पुस्तक समीक्षा

भारत का स्विट्जरलैंड है पूर्वोत्तर

रूपसिंह चन्देल

पर्यटन आज विश्व के सबसे तेजी से विकसित होने वाले उद्योगों में से एक है. दुनिया के अनेक देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को उन्नतिशील बनाने के लिए इसके विकास पर बहुत ध्यान दिया है. महान रूसी लेखक फ्योदोर दॉस्तोएव्स्की अपने मित्रो को लिखे पत्रों में योरोप के अनेक देशों में रहने के अपने कटु अनुभव के बारे लिखा हैं. आज का स्विट्जरलैंड तब बहुत अविकसित था. सड़कें धूल भरी होती थीं. अन्य देशों का भी यही हाल था. उन देशों ने अपने देश के प्राकृतिक सौन्दर्य और ऎतिहासिक महत्व को समझा और उन्हें पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया. फ्रांस, स्पेन, अमेरिका, तुर्की, इटली, मैक्सिको, जर्मनी, जापान, ग्रीस, मिश्र, अजरबैजान, तजाकिस्तान, चीन, मालदीव, श्रीलंका, रूस, स्विट्जरलैंड, दुबई, इंडोनेशिया, चीन, मलेशिया आदि बड़े और छोटे देशों ने पर्यटन के महत्व को समझा. आज बड़ी संख्या में भारतीय पर्यटक तजाकिस्तान, तुर्केमेनिस्तान, अजरबैजान, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों में घूमने जाते हैं. इसका प्रमुख कारण वहां का प्राकृतिक सौन्दर्य और ऎतिहासिक विरासत है. यह इन देशों में भ्रमण करने जाना उतना मंहगा नहीं है जितना भारत में है. दुखद स्थिति यह है कि भारत सरकार आज भी पर्यटन को उद्योग के रूप में विकसित नहीं कर सकी है. पर्यटन की दृष्टि से बहुत ही समृद्ध पूर्वोत्तर भारत के विकास के प्रति सरकारें उदासीन रहीं. अब बेशक उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने और पर्यटन की दृष्टि से विकास किए जाने के प्रयास प्रारंभ हुए हैं, लेकिन यह प्रयास अपर्याप्त हैं. शायद यही कारण है कि आम भारतीय पूर्वोत्तर की ओर रुख करने के बजाए मालदीव, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया या सोवियत संघ का हिस्सा रहे कुछ देशों की ओर जाता है. धनाड्य वर्ग दुबई, अमेरिका, यूके, फ्रांस, और जर्मनी जाना पसंद करता है. डॉ.वीरेन्द्र परमार ने अपनी पुस्तक ‘पूर्वोत्तर के पर्यटन स्थल’ में पूर्वोत्तर के राज्यों पर विस्तार से अपना अध्ययन प्रस्तुत किया है. मेरा पूर्ण विश्वास है कि पूर्वोत्तर भारत के पर्यटन स्थलों पर शायद उनसे अधिक कार्य किसी ने नहीं किया. पूर्वोत्तर भारत पर केन्द्रित उनकी अब तक बीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.

   पर्यटन के महत्व को दुनिया के प्राचीन महापुरुषों ने समझा था और उन लोगों ने दुनिया के अन्य देशों के साथ भारत में वर्षों गुजारे और भारत की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्थितियों पर पुस्तकें भी लिखी थीं. उन महापुरुषों के कार्य के बारे में जानने के बाद जब मैं डॉ. वीरेन्द्र परमार के पूर्वोत्तर भारत के अवदान के बारे में सोचता हूं तब यह सोचने के लिए विवश होता हूं कि परमार जी ने वह कार्य किया है जो किसी सरकार या संस्था को करना चाहिए था. वीरेन्द्र जी के सरकारी सेवाकाल का अधिकांश समय पूर्वोत्तर राज्यों में बीता. बहुतों का बीता होगा और आज भी बड़ी संख्या में लोग केन्द्र सरकार और शिक्षण क्षेत्र में वहां अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन वे आमजनों की भांति अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद वापस लौट जाते हैं. लेकिन वीरेन्द्र परमार ने वहां अपने पदस्थ कार्यकाल को व्यर्थ नष्ट नहीं किया. उन्होंने उन राज्यों के सामाजिक, भौगोलिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक आदि सभी विषयों का अध्ययन किया, उन राज्यों का भ्रमण किया और एक के बाद अनेक पुस्तकें प्रकाशित कीं. भूमिका में वह लिखते हैं-“मैं विगत तैंतीस वर्षों से पूर्वोत्तर के लोकजीवन और संस्कृति विषयक लेखन कर रहा हूं. पूर्वोत्तर पर मेरी बीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, लेकिन अभी तक पूर्वोत्तर के प्रति भारतवासियों के अपरिचय की बर्फ पूरी तरह नहीं पिघल सकी है.”

   वीरेन्द्र परमार के कार्य को मैं प्राचीन भारत में भ्रमणार्थ आए विद्वानों के कार्य के समान महत्वपूर्ण मानता हूं. उन्होंने जो योगदान दिया है वह अभूतपूर्व तो है ही, उन्हें भारत आए उन महान पर्यटकों की श्रेणी में स्थान प्रदान करता है. ऎसा लिखने का दुस्साहस इसलिए कर पा रहा हूं क्योंकि उनसे पहले किसी ने भी इतना विशद कार्य पूर्वोत्तर भारत पर नहीं किया. राहुल सांकृत्यायन ने बहुत यात्राएं कीं और जहां गए उन स्थानों को केन्द्र में रखकर लिखा भी. ‘मेरी लद्दाख यात्रा’, ‘तिब्बत में सौ वर्ष’, ‘तिब्बत में प्रवेश’ ‘किन्नर देश में’ (हिमालय क्षेत्रों का यात्रा वर्णन). विद्यानिवास मिश्र,अज्ञेय, विष्णु प्रभाकर, गोविन्द मिश्र, भगवत शरण उपाध्याय, नागार्जुन आदि हिन्दी लेखक भी भ्रमणशील रहे, लेकिन इनमें एक ने भी पूर्वोत्तर की यदि यात्रा की भी तो उस पर लिखा नहीं. भारत में भ्रमण के लिए आए जिन लोगों की विशेष चर्चा होती है उनमें मेगास्थनीज (302 ई.पू.), फाह्यान (405-411 ई.), ह्वेन्सांग (630-645 ई.), अरब यात्री अल-बरूनी (1024-1030), मार्को पोलो (1292-1294), इब्न बतूता (1333-1347), अब्दुल रज्जाक (1443-1444). मेगास्थनीज चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी राजदूत था. उसने मौर्यकालीन भारत पर ‘इंडिका’ नामक पुस्तक लिखी थी. फाहियान (Fa-Hien ) एक बौद्ध यात्री था. उसने फो-गुओ-जी (अर्थात बौद्ध राज्यों का विवरण–Record of Buddhista kingadoms) पुस्तक लिखी. वह चन्द्रगुप्त द्वीतीय के शासन काल में आया था और अपनी पुस्तक में उसने उस काल के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थितियों का विस्तृत वर्णन किया है. ह्वेनसांग (Hiuen-Tsang) हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था. उसने सी-यू-की (Great Tang Records on the Western Regions) पुस्तक लिखी जिसमें उसने सातवीं शताब्दी के भारत सहित मध्य एशिया की अपनी यात्राओं का विस्तृत वर्णन किया है, जिसमें तत्कालीन समाज, धर्म और शिक्षा, विशेषरूप से नालंदा विश्वविद्याल का महत्वपूर्ण विवरण प्राप्त होता है. अल-बरूनी फारसी विद्वान था जो महमूद गजनवी के साथ आया था. उसने ‘किताब-उल-हिंद’ लिखी थी. इब्न बतूता  मुहम्मद बिन तुगलक के समय भारत आया. वह मोरक्को का निवासी था. उसने ‘रेहला’ नाम से अपना यात्रा वृत्तांत  लिखा.

   भारत भ्रमण के लिए आए उपरोक्त यात्रियों के अतिरिक्त भी समय-समय पर यात्री आए और उन्होंने भी यहां के बारे में लिखा. हंगरी के फारसी विद्वान गेरमानुस को रवीन्द्रनाथ टैगोर शांतिनिकेतन में 1930 में पढ़ाने के लिए लाए, जहां वह तीन वर्ष रहे थे. उनकी पत्नी थीं हजनोशी गेरमानुस, जिन्होंने उत्तर भारत का भ्रमण किया और ‘शांतिनिकेतन की डायरी’ लिखी. यद्यपि यह पुस्तक डायरी के रूप में लिखी गयी थी, लेकिन इसमें उत्तर भारत की तत्कालीन स्थितियों का विशद और तथ्यपूर्ण विवरण उन्होंने दर्ज किया, जिसे पढ़ते हुए पाठक को औपन्यासिक आनंद प्राप्त होता है. ऎसा ही आनन्द हमें वीरेन्द्र परमार की पुस्तक ‘पूर्वोत्तर भारत के पर्यटन स्थल’ पढ़ते हुए प्राप्त होता है. “देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 7.9 प्रतिशत भूभाग पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में समाविष्ट है”, जिसका बावन प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है. ‘पूर्वोत्तर भारत: प्रकृति का अनुपम उपहार’ में वीरेन्द्र जी लिखते हैं-“इस क्षेत्र में 400 समुदाय के लोग रहते हैं और लगभग 220 भाषाएं बोलते हैं. इस क्षेत्र की अधिकांश भाषाओं की अपनी कोई लिपि नहीं है, लेकिन लोककंठ में विद्यमान लोक साहित्य अत्यंत्र समृद्ध और बहु-आयामी है.” आगे के अध्यायों में वह बताते हैं कि किस राज्य में कौन-सी भाषा शासकीय मान्यता प्राप्त है और कौन-सी जन-सम्पर्क की भाषा है. इसी अध्याय में वह जनसांख्यिकी असंतुलन की बात करते हैं. बांग्लादेश से आए लोगों के कारण यह स्थिति बनी है. सरकारों की उदासीनता या कहना सही होगा कि वोट की राजनीति के कारण इसने आज गंभीर स्थिति पैदा कर दी है.

   वीरेन्द्र जी ने प्रत्येक राज्य (असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, सिक्किम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा) में प्रयोग होनेवाली भाषा, वहां की जनसंख्या, जातियां, उप-जातियां, भूभाग, संस्कृति, सामाजिक संरचना, जातीय चेतना आदि का विशद विवरण प्रस्तुत किया है. अरुणाचल प्रदेश में लगभग 25 प्रमुख जनजातियां हैं. वह उन जातियों के नाम ही नहीं बताते उनकी विशेषताओं, भाषा-संस्कृति आदि पर भी प्रकाश डालते हैं. उसी प्रकार मणिपुर में मैतेई के अतिरिक्त 29 आदिवासी समुदाय से हमें परिचित करवाते हैं. मैतेई आम बोलचाल की भाषा है. यह मणिपुर की राजभाषा और संपर्क भाषा है. उनके अनुसार “मणिपुरी भाषा उतनी ही प्राचीन है जितनी मैतेई जाति. —अन्य आदिवासियों की भाषा उन आदिवासियों के नाम से जानी जाती है, जैसे-तंगखुल, कुकी, पाइते इत्यादि.” मैतेई और कुकी जातियों का संघर्ष शायद भाषा संघर्ष भी है. वीरेन्द्र जी बताते हैं कि हिन्दी सभी राज्यों में संपर्क भाषा के रूप में प्रचलित हो गयी है. पूर्वोत्तर समुदायों में धार्मिक आस्था पर प्रकाश डालते हुए वह लिखते हैं, “पूर्वोत्तर की बहुत बड़ी आबादी प्रकृतिपूजक या जड़ात्मवादी है, लेकिन प्रकृतिपूजक समुदाय पर भी हिन्दू धर्म और संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है.—पूर्वोत्तर राज्यों में हिन्दू धर्मावलंबियों की संख्या सबसे अधिक है. —समाज में अनेक देवी-देवता हैं जिनकी पूजा-अर्चना की जाती है.—अगराउग, खोइला, खाजी, राजखंद्र, राजपुतुर, बुरा अली, असी मैनाव, साली मैनाव, बगराजा, बसुमती इत्यादि.” बोडो समाज में बिहू प्रमुख त्यौहार जो चैत्र के अंतिम दिन नववर्ष के उत्सव के रूप में मनाया जाता है. मिशिंग समुदाय प्रकृतिपूजक अथवा ब्रम्हवादी है, लेकिन ये अपने को हिन्दू धर्मावलंबी कहते हैं. उसीप्रकार होजांग समुदाय है. लेखक ने हलाम, जमातिया आदि समुदायों की धार्मिकता पर विस्तृत प्रकाश डाला है.

   वीरेन्द्र जी ने पूर्वोत्तर के प्रत्येक राज्य पर पृथक अध्याय में उनके सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और क्षेत्रीय विशेषताओं का तथ्यात्मक विशद विवरण प्रस्तुत किया है. पूर्वोत्तर में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्यों को अन्य राज्यों से रेलमार्ग और वायु मार्ग द्वारा जोड़ने का कार्य तेजी से किया जा रहा है. पर्यटन की दृष्टि से इस क्षेत्र को भारत का स्विट्जरलैंड कहा जा सकता है. यदि पर्यटन के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी को दूर कर लिया जाए तो देश की जीडीपी में इससे बहुत प्रगति होने की संभावना होगी. एक बात की ओर सरकारों को ध्यान देने की भी आवश्यकता है कि कोविड के बाद भारत में होटल बहुत मंहगे हो चुके हैं. इस ओर सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है. वीरेन्द्र परमार जी की इस पुस्तक से यह भी स्पष्ट है कि अभी भी पूर्वोत्तर में पर्यटन उद्योग के लिए बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है. पूर्वोत्तर को केन्द्र में रखकर लेखन के लिए वीरेन्द्र जी प्रशंसा के पात्र हैं. निश्चित ही पूर्वोत्तर घूमने जाने वालों के लिए यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है.

पुस्तक-पूर्वोत्तर के पर्यटन स्थल

लेखक-वीरेन्द्र परमार

प्रकाशक-के.एल.पचौरी प्रकाशन, गाजियाबाद

वर्ष-2026  

*वीरेन्द्र परमार

जन्म स्थान:- ग्राम+पोस्ट-जयमल डुमरी, जिला:- मुजफ्फरपुर(बिहार) -843107, जन्मतिथि:-10 मार्च 1962, शिक्षा:- एम.ए. (हिंदी),बी.एड.,नेट(यूजीसी),पीएच.डी., पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषिक,साहित्यिक पक्षों,राजभाषा,राष्ट्रभाषा,लोकसाहित्य आदि विषयों पर गंभीर लेखन, प्रकाशित पुस्तकें :1.अरुणाचल का लोकजीवन 2.अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य 3.हिंदी सेवी संस्था कोश 4.राजभाषा विमर्श 5.कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय 6.हिंदी : राजभाषा, जनभाषा,विश्वभाषा 7.पूर्वोत्तर भारत : अतुल्य भारत 8.असम : लोकजीवन और संस्कृति 9.मेघालय : लोकजीवन और संस्कृति 10.त्रिपुरा : लोकजीवन और संस्कृति 11.नागालैंड : लोकजीवन और संस्कृति 12.पूर्वोत्तर भारत की नागा और कुकी–चीन जनजातियाँ 13.उत्तर–पूर्वी भारत के आदिवासी 14.पूर्वोत्तर भारत के पर्व–त्योहार 15.पूर्वोत्तर भारत के सांस्कृतिक आयाम 16.यतो अधर्मः ततो जयः (व्यंग्य संग्रह) 17.मणिपुर : भारत का मणिमुकुट 18.उत्तर-पूर्वी भारत का लोक साहित्य 19.अरुणाचल प्रदेश : लोकजीवन और संस्कृति 20.असम : आदिवासी और लोक साहित्य 21.मिजोरम : आदिवासी और लोक साहित्य 22.पूर्वोत्तर भारत : धर्म और संस्कृति 23.पूर्वोत्तर भारत कोश (तीन खंड) 24.आदिवासी संस्कृति 25.समय होत बलवान (डायरी) 26.समय समर्थ गुरु (डायरी) 27.सिक्किम : लोकजीवन और संस्कृति 28.फूलों का देश नीदरलैंड (यात्रा संस्मरण) I मोबाइल-9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com

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