जीवन का रंगमंच : महान अभिनेता अमरीश पुरी की प्रेरणादायक आत्मकथा
अपने संघर्ष, समर्पण और प्रतिभा के बल पर हिंदी फिल्मों में खलनायकी के पर्याय बन चुके महान अभिनेता अमरीश पुरी का व्यक्तित्व लाखों लोगों को प्रेरित करता है I अनुशासित जीवन और ईश्वर के प्रति अटूट निष्ठा ने उन्हें सफलता की ऊँचाई पर प्रतिष्ठित किया I अमरीश पुरी जी ने अपनी आत्मकथा में अपने संघर्ष, द्वंद्व, निराशा, जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण आदि का बेबाकी के साथ चित्रण किया है I उनके व्यक्तित्व में कोई पाखंड और आडम्बर नहीं था I उनकी आत्मकथा अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक है I इस आत्मकथा में उनके कई रूप देखने को मिलते हैं I यह आत्मकथा उनके दार्शनिक, कवि और आध्यात्मिक व्यक्तित्व को उजागर करती है I एक दार्शनिक की तरह वे अपना जीवन दर्शन व्यक्त करते हैं, एक कलाकार की तरह कला की बारीकियों को उजागर करते हैं और एक आध्यात्मिक गुरु की भांति ईश्वरीय रहस्यों का उद्घाटन करते हैं I उनकी आत्मकथा ‘‘जीवन का रंगमंच’’ तीन भागों में विभाजित है-संघर्ष काल, शो बिजनेस और जीवित रहने की कला I आत्मकथा के प्रथम खंड ‘संघर्ष काल’ में उन्होंने अपने बचपन, शिक्षा-दीक्षा, माता-पिता, भाई-बहन, मित्रों और रंगमंच से जुड़ाव का वर्णन किया है I आत्मकथा के इस भाग में उन्होंने अपने व्यक्तित्व की दुर्बलताओं, खूबियों, रंगमंच के साथियों और अपने गुरुओं के बारे में विस्तार से लिखा है I यह आत्मकथा अमरीश पुरी जी के व्यक्तित्व की विशिष्टताओं के साथ-साथ अभिनय कला की बारीकियों का जीवंत दस्तावेज है I यह केवल आत्मकथा नहीं है, बल्कि अभिनय कला की सूक्ष्मताओं का विश्लेषणपरक बहुमूल्य ग्रंथ है I रंगमंच और फिल्मों से जुड़े अभिनेताओं-अभिनेत्रियों व अन्य कलाकारों के लिए यह आत्मकथा प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की तरह है I वर्षों की साधना, कठिन परिश्रम और अपने गुरुओं के प्रति पूर्ण समर्पण भाव ने अमरीश पुरी को शिखर पर पहुँचाया है I उन्होंने अपने गुरुओं की आज्ञा का आँख मूंदकर पालन किया I उन्होंने अपने गुरुओं से कभी प्रतिप्रश्न नहीं किया I कला के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रतिबद्धता उनकी सफलता का मूल आधार है I अमरीश पुरी जैसा अभिनेता सदियों में एक जन्म लेता है I वे शिखर पर पहुँचकर भी मिट्टी को नहीं भूलते हैं I उनके व्यक्तित्व की यह अनुपम विशेषता है कि सफलता उनके सिर चढ़कर नहीं बोलती I सफलता के उच्चासन पर पहुँचकर भी उन्होंने अपनी जड़ों को विस्मृत नहीं किया I उन्होंने अपने संघर्ष और साधना के बारे में लिखा है-‘’स्वयं को मैंने तिनका-तिनका, टुकड़ा-टुकड़ा, इंच-इंच करके बनाया है I रंगमंच में मेरी नींव सही मायने में कठोर परिश्रम के गारे से बनी है I यदि आप स्वयं को धोखा नहीं देते तो समय और किस्मत भी आपको धोखा नहीं देंगे I यह मेरे दर्शन का एक भाग है I सही है या गलत केवल भगवान जानता है I’’ यह आत्मकथा महान अभिनेता अमरीश पुरी के बहुआयामी व्यक्तित्व से साक्षात्कार कराती है I वे एक दार्शनिक की तरह जीवन के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन करते हैं और अभिनय कला के शिक्षक की तरह रंगमंच व फिल्मों की अनुभवसिद्ध बारीकियों को उजागर करते हैं I वे अपनी कला को निखारने के लिए किसी तपस्वी की तरह निरंतर साधना करते रहते हैं I वे कठोर परिश्रमी, आज्ञाकारी और समर्पित अभिनेता हैं I उनकी कला साधना उनकी फिल्मों में दृष्टिगोचर होती है I
ईश्वर में उनका अटूट विश्वास है I यह संस्कार उन्हें अपने माता-पिता से मिला है I उनके पिताजी प्रत्येक मंगलवार को उनको हनुमान जी के मंदिर में लेकर जाते थे I उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है-‘’बाऊजी हमें संस्कृति की शिक्षा देने के मामले में भी बहुत कठोर थे I मंगलवार के दिन क्नॉट प्लेस के निकट हनुमान मंदिर में जाना अनिवार्य होता था I मुझे आज भी हर सप्ताह उस मेले में जाना याद है I बाऊजी मंदिर के बाहर मिठाई की एक दुकान से प्रसाद के लिए बूँदी और बर्फी खरीदा करते थे I वे दोनों ही मिठाइयाँ बहुत बढ़िया होती थीं I मैंने आज तक उतनी स्वादिष्ट मिठाई नहीं खायी है I हमें इस दिन पाँच पैसे मिला करते थे I इनमें से एक पैसा मंदिर में चढ़ाया जाना होता था I त्याग की भावना विकसित करने के लिए ऐसा किया जाता था I मैं बहुत धार्मिक प्रवृत्ति का हूँ और आज भी प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करता हूँ I’’ उनके पिताजी उन्हें अम्बरीश लाल कहकर बुलाते थे I अमरीश जी का जन्म 22 जून 1932 को पंजाब के नौशहर में हुआ था I उस समय यह जालंधर जिले का एक गाँव था जो अब शहर बन गया है I उनके पिताजी दिल्ली में सरकारी नौकरी करते थे I उनका बचपन दिल्ली में गुरुद्वारा बंगला साहिब के निकट इर्विन रोड पर क्वार्टर नं-39 में बीता I शिमला और नौशहर में भी उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई I उनके पिताजी सरकारी विभाग में क्लर्क थे I पिताजी का वेतन बहुत कम था, फिर भी वे बच्चों की शिक्षा और देखभाल पर पर्याप्त ध्यान देते थे I गर्मी में अंग्रेज वायसराय के पूरे कार्यालय का स्थानांतरण शिमला हो जाता था I इसलिए हर छह माह पर उनके पिताजी का स्थानान्तरण भी दिल्ली से शिमला हो जाता था I इस प्रकार उनका बचपन दिल्ली, शिमला और नौशहर की गलियों में बीता I
गाँव के लोगों के प्रति अमरीश पुरी जी का निश्छल अनुराग था I जब भी वे फिल्मों की सूटिंग के लिए गाँवों में जाते थे तो लोग उन्हें बहुत प्यार देते थे I अमरीश पुरी जी ने लिखा है-‘’आप गाँवों में ‘जीवन’ को सही मायने में जीते हैं I मैं आज भी वायु की शुद्धता और चारों तरफ हरियाली को ललचाता हूँ I कुएं के निकट खड़े होकर पानी की बाल्टी को ऊपर खींचे जाने और कतार में लगे ढेरों घड़ों में उंडेले जाते देखना बहुत अच्छा लगता था I हम पूरी तरह से निश्चिन्त हो गए थे और अपनी पढ़ाई को भूल ही गए थे I आज भी मुझे इन साधारण और सीधे-सादे लोगों को देखना बहुत अच्छा लगता है I उनके साथ समय बिताना और उनकी निष्कपट व भोली-भाली बातें, कहानियाँ सुनना तथा इन स्थानों में सच्चे मानव जीवन को जानना मुझे बहुत लुभाता है I’’ अमरीश पुरी जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए थे I राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन्हें हिंदू धर्म, देशानुराग और अनुशासन की शिक्षा दी I उन पर आर.एस.एस. के प्रशिक्षण का प्रभाव आजीवन रहा I उन्होंने लिखा है-‘’मैं पूरी ईमानदारी के साथ यह स्वीकार करता हूँ कि मेरी जीवन शैली, रंगमंच और फिल्मों में जो भी अनुशासन-बोध दिखाई देता है वह सब किशोरावस्था के दौरान आर.एस.एस. के साथ मेरे संपर्कों की देन है I जैसा कि कहा जाता है कि समान विचारधारा के लोग इकट्ठे हो जाते हैं, यह अपने आप में विचित्र संयोग ही था कि मेरे रंगमंच के गुरु पंडित सत्यदेव दुबे भी एक समय आर.एस.एस. में जुड़े रहे हैं I वे मुझसे प्रायः कहते कि हमारी मानसिक अनुशासनबद्धता के कारण ही हम बचे हुए हैं I’’ अमरीश पुरी जी ने लिखा है कि आर.एस.एस. ने उनको देश के प्रति जागरूक बनाया और उनके व्यक्तित्व के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया I प्रारंभ में वे शारीरिक व्यायाम के लिए आर.एस.एस. के प्रति आकर्षित हुए थे, लेकिन बाद में वे राष्ट्र के प्रति बलिदान की भावना से अत्यधिक प्रभावित हुए I वे भारतीय सेना में जाकर देश की सेवा करना चाहते थे, लेकिन सेना में उनका चयन नहीं हो सका जिसका उनको आजीवन पछतावा होता रहा I उन्होंने इसे नियति मानकर स्वीकार कर लिया I उन्होंने लिखा है-‘’मुझे एक पछतावा है कि सेना में मैं अपने देश की बेहतर ढंग से सेवा कर सकता था, परंतु आप अपने भाग्य के हाथों की कठपुतली होते हैं-वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है I आपको अपने जीवन के इस सत्य को स्वीकार करना पड़ता है I’’
अमरीश पुरी एक संवेदनशील इंसान थे I जब चालीस वर्षों के बाद उन्हें होशियारपुर में अपने कॉलेज में जाने का मौका मिला और दस हजार लोगों ने अपनी मुस्कुराहटों से उनका स्वागत किया, उन पर फूल बरसाए तो वे भावुक होकर मंच पर ही रोने लगे I के.एल.सहगल उनके रिश्तेदार थे I उन्होंने सहगल साहब के व्यक्तित्व और दुर्बलताओं का उल्लेख किया है I अधिक शराब पीने के कारण सहगल साहब का अल्पायु में निधन हो गया I सहगल साहब स्वाभाविक गायक और अभिनेता थे I सहगल साहब अपने घर जालंधर जाने से पहले अमरीश पुरी से मिलने आए थे I उन्होंने स्नेह के साथ अमरीश पुरी जी की पीठ थपथपायी थी I शायद वे अमरीश जी का हौसला बढ़ाना चाहते थे क्योंकि उनको फिल्मों में सफलता नहीं मिल रही थी I अमरीश जी ने लिखा है-‘’उन्होंने इतने स्नेह से मेरी पीठ थपथपायी कि उसकी अमिट छाप आज भी मेरे मन-मस्तिष्क में बनी हुई है I हमें फिर कभी नहीं मिलना था, यह काफी दुखद था I वे बहुत कमजोर दिखाई दे रहे थे और दुबले होकर अस्थिपिंजर के समान रह गए थे I वे बाँस के समान पतले, परंतु बहुत स्नेहशील और भावप्रवण थे I वास्तव में उन्हें यह पूर्वाभास हो गया था कि वे बहुत दिन तक जीवित नहीं रहेंगे और शायद वे अंतिम बार हमसे मिल रहे थे I वे शराब की बोतल नहीं, रम का ड्रम पीते और उनकी यह कमजोरी ही उनके अंत का कारण बनी I’’
अमरीश जी ने वर्षों तक कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ई.एस.आई.सी.) में यूडीसी और इंस्पेक्टर के पद पर नौकरी की I दिन में नौकरी और रात्रि में रंगमंच I उनके साथ ई.एस.आई.सी. में काम करनेवाली मराठी लड़की उर्मिला से उनको प्रेम हो गया I वे उर्मिला से शादी करना चाहते थे I लड़का पंजाबी और लड़की मराठी I उर्मिला पंजाबी लड़की नहीं थी I इसलिए अमरीश पुरी जी के पिता और मामा शादी का विरोध कर रहे थे I अमरीश पुरी जी के पिताजी रूढ़िवादी थे I वे इस विवाह के खिलाफ थे, लेकिन अमरीश जी की जिद्द के सामने पिताजी को झुकना पड़ा और अंततः उर्मिला उनकी धर्म पत्नी बनी I अमरीश पुरी जी ने अपने माता-पिता को गर्व के साथ याद किया है I उन्होंने अपनी माता जी को अन्नपूर्णा की संज्ञा दी है I अपनी माँ के बारे में उन्होंने लिखा है-‘’सदैव दूसरों को कुछ देती, कठोर परिश्रमी, समर्पित, कोमल ह्रदय और पवित्र आत्मा बीजी एक सम्पूर्ण अन्नपूर्णा थीं I कई बार मैं उनकी गोद में लेट जाता और बहुत सुरक्षित अनुभव करता I उन्होंने बड़े प्यार से हमारा पालन-पोषण किया I परिवार में अपनेपन की अनुभूति कूट-कूट कर भरी थी जो आज भी मौजूद है I कोई विरोध-भाव नहीं था I बड़ों में नैतिक उत्तरदायित्व की भावना थी जो उनके सहयोगपूर्ण व्यवहार में दिखाई देती थी, बीजी साहसी महिला थीं I”
‘जीवन के रंगमंच’ के दूसरे भाग का शीर्षक ‘शो बिजनेस’ है I अमरीश पुरी जी को फिल्मों के लिए लंबा संघर्ष और इंतजार करना पड़ा था I फिल्मों से पहले वे रंगमंच पर अपनी अभिनय कला का जलवा बिखेर चुके थे I रंगमंच ने उनकी अभिनय प्रतिभा को परिष्कृत कर दिया था I अपनी आत्मकथा में अमरीश पुरी जी ने समकालीन अभिनेताओं के व्यक्तित्व और अभिनय प्रतिभा का वर्णन किया है I शुरू में अमरीश पुरी जी की कुछ फ़िल्में असफल रहीं और उन्हें निराशा हुई, लेकिन उनकी पत्नी उर्मिला जी ने उनका हौसला बढ़ाया I नायक बनने की उनकी तमन्ना पूरी नहीं हुई तो उन्होंने निगेटिव भूमिका करने का फैसला किया I उन्होंने लिखा है-‘’मेरा जैसा व्यक्तित्व है, मेरी आवाज, मेरी आँखें……..खलनायक की भूमिका मेरे लिए सर्वाधिक अनुकूल थी I मैं खलनायक जैसा ही दिखता था I इस प्रकार से यह छवि मुझसे चिपक ही गई I बुरी भावनाएं बहुत सरलता से चेहरे पर अभिव्यक्त हो जाती थीं और ऐसा लगता था कि दर्शक मुझे खलनायक के चोले में ही अधिक चाहते थे I’’
उन्होंने गिरीश कर्नाड की प्रतिभा की खूब प्रशंसा की है I उन्होंने उनके लिखे नाटकों ‘ययाति’ और ‘हयवदन’ में अभिनय किया I उन्होंने गिरीश कर्नाड की कन्नड़ फिल्म ‘काडू’ में काम किया I यह फिल्म सफल सिद्ध हुई और इसने अमरीश जी के जीवन की दिशा बदल दी I उन्होंने लिखा है-‘’काडू एक ऐसी फिल्म थी जिससे मेरा जीवन, मेरा कैरियर और मेरा सामाजिक स्तर परिवर्तित होना लिखा था I गिरीश ने मेरे व्यक्तित्व पर पक्का खलनायक होने की मोहर लगाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया I श्याम बेनेगल ने भी ‘काडू’ फिल्म देखी थी, इसीलिए उन्होंने अगले वर्ष मुझे अपनी फिल्म ‘निशांत’ के लिए चुना I” अमरीश पुरी जी ने ‘मंथन’ और ‘भूमिका’ फिल्म में भी अभिनय किया I ‘निशांत’ उनकी यादगार फिल्म थी जिसने उनके कैरियर को ऊँचाई पर पहुँचाया I अमरीश पुरी जी ने अमिताभ बच्चन, नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल आदि समकालीन कलाकारों के व्यक्तित्व और अभिनय कला की भूरी-भूरी प्रशंसा की है I उन्होंने लिखा है-‘’मैंने स्मिता के साथ जिस अंतिम फिल्म में काम किया वह थी ‘वारिस’ और तब बच्चे के जन्म के दौरान उनकी अचानक मृत्यु हो गई और हम सब भौंचक्के रह गए I वह हमारे उद्योग की एक धरोहर बन चुकी थी I उनके वर्ग की और भी अनेक अभिनेत्रियाँ हुई हैं, परन्तु कोई भी उनकी असाधारण प्रतिभा के समकक्ष नहीं हो सकी I हमने एक महान अभिनेत्री और एक अनुपम इंसान को खो दिया था I’’
‘काडू’ फिल्म ने अमरीश पुरी जी के जीवन की दिशा बदल दी I इस फिल्म ने उनके कैरियर और सामाजिक स्तर के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया I उनकी मान्यता थी कि ‘कला सिनेमा’ जैसा कुछ नहीं होता है I कुछ फ़िल्में अधिक कलात्मक ढंग से बनायी जाती हैं, लेकिन व्यावसायिक सफलता सभी फिल्मों के लिए आवश्यक है I अमरीश पुरी जी टी.वी.शो से बचते थे I इसलिए उन्होंने ‘रामायण’ में रावण की भूमिका करने से मना कर दिया था I उन्होंने लिखा है-‘’छोटा पर्दा मेरे लिए सदैव एक अभिशाप रहा है I टेलीविजन कलाकार की रहस्यात्मकता को नष्ट कर डालता है और उसे आवश्यकता से अधिक उद्घाटित कर देता है I मुझे उससे घृणा है I मैंने विरले ही टीवी इन्टरव्यू दिए हैं I मेरी किताब में इसके प्रति सदा नकार ही रहा है I फिर भी उन्होंने श्याम बेनेगल के धारावाहिक ‘भारत : एक खोज’ में दो किश्तों में काम किया था I इस धारावाहिक में उन्होंने श्याम बेनेगल से अपने रिश्ते के कारण काम किया I अमरीश पुरी की व्यावसायिक रूप से पहली सफल फिल्म ‘कुर्बानी’ थी जिसका निर्माण फिरोज खान ने किया था और यह 1980 में प्रदर्शित हुई थी I इस फिल्म में उनकी भूमिका छोटी थी, लेकिन दर्शकों ने उस भूमिका में उनको पसंद किया था I 1970 के दशक के अंत तक उन्हें प्राण, मदन भाई, प्रेम चोपड़ा, अजित, मनमोहन, कादर खान, अमज़द खान जैसे सुस्थापित खलनायकों के साथ कड़ी प्रतियोगिता करनी पड़ी I प्राण के अभिनय की प्रशंसा करते हुए उन्होंने लिखा है-‘’पर्दे पर प्राण साहब की उपस्थिति हिलाकर रख देती थी क्योंकि वे भय उत्पन्न करते थे I मैंने जब 1940 में फ़िल्में देखना शुरू किया तो उस समय मुझे वे बहुत सुंदर लगे I उनकी आँखें बहुत बोलती-सी थीं I’’ वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिल्म ‘हम पांच’ उनके कैरियर में मील का पत्थर साबित हुई I इस फिल्म के बाद अमरीश जी के पास खलनायक की भूमिकाओं की बाढ़ आ गई I वे रिलीज होनेवाली हर दूसरी व्यावसायिक फिल्म में अभिनय कर रहे थे, साथ-साथ वे कला फिल्मों में भी अभिनय कर रहे थे I
अमरीश जी ने अमिताभ बच्चन के अभिनय और व्यक्तित्व की बहुत प्रशंसा की है I उन्होंने लिखा है कि वे गंभीरता से अपना होमवर्क करते थे और बारीकी से दृश्यों को समझते थे I वे अपनी कला को निखारते रहते थे I अमरीश पुरी जी ने दो अंतरराष्ट्रीय फिल्मों ‘गांधी’ और ‘इंडियाना जोन्स’ में काम किया जिसने उन्हें विश्वविख्यात बना दिया I वे विदेश में भी लोकप्रिय थे, लेकिन वे लम्बे समय तक भारत से दूर नहीं रह सकते थे I उन्होंने कभी आत्मविज्ञापन नहीं किया I वे भारत के पहले अभिनेता थे जिन्होंने हॉलीवुड़ में बड़ी भूमिका की थी I उनकी ‘नागिन’ फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया था जिसमें वे एक तांत्रिक की भूमिका में थे I इस फिल्म की नायिका श्रीदेवी थीं I अमरीश जी ने श्रीदेवी की अभिनय कला की बहुत सराहना की है I ‘मिस्टर इंडिया’ में उनका तकिया कलाम ‘मोगंबो खुश हुआ’ बहुत लोकप्रिय हुआ था I उस पात्र को अमरीश जी ने गढ़ा था I श्रीदेवी और अनिल कपूर ने मोगंबो नामक प्यारा बैंड बनाने में भरपूर सहयोग दिया था I अमरीश पुरी जी ने लिखा है-‘’अनिल कपूर और श्रीदेवी ने मुझे प्यारा-सा बैड मोगैम्बो बनाने में भरपूर सहयोग दिया I श्रीदेवी में सही समय की पहचान, भावनाओं की अभिव्यक्ति और हास्य का तत्व अतुलनीय है I इनका उन्होंने ‘मिस्टर इंडिया’ में भी प्रदर्शन किया है I फिल्म ने बॉलीवुड में धूम मचा दी थी I’’ कुछ लोगों ने ‘शोले’ और ‘मिस्टर इंडिया’ की तुलना की, लेकिन दोनों फिल्मों की पृष्ठभूमि भिन्न थी I इसलिए दोनों फिल्मों में तुलना करना उचित नहीं है I ‘मिस्टर इंडिया’ की अपार सफलता ने अमरीश जी का बाज़ार भाव बहुत बढ़ा दिया था और उस फिल्म के तत्काल बाद उन्होंने 25-30 फ़िल्में साइन कर लीं I
अमरीश पुरी जी ने अपनी आत्मकथा में व्यावहारिक दृष्टिकोण से अभिनय, पटकथा, खलनायक और रंगमंच को पारिभाषित किया है I वे स्वयं में अभिनय कला के एक महाविद्यालय थे I उन्होंने नायक और चरित्र अभिनेता के बारे में लिखा है-‘’चरित्र अभिनेता यदि अपने काम में कुशल नहीं है तो फिल्म का आधार सुदृढ़ नहीं हो सकता I नायक कंक्रीट की छत के समान है और चरित्र अभिनेता स्तम्भ है I यदि स्तम्भ कमजोर होंगे तो पूरी छत भरभरा कर गिर जाएगी, फिल्म बिखर जाएगी I नायक सक्षम चरित्र अभिनेता की सहायता के सिवा कुछ नहीं होता I इसलिए सहायक अथवा सपोर्टिंग कलाकारों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है I’’ अमरीश पुरी जी ने दिलीप कुमार, राजकुमार, सुभाष घई, राजकपूर आदि दिग्गज कलाकारों के बारे में विस्तार से लिखा है I दिलीप कुमार धैर्यपूर्वक अपनी फिल्मों की तैयारी करते थे I उनके व्यक्तित्व में संतुलन था और अभिनय के संबंध में उनका नजरिया स्पष्ट था I राजकुमार के अभिनय की एक अलग शैली थी I अमरीश पुरी जी ने लिखा है कि राजकुमार महान कलाकार नहीं, बल्कि एक शानदार व्यक्ति थे और उनकी आवाज दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ती थी I राजकुमार बहुत अध्ययनशील व्यक्ति थे I
अमरीश पुरी जी की आत्मकथा में रंगमंच और सिनेमा से जुड़े हुए कलाकारों के लिए ज्ञान के मोती बिखरे पड़े हैं I उन्होंने आत्मकथा में अपने जीवन और रंगमंच के अनुभवों को साझा किया है I इसलिए उनकी आत्मकथा का प्रत्येक पृष्ठ अभिनय कला की बारीकियों का संदर्भ ग्रंथ बन गया है I उन्होंने सुभाष घई को एक कुशल निर्देशक कहा है I उन्होंने ‘चाची-420’, ‘चाइना गेट’, ‘घटक’, ‘परदेस’ आदि फिल्मों के अनुभव साझा किए हैं I उन्होंने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ फिल्म की चर्चा करते हुए अपना दुःख व्यक्त किया है कि इस फिल्म के लिए दस अवार्ड दिए गए थे, लेकिन उनका नाम विजेताओं की सूची में नहीं था I इस कारण उन्हें दुःख पहुँचा था I हिंदी और अंग्रेजी के अतिरिक्त अमरीश पुरी जी ने कन्नड़, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, मलयालम आदि क्षेत्रीय भाषाओँ की फिल्मों में भी काम किया था I अमरीश पुरी जी ने अनेक सकारात्मक भूमिकाएँ भी की थीं, लेकिन उनका परिचय हमेशा फिल्म उद्योग के सबसे बड़े खलनायक के रूप में ही दिया जाता था जिसके कारण उनके मन को ठेस पहुँचती थी I सच्चाई यह थी कि खलनायकी की तुलना में चरित्र भूमिकाओं के लिए उन्हें अधिक अवार्ड मिले थे I
आत्मकथा के तीसरे भाग का शीर्षक ‘जीवित रहने की कला’ है I इस भाग में उन्होंने धैर्य, अच्छाई, ईमानदारी, मानवता, अनुशासन, विनम्रता आदि मानवीय मूल्यों के महत्त्व को रेखांकित किया है I वे बड़े अभिनेता के रूप में स्थापित हो चुके थे, उनका यश दिग्दिगंत में व्याप्त हो चुका था, वे नाना-दादा बन चुके थे I इतनी ख्याति अर्जित करने के उपरांत भी वे जमीन से जुड़े हुए थे I सफलता और ख्याति ने उन्हें अहंकारी नहीं बनाया था I इसलिए जब उनसे पूछा जाता था कि उनकी सफलता का क्या अर्थ है तो वे उत्तर देते थे-दिमाग ठिकाने पर रहना I उन्होंने अपना जीवन दर्शन व्यक्त करते हुए लिखा है-‘’मेरे जीवन का आधारभूत दर्शन यह है कि धैर्य का फल सदा मीठा होता है I अतः कभी भी स्वयं से धोखा न करो I मैंने अपने जीवन में तो यही सीखा है कि तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद यदि आप अपने लक्ष्यों के प्रति दृढ रहते हैं तो देर-सवेर आपको अपना लक्ष्य प्राप्त हो ही जाता है और कठोर परिश्रम से प्राप्त सफलता का कोई सानी नहीं है I’’ अमरीश पुरी का पाखंडहीन व्यक्तित्व और काम के प्रति निष्ठा उनकी विशिष्टता थी I अनुशासन उनके जीवन का मूल मंत्र था I वे अन्य कलाकारों की तरह निर्माताओं व निर्देशकों की चापलूसी नहीं करते थे I उन्होंने अपना कोई सेक्रेटरी नहीं रखा था I फिल्म निर्माता उनसे सीधे बात करते थे और वे अपना फोन खुद अटेंड करते थे I उन्होंने लिखा है-‘’काम प्राप्त करने की इच्छा से लोगों को प्रसन्न करने के मैंने कभी कोई असामान्य प्रयास नहीं किए I अतः स्वयं को इतना बढ़िया बना लो कि लोग आपके पीछे आएं और थाली में रखकर आपको काम परोसें I निःसंदेह क्वालिटी और ईमानदारी से किया गया काम और अधिक काम दिलवाता है I’’
सादा जीवन उच्च विचार उनका जीवन दर्शन था I वे किसी तामझाम, तड़क-भड़क और जी हुजूरी में विश्वास नहीं करते थे I उन्होंने लिखा है-‘’जब मैं सुनता हूँ कि दूसरे कलाकारों के पास कारों का काफिला है, चापलूसों का जमावड़ा है और नौकरों की पूरी सेना है तो मुझे डर लगता है I मुझे तो बस अभिनय की लत है I मैं जितना अधिक अभिनय करता हूँ उतनी ही अधिक यह लालसा बढ़ती जाती है I मैं एक नशाखोर, एक व्यसनी की भांति काम करता रहता हूँ I” अमरीश जी अपने रिश्तों को संभालकर रखते थे I उनका पारिवारिक जीवन भी सुखी था और वे अपने परिवार के सदस्यों का पूरा ध्यान रखते थे I वे अपनी प्रसिद्धि से अपने मित्रों व रिश्तेदारों को आतंकित नहीं करते थे I उन्होंने लिखा है-‘’मेरा परिवार मेरा किला है I मेरे प्यारे नाती-पोते साची, हर्ष, कृश और शांतनु मुझे बहुत प्रिय हैं I उनके साथ समय बिताकर मुझे आनंद की अनुभूति होती है I” उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपनी पत्नी को दिया है I वे अपने परिवार को फ़िल्मी दुनिया से दूर रखते थे I उनको भारतीय शास्त्रीय संगीत पसंद था और पंडित जसराज, भीमसेन जोशी, वसंत राव, देशपांडे और गुलाम अली को सुनते रहते थे I उन्होंने मुख्य अभिनेताओं की दो पीढ़ियों के साथ काम किया I उन्होंने अमिताभ बच्चन और अभिषेक, धर्मेन्द्र और सन्नी-बॉबी देवोल, राजेन्द्र कुमार और कुमार गौरव, जितेन्द्र और तुषार कपूर, नूतन और मोहनीश, राकेश रोशन और ऋतिक, जीवन और किरण कुमार आदि के साथ काम किया I
अमरीश जी फिल्म उद्योग में हो रहे बदलाव के तो प्रशंसक थे, लेकिन अभिनय में निपुणता की जगह स्टारडम को महत्व दिए जाने से दुखी थे I उन्होंने लिखा है कि अठारह दिनों का क्रेश कोर्स करने के बाद ही अनेक लोग अभिनय करने लगते हैं जबकि सतत अभ्यास और प्रशिक्षण से ही अभिनय कला में कोई व्यक्ति निपुण बन सकता है I वे गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं करते थे I उन्होंने अभिनेता बनने के इच्छुक लोगों को सलाह दी है कि वे सबके साथ शालीन, सहयोगी और मानवीय व्यवहार करें I उनको अपने मेकअप मैन, ड्रेस डिजाइनर, कैमरामैन के प्रति भी शालीन होना चाहिए क्योंकि पर्दे पर सुंदर दिखने में वे सहायता करते हैं I व्यक्ति को अपने पाँव जमीन पर रखना चाहिए I ईश्वर की सत्ता में उनका विश्वास था I उन्होंने लिखा है कि वे अनावश्यक भजन-कीर्तन नहीं करते हैं, लेकिन सृष्टिकर्ता में उनकी पूरी आस्था है I अमरीश जी ने लिखा है-‘’मनुष्य ने उसे ‘भगवान’ नाम दिया है I हाँ, मैं उसमें और उसकी शक्ति में विश्वास करता हूँ I मैं जानता हूँ कि जो भी हो जाए, कुछ चीजें सदा अवर्णनीय होंगी क्योंकि ‘वह’ उन्हें ऐसा ही चाहता है I यह जीवन उसकी इच्छा का स्वरूप है I उसके हाथ में घड़ी है और वह निर्णय करता है कि कौन आएगा और जाएगा I आध्यात्मिक होने के लिए हमें ‘उसके’ साथ बात करने का प्रयत्न करना चाहिए I भगवान के साथ मेरा संबंध मेरा अपना है I मैं स्वयं ही उसे पारिभाषित करता हूँ I”
अमरीश जी कर्म में विश्वास करते थे I निरंतर काम करना उनका व्यसन था I म्रत्यु तो अटल सत्य है, लेकिन मनुष्य को कुछ ऐसा कार्य करना चाहिए जिसके कारण उसे बाद में भी याद रखा जाए I अमरीश जी ने लिखा है-‘’कोई नहीं जानता कि कब अंतिम बुलावा आ जाएगा I अतः हमें जीवन में किसी न किसी रूप में अवश्य लौटना चाहिए I मैं जानता हूँ कि एक दिन मुझे इस संसार से जाना है, परंतु वह दिन आने से पहले मैं अपने सब अनकिए और अधूरे काम पूरे करना चाहता हूँ I जीवन की मृत्यु से तुलना करते हुए जो सबसे अच्छी बात मैं सोच सकता हूँ वह अपने काम के माध्यम से जीवित रहने की आशा है I यदि आप इतिहास रचना चाहते हैं और चाहते हैं कि सच ही ऐसा हो तो केवल आपका काम ही बोलेगा I अतः मैं कभी अपना काम बंद नहीं करूँगा, केवल मृत्यु ही पर्दा गिराएगी I” अमरीश पुरी ने खलनायकी की एक नई शैली विकसित की और अपने दमदार अभिनय से इतिहास रच दिया I जब तक सृष्टि रहेगी अमरीश पुरी जी अभिनय जगत को प्रेरित करते रहेंगे I
पुस्तक-जीवन का रंगमंच (आत्मकथा)
लेखक-अमरीश पुरी
प्रकाशक-वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
वर्ष-तृतीय पेपरबैक संस्करण-2023
पृष्ठ-328
