राजनीति

विदेश से भारत की संप्रभुता-सुरक्षा के खिलाफ डिजिटल वार

दुनिया में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कभी देशों को कमजोर करने के लिए सीमा पर सेना उतारी जाती थी, अब वही काम मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए किया जा रहा है। इस युद्ध में न तो टैंक दिखाई देते हैं और न ही मिसाइलें, लेकिन इसका असर किसी पारंपरिक युद्ध से कम नहीं होता। इसका लक्ष्य दुश्मन के शहरों पर कब्जा करना नहीं, बल्कि उसके समाज में अविश्वास, भय और विभाजन पैदा करना होता है। भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ सबसे बड़ा डिजिटल समाज भी बन चुका है, पिछले एक दशक से इसी अदृश्य युद्ध का प्रमुख निशाना बना हुआ है। भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 95 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जबकि सोशल मीडिया से जुड़े लोगों की संख्या 50 करोड़ के पार पहुंच चुकी है। हर दिन करोड़ों भारतीय मोबाइल पर समाचार देखते हैं, राय बनाते हैं और उसे आगे भी भेजते हैं। यही वजह है कि भारत दुनिया के उन देशों में शामिल हो गया है, जहां सूचना को हथियार बनाकर सामाजिक माहौल प्रभावित करने की सबसे अधिक कोशिश होती है। सुरक्षा एजेंसियां कई बार संकेत दे चुकी हैं कि सीमा पार बैठे संगठित नेटवर्क भारतीय नामों, तस्वीरों और स्थानीय भाषाओं का इस्तेमाल कर ऐसे फर्जी खाते तैयार करते हैं, जिन्हें देखकर सामान्य व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता कि उसके सामने बैठा व्यक्ति वास्तव में किसी दूसरे देश से अभियान चला रहा है।

इस डिजिटल हमले की पहली गंभीर झलक 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों में दिखाई दी। हिंसा भड़काने के लिए पाकिस्तान का नहीं, बल्कि दूसरे देश का एक पुराना वीडियो उत्तर प्रदेश का बताकर प्रसारित किया गया। जांच में वीडियो फर्जी निकला, लेकिन तब तक समाज में तनाव फैल चुका था। यही वह दौर था जब पहली बार यह महसूस किया गया कि मोबाइल स्क्रीन पर चलने वाला झूठ जमीन पर खून-खराबे की वजह बन सकता है। इसके बाद 2017 और 2018 में बच्चा चोरी की अफवाहों ने पूरे देश को झकझोर दिया। व्हाट्सएप पर कुछ सेकंड के वीडियो और झूठे संदेशों ने ऐसी दहशत फैलाई कि असम, महाराष्ट्र, कर्नाटक, झारखंड, त्रिपुरा और तमिलनाडु सहित अनेक राज्यों में भीड़ ने निर्दाेष लोगों को बच्चा चोर समझकर पीट-पीटकर मार डाला। पुलिस जांच में अधिकांश मामलों में कोई संगठित बच्चा चोरी गिरोह नहीं मिला, लेकिन सोशल मीडिया पर फैली अफवाहें इतनी मजबूत हो चुकी थीं कि सच की कोई कीमत नहीं रह गई थी।

कोरोना महामारी के दौरान यह सूचना युद्ध और खतरनाक हो गया। किसी समुदाय को संक्रमण फैलाने वाला बताया गया, कहीं झूठे घरेलू इलाज वायरल किए गए, तो कहीं वैक्सीन को लेकर तरह-तरह की अफवाहें फैलाई गईं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे ‘इन्फोडेमिक’ कहा, यानी ऐसी महामारी जिसमें बीमारी से ज्यादा झूठ फैलता है। भारत में भी करोड़ों लोगों तक ऐसे संदेश पहुंचे जिनका चिकित्सा विज्ञान से कोई संबंध नहीं था। इसके बाद नागरिकता संशोधन कानून, दिल्ली हिंसा और किसान आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पूरी तरह राजनीतिक युद्ध का मैदान बन गया। वास्तविक मुद्दों के साथ-साथ हजारों ऐसे वीडियो और तस्वीरें साझा की गईं जिनका घटना से कोई संबंध नहीं था। कुछ पुराने वीडियो नए बताकर वायरल किए गए तो कुछ तस्वीरों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया गया। किसान आंदोलन के दौरान तथाकथित टूलकिट विवाद ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या भारत के आंतरिक आंदोलनों को विदेशी डिजिटल नेटवर्क दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। जांच एजेंसियों ने कई डिजिटल कड़ियों की जांच की और यह स्पष्ट हुआ कि सोशल मीडिया अब केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि रणनीतिक अभियान चलाने का औजार भी बन चुका है।

2023 में मणिपुर हिंसा ने इस खतरे को और स्पष्ट कर दिया। कई ऐसे वीडियो, जो महीनों पुराने थे या दूसरे देशों के थे, उन्हें मणिपुर का बताकर वायरल किया गया। एक फर्जी वीडियो ने हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों के मन में भी गुस्सा और अविश्वास पैदा कर दिया। यह दिखाता है कि डिजिटल दुष्प्रचार अब किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे देश का माहौल प्रभावित कर सकता है। 2024 के आम चुनावों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस युद्ध को नया आयाम दिया। नेताओं की आवाज बदलकर भाषण तैयार किए गए, नकली वीडियो बनाए गए और ऐसे संदेश प्रसारित किए गए जिन्हें सामान्य व्यक्ति आसानी से पहचान नहीं सकता था। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि आने वाले वर्षों में डीपफेक लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े सैन्य तनाव ने इस खतरे को वास्तविक रूप में सामने ला दिया। जैसे ही सीमा पर सैन्य गतिविधियां तेज हुईं, सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो की बाढ़ आ गई। गाजा युद्ध के दृश्य भारत-पाक संघर्ष बताकर चलाए गए। पुराने विस्फोटों के वीडियो को ताजा सैन्य कार्रवाई बताया गया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार तस्वीरों ने भ्रम और बढ़ा दिया। कुछ विदेशी खातों ने भारतीय सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमले के झूठे दावे किए, जबकि दूसरी ओर भारतीय कार्रवाई को लेकर भी मनगढ़ंत वीडियो फैलाए गए। बाद में सरकारी एजेंसियों ने ऐसे अनेक दावों का खंडन किया और बड़ी मात्रा में भ्रामक सामग्री को हटाने की कार्रवाई की।

विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक डिजिटल युद्ध का सबसे बड़ा हथियार ‘बॉट नेटवर्क’ हैं। हजारों स्वचालित खाते एक ही समय में एक जैसा संदेश प्रसारित करते हैं। इससे किसी झूठे विषय को भी ऐसा दिखाया जाता है, जैसे पूरा देश उसी पर चर्चा कर रहा हो। इसके साथ ही भुगतान लेकर काम करने वाले ट्रोल समूह, नकली समाचार वेबसाइटें और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार सामग्री मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं कि सामान्य नागरिक के लिए सच और झूठ में अंतर करना कठिन हो जाता है। इस पूरे खेल का आर्थिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सोशल मीडिया पर जितना अधिक विवाद होगा, उतनी अधिक पहुंच मिलेगी। पहुंच बढ़ेगी तो विज्ञापन और कमाई भी बढ़ेगी। यही कारण है कि कुछ प्रभावशाली खाते बिना किसी सत्यापन के सनसनीखेज सामग्री साझा करते हैं। कई बार उन्हें यह भी पता नहीं होता कि उनका साझा किया गया संदेश किसी विदेशी दुष्प्रचार अभियान का हिस्सा बन चुका है।

भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में सूचना प्रौद्योगिकी नियमों को सख्त बनाया, सोशल मीडिया मंचों की जवाबदेही बढ़ाई और डीपफेक जैसी नई चुनौतियों को लेकर लगातार परामर्श जारी किए। साइबर सुरक्षा एजेंसियों की क्षमता भी बढ़ाई गई है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल कानून इस लड़ाई को नहीं जीत सकते। जब तक नागरिक स्वयं डिजिटल रूप से जागरूक नहीं होंगे, तब तक किसी भी विदेशी अभियान को रोकना कठिन रहेगा। आज सबसे बड़ी आवश्यकता डिजिटल साक्षरता की है। लोगों को यह सिखाना होगा कि किसी वीडियो का स्रोत कैसे जांचें, किसी तस्वीर की वास्तविकता कैसे परखें और किसी वायरल संदेश पर विश्वास करने से पहले आधिकारिक पुष्टि क्यों जरूरी है। यदि समाज तथ्य जांच की आदत विकसित कर ले, तो दुष्प्रचार की सबसे मजबूत कड़ी अपने आप टूट जाएगी। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता, लोकतांत्रिक व्यवस्था और सामाजिक समरसता है। इसलिए विदेशी दुष्प्रचार का पहला निशाना भी यही बनता है। डिजिटल युद्ध का उद्देश्य केवल झूठ फैलाना नहीं, बल्कि भारतीयों के बीच भरोसा खत्म करना है। आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डीपफेक और स्वचालित प्रचार तंत्र इस चुनौती को और गंभीर बनाएंगे। ऐसे दौर में सीमा पर तैनात सैनिक जितने आवश्यक हैं, उतना ही जरूरी हर वह नागरिक भी है जो मोबाइल पर आए हर संदेश को आंख बंद करके सच नहीं मानता। आधुनिक भारत की सुरक्षा अब केवल सीमा चौकियों पर नहीं, बल्कि हर हाथ में मौजूद मोबाइल स्क्रीन पर भी तय होगी।

संजय सक्सेना

संजय सक्सेना

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