गजल
खुद को भूल जाने की ग़लती सबने कर दी है
हर इन्सान की दुनिया में इक जैसी कहानी है
दौलत के नशे में जो अब दिन को रात कहतें हैं
हर गलती की कीमत भी, यहीं उनको चुकानी है
वक़्त की रफ़्तार का कुछ भी भरोसा है नहीं
किसको जीत मिल जाये, किसको हार पानी है
सल्तनत ख्बाबो की मिल जाये तो अपने लिए बेहतर है
दौलत आज है तो क्या, आखिर कल तो जानी है
— मदन मोहन सक्सेना
