जलवायु परिवर्तन की चुनौती देशों को कोयले और पेट्रोलियम जैसे पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम करने के लिए मजबूर कर रही है, तो दूसरी ओर तेजी से बढ़ती आबादी, औद्योगीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहनों और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार ने बिजली की मांग को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचा दिया है। ऐसे समय में परमाणु ऊर्जा एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था के केंद्र में आ गई है। अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और कई अन्य देश अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों का विस्तार कर रहे हैं। इसी वैश्विक परिदृश्य के बीच भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम आपूर्ति समझौते पर अंतिम मुहर लगना केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और भविष्य की विकास यात्रा से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

भारत ने वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता विकसित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान क्षमता की तुलना में यह कई गुना अधिक है और इसे हासिल करने के लिए नए परमाणु बिजलीघरों का निर्माण, आधुनिक रिएक्टरों की स्थापना और दीर्घकालिक ईंधन आपूर्ति आवश्यक होगी। सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि परमाणु ऊर्जा भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य का प्रमुख आधार बनेगी तथा इसे विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ा गया है।

यहीं पर ऑस्ट्रेलिया का महत्व सामने आता है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े ज्ञात यूरेनियम भंडार वाले देशों में गिना जाता है। लंबे समय तक वहां से भारत को यूरेनियम निर्यात का मार्ग विभिन्न नीतिगत और कानूनी कारणों से अवरुद्ध रहा, लेकिन अब प्रशासनिक व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिए जाने के बाद भारत को वहां से दीर्घकालिक और विश्वसनीय ईंधन आपूर्ति का रास्ता खुल गया है। इससे भारत की नागरिक परमाणु परियोजनाओं को स्थिर ईंधन उपलब्ध होगा और भविष्य में बनने वाले नए रिएक्टरों को भी आवश्यक संसाधन मिल सकेंगे।

भारत के लिए यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में प्राकृतिक यूरेनियम के सीमित भंडार हैं। भारत ने घरेलू स्तर पर यूरेनियम की खोज और उत्पादन बढ़ाने के प्रयास अवश्य किए हैं, लेकिन बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को देखते हुए केवल घरेलू संसाधनों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को लगातार ईंधन चाहिए और यदि आपूर्ति बाधित हो जाए तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया जैसा भरोसेमंद साझेदार भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नया आधार प्रदान करता है।

यह समझौता केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। परमाणु तकनीक का उपयोग चिकित्सा, कैंसर उपचार, कृषि अनुसंधान, खाद्य संरक्षण, अंतरिक्ष विज्ञान, औद्योगिक परीक्षण तथा उच्च स्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान में भी होता है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम, आधुनिक अनुसंधान संस्थान और कई उच्च तकनीकी परियोजनाएं परमाणु विज्ञान से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हैं। इसलिए यूरेनियम की स्थिर उपलब्धता देश की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता को भी मजबूती देगी।

हालांकि इस समझौते को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि यह इतने वर्षों तक लंबित क्यों रहा। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच असैन्य परमाणु सहयोग समझौता वर्ष 2014 में हो चुका था, लेकिन उसके बाद भी वास्तविक यूरेनियम आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी। इसका सबसे बड़ा कारण परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी से जुड़ी ऑस्ट्रेलिया की पुरानी नीति थी। भारत इस संधि का सदस्य नहीं है। इसलिए ऑस्ट्रेलिया लंबे समय तक केवल उन्हीं देशों को यूरेनियम निर्यात करता था जो एनपीटी के सदस्य थे। बाद में भारत के जिम्मेदार परमाणु रिकॉर्ड, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी व्यवस्था तथा असैन्य और सैन्य परमाणु कार्यक्रमों के स्पष्ट पृथक्करण को देखते हुए दोनों देशों ने सहयोग का रास्ता निकाला। इसके बाद भी प्रशासनिक प्रक्रियाओं, सुरक्षा मानकों, निगरानी व्यवस्था और ईंधन के केवल शांतिपूर्ण उपयोग से जुड़े प्रावधानों को अंतिम रूप देने में वर्षों लग गए। अब जाकर यह प्रक्रिया पूरी हुई है।

भारत का परमाणु कार्यक्रम हमेशा शांतिपूर्ण उपयोग पर आधारित रहा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह विश्वास कायम किया है कि वह असैन्य परमाणु ईंधन का उपयोग केवल ऊर्जा उत्पादन और अन्य नागरिक उद्देश्यों के लिए करेगा। यही कारण है कि आज अनेक देश भारत के साथ परमाणु क्षेत्र में सहयोग करने के लिए तैयार हैं। ऑस्ट्रेलिया के साथ हुआ यह समझौता भी इसी भरोसे का परिणाम माना जा रहा है।

ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर उद्योग, इलेक्ट्रिक वाहन, हाई स्पीड रेल, स्मार्ट शहर और डिजिटल अवसंरचना के विस्तार के कारण बिजली की मांग कई गुना बढ़ने वाली है। सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार तेजी से हो रहा है, लेकिन इनकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि इनका उत्पादन मौसम पर निर्भर रहता है। सूर्य न होने या हवा कम चलने पर उत्पादन घट जाता है। इसके विपरीत परमाणु ऊर्जा चौबीसों घंटे निरंतर बिजली उपलब्ध कराती है। यही कारण है कि विकसित देश भी नवीकरणीय ऊर्जा के साथ परमाणु ऊर्जा को समानांतर रूप से आगे बढ़ा रहे हैं।

भारत और ऑस्ट्रेलिया का यह समझौता केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के संबंधों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, साइबर सुरक्षा, उन्नत प्रौद्योगिकी, आपूर्ति श्रृंखला और इंडो पैसिफिक क्षेत्र में साझेदारी लगातार मजबूत हुई है। यूरेनियम समझौता इस व्यापक रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय है। इससे दोनों देशों के बीच विश्वास और आर्थिक सहयोग भी बढ़ेगा।

इंडो पैसिफिक क्षेत्र में बदलते भू राजनीतिक समीकरणों ने भी इस समझौते को विशेष महत्व दिया है। चीन की बढ़ती सक्रियता, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अस्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े जोखिमों के बीच भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देशों का सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देश केवल व्यापारिक साझेदार नहीं बल्कि समान रणनीतिक सोच वाले सहयोगी के रूप में भी उभर रहे हैं।

यह भी उल्लेखनीय है कि भारत केवल एक देश पर निर्भर रहने की नीति नहीं अपना रहा। भारत पहले से कनाडा, कजाखस्तान और अन्य देशों के साथ भी यूरेनियम आपूर्ति को लेकर सहयोग बढ़ा रहा है। विभिन्न स्रोतों से ईंधन उपलब्ध होने का अर्थ है कि किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर भी भारत की ऊर्जा व्यवस्था प्रभावित नहीं होगी। यह विविधीकरण ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

कुछ लोगों का मानना है कि इस समझौते के बाद भारत में बिजली संकट हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। यह निष्कर्ष पूरी तरह सही नहीं होगा। केवल यूरेनियम उपलब्ध हो जाने से बिजली उत्पादन स्वतः नहीं बढ़ जाता। इसके लिए नए परमाणु संयंत्रों का निर्माण, वित्तीय निवेश, प्रशिक्षित मानव संसाधन, सुरक्षा मानकों का पालन, बिजली प्रसारण नेटवर्क और समयबद्ध परियोजना प्रबंधन भी आवश्यक हैं। परमाणु बिजलीघर बनने में कई वर्ष लगते हैं और प्रत्येक परियोजना अत्यधिक तकनीकी एवं पूंजी आधारित होती है। इसलिए इस समझौते को एक महत्वपूर्ण आधार अवश्य माना जा सकता है, लेकिन इसे संपूर्ण समाधान नहीं कहा जा सकता।

इसके बावजूद इस समझौते का दीर्घकालिक महत्व असंदिग्ध है। भारत यदि 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है तो उसे विश्वसनीय, स्वच्छ और पर्याप्त ऊर्जा की आवश्यकता होगी। परमाणु ऊर्जा इस लक्ष्य का महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकती है। ऑस्ट्रेलिया से मिलने वाला यूरेनियम भारत की ऊर्जा नीति को स्थिरता देगा, स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को गति देगा, कार्बन उत्सर्जन कम करने में सहायता करेगा और देश की औद्योगिक तथा तकनीकी प्रगति को नया आधार प्रदान करेगा।

वास्तव में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ यह यूरेनियम समझौता केवल दो देशों के बीच ईंधन का लेनदेन नहीं है। यह ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास, वैज्ञानिक प्रगति, रणनीतिक साझेदारी और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उठाया गया दूरदर्शी कदम है। आने वाले वर्षों में जब भारत अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का तेजी से विस्तार करेगा, तब इस समझौते का महत्व और अधिक स्पष्ट दिखाई देगा। यह सौदा भारत को केवल बिजली उत्पादन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति और स्वच्छ विकास की दिशा में भी अधिक आत्मविश्वास और मजबूती के साथ आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करेगा। 

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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