आध्यात्मिक भारत का गुणगान
काशी में विश्वनाथ की ज्योति का अरमान है,
प्रयाग के संगम में सदियों का सम्मान है।
साकेत में राम की मर्यादा का विधान है,
मथुरा में कृष्ण की बाँसुरी का मधुर गान है।
पाटलिपुत्र में मगध का स्वर्णिम निशान है,
राजगृह की मिट्टी में बुद्ध-महावीर का ज्ञान है।
गया में विष्णुपद की महिमा, वैशाली में ध्यान है,
उज्जयिनी में महाकाल, अवंतिका की शान है।
द्वारावती द्वारका में कृष्ण का गुणगान है,
सौराष्ट्र की लहरों में इतिहास की पहचान है।
गंगाद्वार हरिद्वार में गंगा का वरदान है,
हृषीकेश की घाटियों में योग का ध्यान है।
केदार में शिव-ज्योति, बदरिकाश्रम भगवान है,
बैद्यनाथ की धरती पर भोले का गुणगान है।
पुरुषोत्तम पुरी में जगन्नाथ की आन है,
एकाम्र भुवनेश्वर में लिंगराज महान है।
अर्कक्षेत्र कोणार्क में सूर्य का दिव्य प्रकाश है,
कांची की ज्ञान-धरा में युगों का इतिहास है।
मधुरा की मीनाक्षी, तंजावूर का मान है,
बृहदेश्वर की शिलाओं में चोलों का अभिमान है।
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में गीता का ज्ञान है,
प्राग्ज्योतिषपुर में कामाख्या की शक्ति महान है।
श्रीपुर सिरपुर की शिलाओं में इतिहास की जान है,
अनर्त-सौराष्ट्र की द्वारका में कृष्ण की पहचान है।
नाम बदलते रहे युगों में, बदला नहीं हिंदुस्तान है,
हर नगर की धड़कन में भारत का सम्मान है।
न मंदिरों की सीमा कोई, न भाषाओं की दीवार है,
काशी से कन्याकुमारी तक, भारत एक परिवार है।
राहें चाहे अलग-अलग हों, मंज़िल का एक विधान है,
कण-कण में भारत बसता है, भारत ही अभिमान है।
इतिहास हमारी साँसों में, संस्कृति हमारी जान है,
भारत केवल भूमि नहीं, एक अमर पहचान है।
गंगा, हिमगिरि, सागर गाएँ, एक ही जयगान है,
भारत माता के चरणों में शत-शत मेरा प्रणाम है!
— रूपेश कुमार
