ग़ज़ल
कुछ और कर सका नहीं कायर खड़े खड़े
देता रहा वो ग़ालियां दमभर खड़े खड़े
बादल फटा फटाक यूँ सर पर खड़े खड़े
तब्दील हो गये सभी मंजर खडे़ खड़े
अल्लाह के अजाब का जिस दम हुआ नुजूल
बर्बाद हो गया बड़ा लश्कर खड़े खड़े
बुल्डोज़ इक गरीब की खोली हुई मगर
सब देखता रहा वहाँ लीडर खड़े खड़े
कुछ हाथ पैर तुम भी हिलाओ ज़रा मियाँ
मिलता नहीं किसी को भी अवसर खड़े खड़े
— हमीद कानपुरी
