मिजोरम : आदिवासी और लोक साहित्य
डॉ जगन्नाथ पंडित
डॉ वीरेंद्र परमार का लेखन मूलत हिंदी भाषा और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के आदिवासी समुदाय, उनकी जीवन शैली, उनका इतिहास, साहित्य और उनकी सांस्कृतिक विरासत पर केंद्रित है I उन्होंने छात्र जीवन में जो शोध कार्य शुरू किया था, वह निरंतर गतिशील रहा जो उनकी प्रकाशित पुस्तकों से स्पष्ट होता है I उनकी एक शोध पुस्तक कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय और तीन हिंदी भाषा पर केन्द्रित है I सिर्फ पूर्वोत्तर भारत के राज्यों पर उनकी 24 शोध पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें ‘अरुणाचल का लोक जीवन’, ‘अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोक साहित्य’, ‘असम : लोक जीवन और संस्कृति’, ‘त्रिपुरा : लोक जीवन और संस्कृति’, ‘नागालैंड : लोक जीवन और संस्कृति’, ‘उत्तर-पूर्वी भारत के आदिवासी’, ‘पूर्वोत्तर भारत : अतुल्य भारत’ आदि हैं जिनमें उन्होंने वहां के भूगोल और इतिहास, वहां के आदिवासी, उनकी कला और संस्कृति, उनके लोक साहित्य, वहां के पर्यटन स्थलों आदि का शोधपरक अध्ययन किया है I एक साथ एक क्षेत्र पर इतनी सारी पुस्तकें शायद ही किसी लेखक ने हिंदी में लिखी हो I वह भारत सरकार (गृह मंत्रालय) के राजभाषा विभाग के अंतर्गत अरुणाचल प्रदेश और असम में विभिन्न पदों पर नियुक्त थे और पूर्वोत्तर के आठों राज्यों के दौरे पर जाते थे जहां उन्हें वहां के आदिवासी समुदाय की संस्कृति, कला और साहित्य तथा उनकी जीवन शैली को बहुत करीब से देखने-समझने का अवसर मिला I अतः पूर्वोत्तर राज्यों पर उनका लेखन अनुभव और अध्ययन पर आधारित है I इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि उनके द्वारा लिखित ये यह पुस्तकें पूर्वोत्तर राज्यों पर हिंदी में पुस्तकों के अभाव को पूरा करती हैं I इन पुस्तकों में वे पूर्वोत्तर भारत के उन राज्यों को खोज रहे हैं जहां सरकार का विकास रथ या तो पहुंच नहीं पाया है या वहां पर्याप्त विकास नहीं हुआ है और रेणु के ‘मैला आंचल’ की तरह लंबे समय तक उपेक्षित रहे हैं I कहना न होगा कि इन पुस्तकों के द्वारा वीरेंद्र परमार की शोधवृत्ति निरंतर परवान चढ़ती रही है I
‘मिजोरम : आदिवासी और लोक साहित्य’ भारत के अन्य पूर्वोत्तर राज्यों पर लिखित उनकी पुस्तकों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है जो ‘परिचय : भूमि और लोग’, ‘आदिवासी समुदाय’, ‘लोक साहित्य’, ‘पर्यटन स्थल’, ‘मिजोरम : एक झलक’ इन पांच अध्यायों में विभक्त है I प्रथम अध्याय में पूर्वोत्तर के आठ राज्यों का परिचय देकर उनके सामरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक महत्व और वहां की शोधपरक संभावनाओं को उभारा गया है I पूर्वोत्तर राज्यों की सांस्कृतिक विरासत, भाषिक, वेशभूषागत आदि में विविधता को देखते हुए लेखक ने इस क्षेत्र को भारत की सांस्कृतिक प्रयोगशाला तथा जीव जंतुओं की दुर्लभ प्रजातियां, वनस्पतियों और पुष्पों की अनेक प्रजातियों तथा औषधीय पौधों की अधिकता के कारण इसे ‘वनस्पतिविज्ञानियों, पुष्प विज्ञानियों और जंतु विज्ञानियों का स्वर्ग’ कहा है जो इस क्षेत्र का महिमामंडन और महत्वांकन है I इस पुस्तक को लिखते हुए लेखक ने जहां पूर्वोत्तर राज्यों की स्थानीय समस्याओं और संदर्भों को बड़ी तटस्थता के साथ प्रस्तुत किया है वहीं उनके राष्ट्रीय और भाषिक समस्याओं को भी उठाया है जो अत्यंत प्रासंगिक है I इस क्षेत्र में 220 भाषाएँ अस्तित्व में हैं, लेकिन वे लिपिविहीन किंतु लोक कंठों में विद्यमान हैं I इस क्षेत्र के अधिकांश राज्यों में हिंदी तृतीय भाषा के रूप में है जो हिंदी के प्रति उपेक्षा भाव का सूचक है क्योंकि आर्थिक विकास के नाम पर केंद्र सरकार द्वारा आबंटित पैसे नौकरशाह हजम कर जाते हैं I अतः पूर्वोत्तर के राज्य आर्थिक विकास से वंचित ही रह जाते हैं जबकि वहां बेशुमार प्राकृतिक संपदा और विकास की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं जिनका उपयोग विकास के लिए किया जा सकता है I लेखक की दृष्टि में यह विडंबनात्मक स्थिति है कि इस सूचना क्रांति के युग में हम विदेश की छोटी-छोटी घटनाओं से तो वाकिफ होते हैं, परंतु कई बार पूर्वोत्तर राज्यों की घटनाओं की जानकारी दिल्ली के संचार माध्यम नहीं दे पाते I इससे दिल्ली और पूर्वोत्तर के राज्यों के बीच एक कम्युनिकेशन गैप की स्थिति पैदा होती है जबकि दिल्ली से सभी राज्यों के तार जुड़े होने चाहिए I इन राज्यों के प्रति उपेक्षा भाव लेखक को खलता है I
लेखक की दृष्टि में पूर्वोत्तर राज्यों की एक बड़ी समस्या यह है कि वहां के समाज, साहित्य, संस्कृति और जीवन शैली पर हिंदी में पुस्तकों का अभाव है जबकि अंग्रेजी में अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं I शायद इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार करके उन्होंने पूर्वोत्तर क्षेत्र पर दो दर्जन पुस्तकें हिंदी में लिखी हैं ताकि हिंदी प्रेमी इन राज्यों से परिचित हो सकें I दूसरी अहम समस्या है अब तक हिंदी का विश्वभाषा न बन पाना जो लेखक के हिंदी के प्रति गहरे प्रेम तथा सरकार और अधिकारियों की सफलता को दर्शाती है I ‘जब तक हिंदी ज्ञान विज्ञान की भाषा नहीं बनेगी तब तक इसके वैश्विक स्वरूप की कल्पना नहीं की जा सकती I मात्र कविता, कहानी उपन्यास आदि के बल पर हम इसके वैश्विक स्वरूप की कल्पना नहीं कर सकते I भारतीय समाज, संस्कृति, अभियांत्रिकी, भौतिकी, रसायन, गृहविज्ञान, समाजशास्त्र, आदिवासी जीवन, सिनेमा, पर्यटन, महिला अध्ययन, धर्म, पर्व-त्योहार, फैशन, सोशल मीडिया, जनसंचार, भूगोल, मनोविज्ञान, मनोचिकित्सा, चिकित्साशास्त्र, शल्य क्रिया आदि ज्ञान-विज्ञान की विविध शाखाओं पर स्तरीय पुस्तकें प्रकाशित कर हम हिंदी को विश्व पटेल पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं I’ (मिजोरम : आदिवासी और लोक साहित्य) इन्होंने जिन समस्याओं की ओर संकेत किया है वे हम सभी तथा सरकार के समक्ष चुनौती है I पुस्तक में धर्मांतरण को भारत की एक अन्य बड़ी समस्या के रूप में चिन्हित किया गया है जिसमें ईसाईकरण और इस्लामीकरण प्रमुख है I धर्मांतरण खासकर दलित और आदिवासी बहुल इलाकों में होता है I इसलिए पूर्वोत्तर राज्य इसके विशेष शिकार बने I यहां ईसाईकरण खूब हुआ I मेघालय की राजनीति में ईसाई धर्म के विशेष प्रभावस्वरूप सरकारी तौर पर मेघालय को ईसाई राज्य घोषित किया गया है I मिजोरम की पूरी आदिवासी जाति ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है जो ईसाई धर्म के बढ़ते प्रभाव का सूचक है I लेखक ने इतिहास के आधार पर यह निष्कर्ष दिया है कि ‘पूर्वोत्तर की ईसाईकरण के इतिहास का अवलोकन करने से विदित होता है कि प्रशासनिक, राजनैतिक और रणनीतिक कारणों से इस क्षेत्र में ईसाई धर्म का प्रसार हुआ I ब्रिटिश शासको ने इस क्षेत्र में ईसाई धर्म के प्रसार के लिए विशेष प्रोत्साहन दिया I’ (वही, पृष्ठ 55) यह एक धार्मिक और राष्ट्रीय समस्या है कि पूर्वोत्तर राज्य में ईसाईयत के आने से वहां के आदिवासियों की लोक परंपराएं खत्म होती जा रही हैं, उसी के अनुरूप उनके संस्कार ढल रहे हैं और उनकी पहचान गायब होती जा रही है जिसे लेखक ने एक गंभीर समस्या के रूप में उठाया है I
इस्लाम धर्म ने भी पूर्वोत्तर राज्यों को विशेष प्रभावित किया है और इसके बढ़ते प्रभाव से अनेक सामाजिक, राजनीतिक गतिरोध पैदा हुए हैं I ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर लेखक ने लिखा है कि बंगाल के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत में इस्लाम का प्रवेश हुआ और मुगल काल में अनेक पीर, गाजी, औलिया, उपदेशक और इस्लाम के प्रचारक यहां आए जिनका उद्देश्य था गैर मुस्लिम समाज में इस्लाम का प्रचार और धर्म परिवर्तन करना I संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए लेखक का कथन है कि 1971-81 और 1981-91 की जनगणना के आंकड़ों की तुलना करते हुए बांग्लादेश से अचानक एक करोड़ व्यक्तियों के गायब होने पर चिंता व्यक्त की गई थी I एक करोड़ व्यक्ति कहां गए I इन्हें धरती निगल गई या आसमान खा गया I जाहिर है ये सभी अवैध रूप से भारत में आए I एक अनुमान के अनुसार असम में कम से कम एक करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं, लेकिन एनआरसी में महज 19 लाख घुसपैठियों को चिन्हित किया गया है I (वही-पृष्ठ 57) लेखक का यह कथन सही है कि नागालैंड को छोड़कर पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में हिंदू जनसंख्या में गिरावट आई है एवं मणिपुर को छोड़कर सभी राज्यों की मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि हुई है I इन क्षेत्रों में अवैध घुसपैठियों के चलते वहाँ की अर्थव्यवस्था, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है I
पर्यटन किसी देश या राज्य की आय का एक बहुत बड़ा स्रोत है I पूर्वोत्तर के राज्यों में पर्यटन का विकास तो हुआ है, लेकिन संतोषजनक नहीं I लेखक का मानना है कि ‘पूर्वोत्तर में पर्यटन के विकास की अपार संभावनाएं हैं और इसके लिए जरूरी है उन संभावनाओं को ठोस रूप देने की I इसके लिए लेखक का सुझाव है कि आवागमन के साधनों का उचित विकास, होटलों और अतिथि गृहों का निर्माण, उग्रवादी समूह पर नियंत्रण अनिवार्य है I’ भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के परिचय के बाद पुस्तक के शेष चार अध्यायों में मिजोरम का समग्र इतिहास, भूगोल, पर्व-त्यौहार और संस्कृति का विशेष अध्ययन है जिसकी प्रस्तुति लेखक ने अपने सर्वेक्षण तत्संबंधी पुस्तकों के गहन अध्ययन और प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर किया है जिससे उनका लेखन प्रामाणिक बन सका है I उन्होंने ‘मिजोरम’ शब्द की कई व्युत्पत्तियां बताई हैं जो बड़ी रोचक हैं और उन व्युत्पत्तियों में ही मिजोरम राज्य की विशेषताएं झलकती हैं I मिजोरम एक पर्वतीय प्रदेश है जो मिजो लोगों की भूमि है I पहले यह केंद्रशासित प्रदेश था I 1987 में भारत की केंद्र सरकार ने इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया, लेकिन अफसोस की बात है कि वह भी सरकारी उपेक्षा का शिकार रहा I मिजोरम को भारत के सबसे खूबसूरत राज्य, खूबसूरत महिलाओं का राज्य, भारत का सबसे ईमानदार राज्य, जंगलों से ढँका राज्य और मिजोरम के शहर आइजोल को शहर नहीं, जन्नत कहा गया है I ये सारी विशेषताएं न केवल सहृदय पाठक को, बल्कि पर्यटकों को भी आकर्षित करती हैं I मिजोरम वासियों का जीवन मूलतः नदियों, पहाड़ों, जंगलों और झरनों के बीच व्यतीत होता है I उनके पर्व-त्योहार और नृत्य में प्रयुक्त सामग्री भी प्रकृति से ली जाती है I इसलिए प्रकृति से उनका गहरा भावनात्मक संबंध है और वह उनकी रग-रग में बसी है I शहरीकरण के कारण जहां जंगल और पेड़ पौधे कटते जा रहे हैं I वहां के आदिवासी समुदाय उन्हें बचाने में अपना खून-पसीना एक कर रहे हैं जिसका संकेत लेखक ने दिया है I मिजोरम के आदिवासियों के यहां नृत्य, गीत, मदिरा और रस-रंग की एक भौतिक दुनिया है I यहाँ ईश्वरीय सत्ता में विश्वास, जड़ात्मवाद, मिथकों और अंधविश्वासों की एक मायावी दुनिया भी है जिनमें वे समान रूप से जीते हैं I लेखक ने इन दोनों पक्षों का बहुत बारीकी से अध्ययन किया है I मिजोरम का एक जटिल, संघर्षपूर्ण और रक्तरंजित इतिहास भी रहा है जिसका उल्लेख पुस्तक में अनेकशः किया गया है I इससे पता चलता है कि आज के मिजोरम की खूबसूरती और आकर्षण के मूल में विद्रोह, संघर्ष और वहां के लोगों का रक्त शामिल है I लाल डेंगा के नेतृत्व में सरकार के साथ खूनी संघर्ष के बाद ही मिजोरम को एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा मिला था I जैसे हिंदू धर्म में जाति के भीतर जाति और गोत्र हैं वैसे ही आदिवासी समाज भी अनेक जातियों और गोत्र में बंटा है I वहां के प्रमुख आदिवासी समुदाय के अंतर्गत लाखेर, हमार या मार, बिएते या बाइते, बवम, चकमा, हुलंगो, लुसोई, मग, पाइते, पंग, पवि, नार, राल्ते, तलाऊ, थडोऊ, रियांग जैसी जनजातियों का उल्लेख है जो आदिवासी समुदाय में जाति विभिन्नता के सूचक हैं I इन आदिवासियों में लाखेर प्रमुख जनजाति है I ‘ला’ का अर्थ है कपास और ‘खेर’ का अर्थ है डंडे से तोड़ना अर्थात डंडे से कपास तोड़ने के कारण ये लोग लाखेर कहलाए I लाखेर अनेक विधि-निषेधों का पालन करते हैं क्योंकि ये चीजें उनके रक्त में रची-बसी है I उनमें बहुत सारी मान्यताएं प्रचलित हैं I गृह निर्माण और गृह प्रवेश के समय, जन्म और मरण के समय यह जनजाति अनेक विधियों का पालन करती है I इस समुदाय में गांव सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई है जो ग्राम व्यवस्था का संचालन करती है और उन्हें बहुत सारे अधिकार प्राप्त हैं I ‘खजनगप्पा’ इस समुदाय के सर्वोच्च ईश्वरीय प्रतीक हैं I वे इस संसार के सृष्टिकर्ता, संरक्षणदाता एवं सुख सौभाग्य प्रदाता हैं I (वही, पृष्ठ-109) I लाखेर लोग यह भी मानते हैं कि बाघ, हाथी, भालू जैसे शक्तिशाली और हिंस्र जानवरों को मारनेवाला स्वर्ग जाता है I
पुस्तक में मिजोरम के आदिवासियों के क्रियाकलापों, व्यवसाय और उनकी सामाजिक, धार्मिक मान्यताओं की विस्तृत जानकारी मिलती है I मिजोरम के मिजो पर्वतश्रेणी के उत्तर में रहनेवाले लोग ‘हमार’ कहलाते हैं I सर पर बाल बांधने की शैली को मार कहा जाता है I यह पितृसत्तात्मक समाज है जिसमें पिता ही परिवार का मुखिया होता है I ये लोग बकरी, बत्तख, कबूतर, मुर्गी, सूअर आदि का पालन करते हैं I जैसा कि अन्य जातियां करती हैं I बिएते जनजाति लंग के निवासी थे और वहां से बर्मा, मणिपुर, मिजोरम, असम और मेघालय में इनका आगमन हुआ I बवम मिजोरम की एक अल्पसंख्यक जनजाति है जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘टोकरी ढ़ोनेवाला’ I एक मान्यता के अनुसार येलोग एक बंद दरवाजे से निकले थे जिनकी पीठ पर टोकरी थी I यह टोकरी इस जनजाति की श्रमशीलता, मेहनत-मजदूरी का परिचायक है I गोरखा समुदाय (गोरखाली या नेपाली) मिजोरम का अल्पसंख्यक, किंतु अत्यंत प्रभावशाली समुदाय है जो अपनी वीरता और देश के लिए कुर्बानी देने का जुनून रखता है I इसलिए अंग्रेजों ने अपनी मिलिट्री पुलिस में अधिकांशतः गोरखा जवान रखे थे I ‘वर्ण व्यवस्था के आधार पर गोरखा समाज अनेक जातियों में विभक्त है I ये जातियां अनेक गोत्र में विभक्त हैं I वर्ण व्यवस्था के आधार पर गोरखा समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र में विभक्त है, लेकिन इनका एक प्रगतिशील पक्ष यह है कि ये लोग अपने गोत्र से बाहर भी शादियां करते हैं तथा इस समाज में वधु मूल्य और दहेज की परंपरा नहीं है I गोरखा समुदाय के अनेक पर्व-त्यौहार हिंदू परंपरा से मिलते-जुलते हैं जैसे, दुर्गापूजा, दिवाली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, जन्माष्टमी, होली, शिवरात्रि, मकर संक्रांति आदि I ये आज भी अपने परंपरागत वाद्य यंत्रों बांसुरी, खंजरी, सारंगी आदि के प्रयोग द्वारा अपनी पहचान को बनाए हुए हैं I
मिजोरम के लोक साहित्य की चर्चा के संदर्भ में लेखक का कथन है-‘पूर्वोत्तर की भूमि लोक साहित्य की दृष्टि से अत्यंत उर्वर है I पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी पर्वत शिखर एवं सुदूर जंगलों में प्राकृतिक जीवन व्यतीत करते हैं जहां गीत गाते झरनों, बलखाती नदियों, वन्य जीवों और नयनाभिराम पक्षियों का उन्मुक्त संसार है I यहां का जीवन सरल और स्वच्छंद है I यहाँ जीवन की आपाधापी नहीं, समय की व्यस्तता नहीं, कोई कोलाहल नहीं-तनावरहित जीवन, न्यूनतम आवश्यकताएं, कोई महत्वाकांक्षा नहीं, भविष्य की कोई चिंता नहीं I इन परिस्थितियों में इनके उर्वर मस्तिष्क में कल्पना की ऊंची उड़ान उठाती है I फलतः लोकगीतों, लोककथाओं, मिथकों, कहावतों, पहेलियों का सृजन होता है I लोक साहित्य की दृष्टि से पूर्वोत्तर भारत अत्यंत समृद्ध है I (वही, पृष्ठ-164) मिजोरम के लोक साहित्य को लेखक ने लोकगीत, लोक नृत्य, लोककथा, मिथक, लोकोक्तियां और कहावतें जैसे शीर्षकों में विभाजित कर अध्ययन किया है I लोक गीत लोक जीवन की सहज अभिव्यक्ति है जिसमें सहजता और हृदय की सरलता होती है I इसमें मनुष्य मनुष्य के बीच भावनात्मक जुड़ाव होता है I इसलिए सामाजिक समरसता स्थापित करने में लोकगीतों की अहम भूमिका होती है I लोकगीतों की उपयोगिता और प्रभाव को दिखाने के लिए लेखक ने डॉक्टर श्याम परमार को उधृत किया है-‘लोकगीतों की ध्वनि में बालक सोए हैं, जवानों में प्रेम की मस्ती आई है, बूढ़ों ने मन बहलाया है, बैरागियों ने उपदेशों का पान कराया है, विरही युवकों ने मन की कसक मिटाई है, विधवाओं ने अपने एकांगी जीवन में रस पाया है, पथिकों ने अपनी थकावटें दूर की हैं, किसानों ने अपने बड़े-बड़े खेत जोते हैं, मजदूरों ने विशाल भवनों पर पत्थर चढ़ाए हैं और मौजियों ने चुटकुले छोड़े हैं I’ तात्पर्य यह कि लोकगीत महज मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि पीड़ा दूर करने तथा शरीर और जीवन में ऊर्जा भरने का माध्यम भी है I अतः वीरेन्द्र परमार ने लोकगीतों को जीवन के लिए एक सकारात्मक तत्व के रूप में देखा-परखा है I पूर्वोत्तर के लोकगीतों को उन्होंने उपासना गीत, संस्कार गीत, श्रम अथवा फसल गीत, प्रणय गीत, युद्ध गीत, ऋतु संबंधी गीत, गाथा गीत, उत्सव गीत, स्वागत गीत, मनोरंजन गीत, लोरी गीत जैसी चौदह कोटियाँ बनाई हैं जिनमें जीवन का कोई भी पक्ष या कोई भी अवस्था बाकी नहीं रह जाती I लोकगीतों की तरह लोक नृत्य भी मानव जीवन के अभिभाज्य अंग हैं I पूर्वोत्तर के लोक नृत्य की अंतर्वस्तु में अच्छी फसल, संतान वृद्धि, भूत-प्रेत उतारने, जादू-टोना और ऋतुओं के आवाहन आदि विषय शामिल है I मुखौटा नृत्य, संस्कार नृत्य, स्वागत नृत्य, युद्ध नृत्य आदि हिंदी नाटकों में भी मिलते हैं I मिजोरम के आदिवासी समुदाय के संदर्भ में यह उल्लेख्य है कि उनके लोक नृत्य सामूहिक होते हैं और जीवन का आनंद समूह में उठाते हैं जो उनके समूह भावना का परिचायक है I मिजोरम के नृत्य में चेरम नृत्य, खुल्लम नृत्य, सोलाकिया नृत्य, चौलम नृत्य प्रसिद्ध है I इन नृत्यों में ऊर्जा, उत्साह, आनंद की भावना व्यक्त होती है I आदिवासी बालाएं अपने श्रृंगार में प्राकृतिक उपादानों जैसे, फूल-पत्तियों आदि का प्रयोग करती हैं, आधुनिक कृत्रिम चीजों के नहीं जिससे प्रकृति से उनके गहरे जुड़ाव का पता चलता है जिसे लेखक ने उजागर किया है I
अन्य समुदायों की तरह मिजोरम के आदिवासी समुदाय में भी लोककथाओं का फलक बड़ा व्यापक है जिसका वाचिक परंपरा के रूप में सविस्तार परिचय दिया गया है I लोककथा की दृष्टि से भी मिजोरम की भूमि बहुत उर्वर है I रोचकता और जिज्ञासा से युक्त इन लोककथाओं में मानव जीवन के सभी पक्ष चित्रित हैं I इन कथाओं के केंद्र में प्रकृति होती है, पशु-पक्षी, लोमड़ी, हाथी, बाघ, बंदर, भूत-प्रेत, देवी-देवता और जड़ पदार्थ भी इन लोककथाओं के नायक-नायिका बनते हैं जो संस्कृत के मित्रलाभ जैसी कहानियों की याद दिलाते हैं I इन लोककथाओं में कल्पना, सृजनशीलता और मिथकों का प्रयोग एक सामान्य विशेषता है I ‘छुरा’ को मिजो समाज का नायक माना जाता है I ये लोककथाएं और उनके चरित्र प्रतीकात्मक होते हैं जिनमें आश्चर्य और अलौकिक तत्व शामिल होते हैं I समाज के चरित्रों को इन प्रतीकात्मक रूपों में अभिव्यक्त किया गया है I इन लोककथाओं का महत्व इस रूप में है कि ये मनोरंजन, बुद्धिमत्ता और प्रेरणा के स्रोत हैं I लोकोक्तियां और कहावतें किसी भाषा और साहित्य के महत्वपूर्ण अंग है जो समाज के बीच से पैदा होती है I लेखक ने मिजोरम के लोगों को शिक्षित करने का श्रेय ईसाई मिशनरी को दिया है, लेकिन यह भी कहा है कि ‘वहां के युवा वर्ग को शिक्षित करने में कहावतों की एक मौखिक परंपरा विद्यमान थी I’ वहां की अनेक लोकोक्तियां हिंदी की लोकोक्तियों से मिलती-जुलती हैं जैसे, अपराधी बचे, निर्दोष फंसे (हिंदी-खेत खाए गदहा, मार खाए जोलहा) जो तुम आज कर सकते हो उसे कल के लिए मत छोड़ो (हिंदी-काल करे सो आज कर) आदि कहावतें प्रत्येक भाषा और साहित्य में उपलब्ध हैं I पर्यटन स्थलों की चर्चा किए बिना मिजोरम की जानकारी अधूरी रहेगी I आइजोल का मिजोरम राज्य संग्रहालय, सोलोमन टेंपल, तमदिल झील, राष्ट्रीय उद्यान, पलक झील आदि पर्यटन स्थल अपनी अलग-अलग विशेषताओं के चलते पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करते हैं और ये राज्य की आय के महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं I मिजोरम के राज्य संग्रहालय में प्रदेश की विरासत और संस्कृति को प्रतिबिम्बित करनेवाली अनेक दुर्लभ वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं I यहां प्रकृति के अनछुए सौंदर्य का अवलोकन करना एक स्वर्गीय अनुभव है I पुस्तक के अंत में ‘मिजोरम : एक झलक’ में मिजोरम राज्य के जिलों और उनके मुख्यालयों की सूची है I इतना ही नहीं, मिजोरम का क्षेत्रफल, जनसंख्या, स्त्री-पुरुष की संख्या, दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर, जनसंख्या का घनत्व, लिंग अनुपात, स्त्री-पुरुष की साक्षरता प्रतिशत, प्रमुख भाषाओं, प्रखंड और सबडिविजनों की संख्या दी गई है जो पाठक के सामान्य ज्ञान को समृद्ध करती है I
पूर्वोत्तर राज्यों और मिजोरम के आदिवासी समुदायों की जीवन शैली, सामाजिक- सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि उनकी कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो सभी आदिवासियों में समान रूप से मिलती हैं I इनका उल्लेख पुस्तक में किया गया है जैसे, वहां के आदिवासियों की गुफा द्वारा से उत्पत्ति, वधू मूल्य की परंपरा, पितृसत्तात्मक परिवार, अलौकिक सत्ता में आस्था, जड़ात्मवाद, नृत्य एवं गीत, पर्व-त्योहार उल्लास के साथ मनाना, मांसाहार, झूम खेती, आपसी सहयोग एवं सद्भाव, जल जंगल और जमीन से गहरा रिश्ता आदि I धार्मिक दृष्टि से इन राज्यों में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन एवं जड़ात्मवादी सामान्य रूप से मिलते हैं, सिर्फ उनमें संख्यात्मक अंतर है I इसके अलावा ये जनजातियाँ नृत्य-गीत से विशेष प्रेम करती हैं जिनमें वे अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों का प्रयोग करते हैं I उनकी लोककथाओं में पहाड़ों, नदियों, जलस्रोतों और पुष्पों के नाम मिलते हैं जो यह प्रमाणित करते हैं कि प्रकृति के सानिध्य में ही उनका जीवन व्यतीत हुआ और प्रकृति ही उनकी शिक्षिका, पूज्य सत्ता और जीवन के आधार हैं I इसलिए सारे आदिवासी प्रकृतिपूजक हैं I मिजोरम के लोक जीवन से जुड़ी जो लोककथाएं और किंवदंतियाँ हैं उनमें वहां के आदिवासियों का गहरा विश्वास है जो उन्हें जंगल यानी प्राकृतिक उपादानों को बचाने तथा उनसे गहरे रूप में जुड़ने की प्रेरणा देता है I जंगल को नष्ट करने पर किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा कष्ट दिए जाने का अर्थ यह है कि जंगल को हर हाल में बचाया जाना चाहिए ताकि पर्यावरण और मानव जीवन की रक्षा हो सके I उनके उत्पत्ति, उनका इतिहास, विस्थापन और देशांतरगमन आदि को जानने के लिए उनके लोकगीतों को स्रोत-सामग्री के रूप में देखा जा सकता है I उनकी अन्य सामान्य विशेषता यह है कि उनमें मिथक की बहुतायत है I रियांग जनजाति में यह मान्यता है कि ‘अबु शिबराय शिवराय ईश्वरीय सत्ता है जो जीवन और मृत्यु देता है I बरहा अथवा बृहा के दो पुत्र हैं-सीसी और जंगजी I ये दोनों ही मृत्यु के स्वामी (कोथोई) हैं I (वही, पृष्ठ-158) जैसे हिंदू धर्म में पुनर्जन्म की अवधारणा में गहरा विश्वास है वैसे ही इन जातियों में भी है I इस समुदाय में अनिष्टकारी और कल्याणकारी देवी-देवता होते हैं I बृहां जंगल के देवता हैं जिनके प्रकोप से जानवर बीमार पड़ते हैं I थुनाहेराव मतई मृत्यु के तथा बनीराव मतई मृत्यु के संदेशवाहक देवता हैं I कल्याणकारी देवी-देवताओं में शिवराय, देवलक्ष्मी आदि हैं I अंधविश्वासी होने के कारण ही आदिवासी ईश्वरीय सत्ता द्वारा जीवन के निर्देशित होने की बात करते हैं जिसका संकेत लेखक ने दिया है I मेरा मानना है कि 21वीं सदी में भी ये आदिवासी वैज्ञानिक चेतना और तार्किक क्षमताओं से काफी दूर हैं I प्राकृतिक शक्तियों में एक सीमा तक आस्था तो ठीक है ताकि वह प्राकृतिक उपादानों की रक्षा कर सकें I यह पर्यावरण रक्षा के लिए नितांत जरूरी भी है, लेकिन अपनी सोच और अपने जीवन को उन्हीं अदृश्य शक्तियों के हाथों समर्पित करना और अपने हर क्रिया-कलाप को उन्हीं का संकेत मानना वैज्ञानिक चेतना के विकास में बाधक है I लेकिन यह भी एक सत्य है कि जब अत्यंत शिक्षित समाज में अंधविश्वास खत्म नहीं हो सकता है तो इन अशिक्षित आदिवासी समुदाय में इसका खत्म ना होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है I
लेखक ने मिजोरम के आदिवासी समुदाय को उसके मूल रूप में पहचान कर उसमें निहित शक्ति और सीमाओं को रेखांकित किया है, वही यह भी लिखा है कि सहज सामाजिक प्रक्रिया के तहत आदिवासियों के विकास के लिए सत्ताधारियों ने विशेष रुचि नहीं दिखाई I आज आदिवासी विकास की जो योजनाएं चल रही हैं उनका उद्देश्य वोट बैंक की राजनीति है I यदि सरकारें उनके विकास के लिए निर्मित योजनाओं को व्यवस्थित रूप से लागू नहीं कर उनकी शक्तियों का सकारात्मक दिशा में उपयोग करने का प्रयास करें तो उसका पिछड़ापन दूर होगा और देश के आर्थिक विकास में उसके योगदान को चिन्हित किया जा सकेगा I किसी राष्ट्र के राज्यों को भी अपनी संस्कृति होती है जो उनकी पहचान को दर्शाती है, लेकिन राष्ट्र की सांस्कृतिक और भौगोलिक संरचना और विकास में उसे राष्ट्र के सभी क्षेत्रों का समेकित योगदान होता है I आज का सत्तारूढ़ दल जिस अखंड भारत और भारतीयता की बात करता है उनका यह मिशन पूर्वोत्तर के राज्यों की उपेक्षा करके पूरा नहीं हो सकता I अतः वह उन राज्यों की सरहदों की रक्षा करें, वहां के आदिवासियों को उनके अधिकारों से परिचित काराए और उनकी संस्कृति व ऐतिहासिक विरासत का संरक्षण करते हुए उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने का प्रयास करें तभी भारत अखंड राष्ट्र की अपनी पहचान बना सकेगा I सारतः इस पुस्तक में वीरेंद्र परमार ने मिजोरम के आदिवासियों की उत्पत्ति, उनके इतिहास, भूगोल, उनके संस्कार, व्यवसाय, उनकी लोक परंपराओं, खान-पान, पर्व-त्योहारों वेशभूषा का सविस्तार शोधपरक लेखन किया है जिससे तत्संबंधी कोई भी जानकारी अधूरी नहीं रह जाती I उन्होंने विश्व इतिहासकार अलबरूनी, ह्वेनसांग तथा वेद, रामायण, महाभारत और आधुनिक इतिहासकारों की पुस्तकों, दिनकर की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ तथा सरकारी दस्तावेजों से जो उद्धरण दिए हैं उनसे उन तत्वों और विवरणों की प्रामाणिकता की मोहर लग जाती है और इससे उनके गहन अध्ययन का पता चलता है I उन्होंने तटस्थता और सावधानी के साथ आंकड़े और ब्योरे प्रस्तुत किए हैं तथा जहां सरकारी नीतियाँ आदिवासियों के पक्ष में नहीं हैं उनकी आलोचना भी की है I इन्हीं कारणों से यह पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय बन जाती है I उनकी भाषा शोधपरक और साहित्यिक है I उन्होंने मिजोरम के इतिहास, भूगोल और संस्कृति की विरासत को पूरे इतिहास की तरह ना लिखकर रोचक भाषा में लिखा है जो इस पुस्तक की एक विशिष्टता है I पूर्वोत्तर राज्यों में जिन्हें घूमने, वहां के आदिवासी समुदाय से रूबरू होने और वहां के प्राकृतिक दृश्य को निकट से निहारने का समय या क्षमता नहीं है उनके लिए यह पुस्तक एक गाइड और वहां की समग्र झांकी है और इसी में इस पुस्तक की मूलवत्ता और प्रासंगिकता है I पुस्तक को पढ़ते हुए ऐसा एहसास होता है कि हम मिजोरम और पूर्वोत्तर राज्यों की अंतर्यात्रा कर रहे हैं और वहां के आदिवासी समुदाय से रूबरू हो रहे हैं I पुस्तक की एक-एक पंक्ति में वीरेंद्र परमार का श्रम, गहन अध्ययन, निरीक्षण-परीक्षण शक्ति, शोधदृष्टि, सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथ्यों और बिंदुओं को पकड़ने की जो क्षमता दृष्टिगत होती है वह सराहनीय है I अनेक पौराणिक प्रसंगों, किंवदंतियों, आदिवासियों के रस्मो-रिवाज, उनके देवी-देवताओं और उनसे जुड़ी लोककथाओं के संगुम्फन से पुस्तक अधिक ज्ञानवर्धक बन गई है तथा मिजोरम को समझने, पूर्वोत्तर राज्य पर शोध करनेवाले शोधार्थियों के लिए यह एक मानक संदर्भ ग्रंथ है I लेखक से यह अपेक्षा है कि मिजोरम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों से संबंधित कोई जानकारी अधूरी रह गई हो तो उसे वे अगली पुस्तकों में दे सकेंगे तथा इन्हें राज्यों पर सर्वाधिक पुस्तक लिखने का श्रेय प्राप्त कर सकेंगे ताकि कोई यह नहीं कर सकेगा और खुद लेखक भी नहीं कह सकेगा कि पूर्वोत्तर राज्यों पर हिंदी में पुस्तकों का अभाव है I
पुस्तक-मिजोरम : आदिवासी और लोक साहित्य
लेखक-वीरेन्द्र परमार
प्रकाशक-अधिकरण प्रकाशन, दिल्ली
वर्ष-2021
