कुण्डली/छंद

कुण्डलिया

नाहक दोषी मानना, जिसने किया गुनाह।
मुख मंडल पर देखिए, फैला जो उत्साह।।
फैला जो उत्साह, यही तो जग है कहता।
करता जो अपराध, कहाँ उत्साहित रहता।।
कहें मित्र यमराज, सत्य के तुम संवाहक।
धरते हो निज शीश, भार तुम झूठा नाहक।।७२

आया ऐसा दौर अब, कौन करे अब याद।
सबसे पहले भूलती, अपनी ही औलाद।।
अपनी ही औलाद, कहाँ अब रहे सचेते।
कौन सुने फरियाद, डाँटकर चुप कर देते।।
कहें मित्र यमराज, देखिए कलयुग माया।
नये दौर का आज, जमाना चलकर आया।।७३

नागर में जाकर बसे, भूल गये संस्कार।
संग शील अरु सभ्यता, लगते हैं बेकार।।
लगते हैं बेकार, मरी करुणाएँ सारी।
ऐसा हुआ समाज, बढ़ी जाती बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, भरें गागर में सागर।
चलो गाँव को छोड़, बसें हम सब भी नागर।।७४

अनजाने की भूल का, नहीं दीजिए दंड।
भला आपको क्या मिले, मन को करके खंड।।
मन को करके खंड, लाभ क्या पा जाओगे।
फिर सुख से तब आप, बताओ रह पाओगे।।
कहें मित्र यमराज, बात मेरी भी माने।
छोड़ो कल की बात, भूल जाने अंजाने।।७५

कहता हमसे नौतपा, धैर्य न छोड़ो आप।
जीवन के संग्राम को, मानो मत अभिशाप।।
मानो मत अभिशाप, श्रेष्ठ मानव बन रहिए।
दानव जैसे काम, भूल से भी मत करिए।।
कहें मित्र यमराज, बात क्यों नहीं समझता।
एक बार फिर आज, आप समझ सबसे कहता।।७६

होते रहते हम सभी, गर्मी से परेशान।
भले जलाये नौतपा, बने यही वरदान।
बनकर के वरदान, सर्प बिच्छू जहरीले।
करते जो नुकसान, ताप निज सबको लीले।।
बढ़ती पैदावार, आप हम नाहक रोते।।
क्या कर लेते आज, नौतपा दुश्मन होते।।७७

राजा जनक विदेह ने, रचा स्वयंवर एक।
ऋषि मुनि गण के साथ में, आए भूप अनेक।।
आए भूप अनेक, राम लक्ष्मण भी आए।
देखा शिव का चाप, सभी नृप अति अकुलाए।
धनुष टूट के साथ, दुदुंभी जमकर बाजा।
मिथिलावासी धन्य, प्रफुल्लित उनके राजा।।७८

अपने देह से है नहीं, जिसको भी आसक्ति।
देह में रहते हुए भी, जनक विदेह सी शक्ति।।
जनक विदेह सी शक्ति, राज था जिनका मिथिला।
वो भी तो इक बार, हुए थे आखिर शिथिला।।
हमें बताएँ आप, विदेह हम मानें किसको।
या फिर नहीं है ज्ञान, समझ आती ना जिसको।।७९

बदनामी भी दे रही, कुछ लोगों का मान।
तभी घूमते हैं बड़े, लोग उठाए कान।।
लोग उठाए कान, व्यर्थ सारी नाकामी।
काले मन के लोग, नहीं वह डरें सुनामी।।
कहें मित्र यमराज, मानिए हमें प्रणामी।
नाहक में अब आप, करो इनकी बदनामी।।८०

बतलाओ हमको अभी, करते क्यों बदनाम।
नंगे तो हो आप भी, भूलो नहीं हमाम।।
भूलो नहीं हमाम, तनिक तो इतना जानो।
नहीं जान पहचान, करो पहले तब मानो।।
कहें मित्र यमराज, भूल से भी इतराओ।
आती नहीं क्या शर्म ,यही पहले बतलाओ।।८१

अपने-अपने स्वार्थ में, होती ठेलम-ठेल।
देशभक्ति के नाम पर, खूब हो रहे खेल।।
खूब हो रहे खल, शहादत आज सिसकती।
लाचारी में आज, लगे क्यों हमें ठिठकती।
कहें मित्र यमराज, शक्ति में देखें सपने।
देशभक्ति है बाद, लाभ पहले सब अपने।।८२

माया ठगिनी जगत की, फैलाए है जाल।
लिपटे इसमें लोग सब, भूल नंद के लाल।।
भूल नंद के लाल, रंग अरु रूप निराला।
धन-दौलत-सम्मान, बने सबका रखवाला।।
कहें मित्र यमराज, जगत में दिखती छाया।
आँख खोलकर देख, हाथ क्या आई माया।।८३

कलयुग के इस दौर में, फैल चुका अब रोग।
अपने अपने शौक से, करें दिखावा लोग।।
करें दिखावा लोग, भला यह अचरज कैसा।
सत्य छुपाकर रोग, नहीं दिखते जस वैसा।।
कहें मित्र यमराज, खेत जब जाता है चुग।
तभी मानते लोग, आज अब आया कलयुग।।८४

बैठे-ठाले लोग जो, बनते बड़े महान।
उतरे बिना मचान से, कैसे भरें उड़ान।।
कैसे भरें उड़ान, दंभ सिर चढ़कर बोले।
पानी जिनके पेट, तनिक मत बिल्कुल डोले।।
कहें मित्र यमराज, रहो तुम हरदम ऐंठे।
सपनों का संसार, सजाते रहिए बैठे।।८५

बंधन फेरे सात के, खोते जाते भाव।
थोक भाव में आज ये, गहरे देते घाव।
गहरे देते घाव, ग्रहण सोचों पर छाया।
और आज इंसान, नहीं दिखता शरमाया।।
कहें मित्र यमराज, जहर निज बोते नंदन।
मुर्दा होते आज, सात फेरों के बंधन।।८६

किसको हम अपना कहें, सभी स्वार्थ के मीत।
सबके अपने बेसुरे, सुनने पड़ते गीत।।
सबके पड़ते गीत, समझ अब तक नहिं पाए।
कभी तरेरे नैन, कभी आँखें दिखलाए।।
कहें मित्र यमराज, जान लो तुम भी सबको।
तब जानें हम आप, कहेंगे अपना किसको।।८७

आया अब ऐसा समय, बने रहो फौलाद।
वरना धक्का एक दिन, देगी निज औलाद।।
देगी निज औलाद, आप हम सब रोयेंगे।
काटेंगे वो फसल, आज जो भी बोयेंगे।।
कहें मित्र यमराज, मान लो मेरे भाया।
कल मत कहना आप, समय ये कैसा आया।।८८

होते आप अधीर क्यों, सभी जानते यार।
रोजगार की चाह में, खानी पड़ती मार।।
खानी पड़ती मार, शर्म की यही कहानी।
विचलित हर परिवार, संग में दादी-नानी।।
कहें मित्र यमराज, यही क्या हम सब बोते।
काश देश के आज, युवा सब नेता होते।।८९

हर प्राणी बेचैन है, रहता बड़ा अधीर।
अब तो उसके आँख के, सूख गए दृग नीर।।
सूख गए सब नीर, सभी की अलग कहानी।
चिंता सबकी आज, मौन है पीर जुबानी।।
कहें मित्र यमराज, बने सरकार धुरंधर।
पीठ ठोंकती आप, कहे बोलो गंगे हर।।९०

करता कोई क्यों नहीं, यशोगान अब आज।
इसके पीछे है छिपा, जाने कैसा राज।।
जाने कैसा राज, यही है फिक्र हमारी।
दुश्मन मेरी आज, समूची दुनिया सारी।।
सबका अपना रंग, स्वार्थवश रहता सजता।
बिना लाभ के आज, कौन अब बातें करता।।९१

लेकर करते आड़ में, यशोगान अपमान।
भ्रम में फँसकर लोग कुछ, बनते हैं अंजान।।
बनते हैं अंजान, देख ली जग की माया।
कुछ भी कहिए आप, समझ मुझको भी आया।।
कहें मित्र यमराज, बड़ा खुश होते देकर।
खुशियाँ लेते छीन, छाँव मेरी ही लेकर।।९२

आया है कैसा समय, कलयुग में घनघोर।
भेष बदलकर भक्त का, चंद चढ़ावा चोर।।
चंद चढ़ावा चोर, राम के नाम सहारे।
मान रहे अधिकार, दान के ये रखवारे।।
कहें मित्र यमराज, देखिए रामहि माया।
घर में बैठा चोर, नहीं बाहर से आया।।९३

मेरे कड़क स्वभाव को, पचा न पाते लोग।
कुछ लोगों की नजर में, मुझे हुआ है रोग।।
मुझे हुआ है रोग, आप मुझमें मत मानो।
करके सोच विचार, भले ही तुम पहचानो।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ क्यों नजर तरेरे।
नहीं किसी से भेद, करुँ क्यों तेरे-मेरे।।९४

लगता कड़ुआ सभी को, मेरा कड़क स्वभाव।
कुछ लोगों की नजर में, जैसे भारी घाव।।
जैसे भारी घाव, पास मेरे मत आना।
रहो मानते आप, मुझे बिल्कुल बेगाना।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ सब मेरी क्षमता।
नहीं किसी से भेद, मुझे तो ऐसा लगता।।९५

उन्नति मेरी देखकर, क्यों होता है घाव।
आज मनुजता आपकी, खोती सारे भाव।।
खोती सारे भाव, हमारा रुपया दिखता।
किसका पुण्य प्रताप, शीश पर मेरे टिकता।।
कहते हैं यमराज, देखिए आज की प्रगति।
सबसे आगे आज, करे अब ईर्ष्या उन्नति।।९६

कहता हमसे नौतपा, धैर्य न छोड़ो आप।
जल जंगल अरु जमीं से, मत करिए संताप।।
मत करिए संताप, बने सब मानव रहिए।
दानव जैसे काम, भूल से भी मत करिए।।
कहें मित्र यमराज, बात क्यों नहीं समझता है।
एक बार फिर आज, प्रेम से नौतपा कहता।।९७

होते रहते हम सभी, गर्मी से परेशान।
पर आता ये नौतपा, बनकर के वरदान।
बनकर के वरदान, सर्प बिच्छू जहरीले।
करते जो नुकसान, ताप से सब ही लीले।।
बढ़ती पैदावार, आप हम नाहक रोते।।
क्या कर लेते आज, नौतपा दुश्मन होते।।९८

दल-बदलू माहौल में, सबके निहित उसूल।
चुभे किसी को शूल सा, कुछ को कोमल फूल।।
कुछ को कोमल फूल, स्वार्थ है सबका अपना।
अपने हित का आप, देखते अपना सपना।।
कहें मित्र यमराज, रहे अब निशदिन हलचल।
सुबह कहीं जो लोग, शाम दिखते दूजा दल।।९९

अपने-अपने स्वार्थ में, खूब हो रहे खेल।
देशभक्ति के नाम पर, होती ठेलम-ठेल।।
होती ठेलम-ठेल, शहादत आज सिसकती।
लाचारी में आज, लगे क्यों हमें ठिठकती।
कहें मित्र यमराज, शक्ति में देखें सपने।
देशभक्ति है बाद, लाभ पहले सब अपने।।१००

भारत माता नाम पर, मत कर ऐसे काम।
जिससे अपने देश का, नाम व्यर्थ बदनाम।।
नाम व्यर्थ बदनाम, शहादत क्यों दे रोयें।
काँटे चुभते पाँव, जिसे अपनों ने बोये।।
देशभक्ति संदेश, एकता से हो नाता।
ऊँचा रखना भाल, सदा ही भारत माता।।१०१

करता कोई क्यों नहीं, यशोगान अब आज।
इसके पीछे है छिपा, जाने कैसा राज।।
जाने कैसा राज, यही है फिक्र हमारी।
दुश्मन मेरी आज, समूची दुनिया सारी।।
सबका अपना रंग, स्वार्थवश रहता सजता।
बिना लाभ के आज, कौन अब बातें करता।।१०२

लेकर करते आड़ में, यशोगान अपमान।
भ्रम में फँसकर लोग कुछ, बनते हैं अंजान।।
बनते हैं अंजान, देख ली जग की माया।
कुछ भी कहिए आप, समझ मुझको भी आया।।
कहें मित्र यमराज, बड़ा खुश होते देकर।
खुशियाँ लेते छीन, छाँव मेरी ही लेकर।।१०३

पर्ची-खर्ची दौर का, मिटता नाम निशान।
बीते कल में था यही, नैतिकता अपमान।।
नैतिकता अपमान, युवा जन कुंठित होते।
तैयारी दिन – रात, परीक्षा देकर रोते।।
कहें मित्र यमराज, आज वो सब बावर्ची।
उनका खेल खराब, गैंग की सारी पर्ची।।१०४

पर्ची के आधीन अब, ईश्वर दर्शन खास।
नहीं जेब में दाम है, तो मत रखिए आस।।
तो मत रखिए आस, यही है कलयुग माया।
ईश दरश की राह, यही रोड़ा अटकाया।।
कहें मित्र यमराज, करो यदि तुम कुछ खर्ची।
आगे आओ आप, भूलकर चक्कर पर्ची।।१०५

जो निर्बल असहाय हैं, पीड़ा सहें अपार।
निशदिन जीवन में सहें, कंगाली की मार।।
कंगाली की मार, दाल उनकी नहिं गलती।
हर कोशिश बेकार, चाल भी पीछे चलती।।
कहें मित्र यमराज, फटा है उनका कंबल।
जान रही सरकार, दशा है कितनी निर्बल।।१०६

छाया बरगद के तले, स्वप्न हो गये आज।
नीम और पीपल हुए, हम सबसे नाराज।।
हम सबसे नाराज, देखते रहिए सपना।
मिलती शीतल छाँव, खुशी से पागल इतना।।
कहें मित्र यमराज, देख विकास की माया।
देती है सुख चैन, हमें किताबी छाया।।१०७

राम चरित मानस पढ़ो , हो जीवन सदज्ञान।
बात हमारी मानिए, मिल जाएँ भगवान।।
मिल जाएँ भगवान, समझ हो जाए पावन।
रहे सदा ही दूर, आपके मन का रावन।।
कहें मित्र यमराज, साफ सुथरा मन चित।
जिनके घर नित वास, करें प्रभु राम चरित।।१०८

होते पेपर लीक की, बस चर्चा है आम।
पर ये कैसे रुक सके, होता है कब काम।।
होता है कब काम, सभी की है लाचारी।
जिसका नहीं इलाज, आज ऐसी बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, रहेंगे कब तक सोते।
आये दिन का काम, लीक अब पेपर होते।।१०९

आया है कैसा समय, कलयुग में घनघोर।
भेष बदलकर भक्त का, चंद चढ़ावा चोर।।
चंद चढ़ावा चोर, राम के नाम सहारे।
मान रहे अधिकार, दान के ये रखवारे।।
कहें मित्र यमराज, देखिए रामहि माया।
घर में बैठा चोर, नहीं बाहर से आया।।११०

अपने ही अस्तित्व से,जूझ रहें हैं लोग।
जानें कैसा इन दिनों, छाया नूतन रोग।।
छाया नूतन रोग, दोष भी किसका मानें।
हम सब ही अब आज, हुए खुद से अंजाने।।
कहें मित्र यमराज, देखते रहिए सपने।
और भूलिए आप , कहाँ अब हम हैं अपने।।१११

रोया होगा काल भी, देख जगत का ताप।
भाई का ही देखकर, भाई करता पाप।।
भाई करता पाप, धरा भी निशदिन काँपे।
सूख गए सब बाग, भरे नभ माला जापे।।
कहें मित्र यमराज, हुआ क्या था सो गोया।
कर्मों का फल देख, काल भी अब है रोया॥११२

रोया होगा काल भी, हाल धरा का देख।
जहाँ मनुज ही आज अब, रचता जन का लेख।।
रखता है जन का लेख, करे नित नूतन घातें।
भूख प्यास रण त्रास, बुझीं अनगिन सौगातें।।
लिखो मौन इतिहास, अभी तक जिसे सँजोया।
चीख रहे नादान, धर्म भी सिसका रोया॥११३

होता भ्रष्टाचार का, आज नित्य विस्तार।
इसके पीछे तर्क का, सबका अपना सार।।
सबका अपना सार, झोलियाँ अपनी भरना।
करना हमको पाप, एक दिन आखिर मरना।।
कहें मित्र यमराज, जगत सब देखे ढोता।
करिए नहीं विचार, व्यर्थ गुण-अवगुण होता।।११४

जीवन में कठिनाइयाँ, करती नित विस्तार।
बिना ज़रुरत लादतीं, देकर नव आधार।।
देकर नव आधार, कर्म की अपनी लीला।
सीखें हम अनुराग, गीत संगीत सुरीला।।
कहें मित्र यमराज, कहाँ हो आप मुनीजन।
नित्य नया सुर-ताल, सिखाता हमको जीवन।।११५

बेटी सिया समान है, सबला धीरज धार।
नीति-प्रीति की मूर्ति वो, घर का उजला द्वार।।
घर का उजला द्वार, पढ़े संग जगत पढ़ाए।
कष्ट पड़े तो मौन, नयन में स्वप्न सजाए।।
कहें मित्र यमराज, समय की रेखा मेटी।
संकट में मुस्कान, बने जग-जीवन बेटी।।११६

बेटी सिया समान मम, स्वाभिमान सम्मान।
त्याग, शील, करुणा भरी, रखती ऊँची शान।।
रखती ऊँची शान, सहे दुख पर मुस्काए।
भरती मधुरिम रंग, खुशी के दीप जलाए।।
कहे मित्र यमराज, हमारे दुख सब मेटी।
घर में तुलसी रूप, हमारी प्यारी बेटी।।११७

चौसर बिछी बिसात की, सबके अपने वार।
जैसी जिसकी चाल है, वैसा तेज प्रहार।।
वैसा तेज प्रहार, दाँव में धीरज भारी।
अश्व देख शह-मात, करें सब लोग सवारी।।
कहें मित्र यमराज, समय का पाँसा नौकर।
चलना कच्ची चाल, नाम मत लेना चौसर।।११८

आते हैं मेहमान जब, करते हम सत्कार।
संस्कार हमको मिला, सब अपने परिवार।।
सब अपने परिवार, खुशी हमको है मिलती।
रखते नहीं हिसाब, और क्यों करना गिनती।।
कहें मित्र यमराज, लोग हैं हमको भाते।
अच्छे लगते लोग, हमारे द्वारे आते।।११९

आते हैं मेहमान जब, करते हम सत्कार।
संस्कार हमको मिला, सब अपने परिवार।।
सब अपने परिवार, खुशी हमको है मिलती।
रखते नहीं हिसाब, और क्यों करना गिनती।।
कहें मित्र यमराज, लोग हैं हमको भाते।
अच्छे लगते लोग, हमारे द्वारे आते।।१२०

पल में स्वाहा हो गया, घर आँगन बाजार।
आगजनी से जल उठा, रोता घर परिवार।।
रोता घर परिवार, देखकर मन अकुलाए।
नैनन बरसे नीर, धुँआ नभ भर में छाए।।
कहें मित्र यमराज, आसरा अब अवनी में।
करिए सदा विचार, नहीं सब स्वाहा पल में ।।१२१

बढ़ती जाये इन दिनों, आगजनी का खेल।
जैसे ये भी बन रही, बिना ब्रेक की रेल।।
बिना ब्रेक की रेल, नाहक प्राण है लेती।
कुछ की लेकर जान, दर्द बहुतों को देती।।
कहें मित्र यमराज, कहर बन रहती ढहती।
करती नहीं विचार, झोंक में आगे बढ़ती।।१२२

वैभव दिया बिसार कल, खाया झटका जोर।
गया पता चल प्रेम से, नहीं नाचता मोर।।
नहीं नाचता मोर, समझते थे हम बच्चा।
यहीं गये हम हार, सहन होता नहिं गच्चा।।
कहें मित्र यमराज, भले वो दिखता शैशव।
पर उसका है भाव, कहे हर कोई वैभव।।१२३

मेरा वैभव कल तलक, चमक रहा था रोज।
आज कहाँ वो गुम हुआ, करता हूँ अब खोज।।
करता हूँ अब खोज, समझ जिसको अब पाया।
अपने पर ही खीझ, बहुत ग़ुस्सा भी आया।।
कहें मित्र यमराज, खेल सब समझूंँ तेरा।
जिस पर करते दंभ, बचा है अब क्या मेरा।।१२४

रुकते हैं कब पाँव, भीगती वर्दी सारी।
जान रहे हैं लोग, लदी चिट्ठी बहु भारी।।
लदी चिट्ठी बहु भारी, लोग हैं राह देखते।
धूप-छाँव बरसात, बड़ी आशा से तकते।
कहें मित्र यमराज, कभी जब वो ना थकते।
बस इतना सा सार, कदम मेरे ना रुकते।।१२५

मर्यादा भूले सभी, कैसा हुआ समाज।
समझ नहीं है आ रहा, आया कैसा राज।।
आया कैसा राज, सभी करते मनमर्जी।
हुआ बहुत बेजार, करे भी क्या अब दर्जी।।
कहें मित्र यमराज, बने हम इतना सादा।
दूषित मनुज विचार, दोष देते मर्यादा।।१२६

मर्यादा का नित करें, हम सब ही अपमान।
और समझते हैं इसे, नाहक ही निज गान।।
नाहक ही निज गान, बने जाते हम पापी।
ऐसा भी क्या दौर, मची जो आपाधापी।।
बहुत समय है शेष, बनोगे जब तुम दादा।
तब समझोगे यार, कठिन कितनी मर्यादा।।१२७

विघ्न विनाशक पुत्र शिव, धरें सभी का ध्यान।
भक्त आपके जो सभी, करते मिलकर गान।।
करते मिलकर गान, कृपा सब करते स्वामी।
लगता मोदक भोग, भागते सारे कामी।।
मूसक आप सवार, जगत के तुम सुखदायक।
गौरी-नंदन आप, कहें सब विघ्न विनाशक॥१२८

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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