कविता – दूसरों की गलतियों पर हम, उँगली उठाते रहते हैं
दूसरों की गलतियों पर हम,उँगली उठाते रहते हैं,
अपनी कमियों के आगे मगर,अक्सर मौन ही रहते हैं,
पराई गलती दिख जाए तो,चेहरा तमतमा जाता है,
अपना दोष सामने आए तो, मन बहाना बनाता है।
गलतियाँ खर्राटों जैसी हैं, दूसरों की हों तो खलती हैं,
अपनी हों तो अनजाने में, चुपचाप भीतर पलती हैं,
दूसरों की छोटी भूल भी, आँखों में पहाड़ बन जाती है,
अपनी बड़ी भूल मगर,अक्सर नज़र से निकल जाती है।
आईना सच बोलता है,मगर हम उससे डरते हैं,
दूसरों के दाग गिनते हैं,अपने दागों से मुकरते हैं,
जो कसौटी दूसरों पर है,खुद पर भी वही लगाएँ,
फिर शायद अपने भीतर की, कमियाँ हम पहचान पाएँ।
गलती होना मानव स्वभाव है,cगलती पर अड़ना भूल है,
गिरकर फिर न संभलना जीवन की सबसे बड़ी भूल है,
दोष छिपाने से बेहतर है, उसे स्वीकार कर लेना,
और कल की ठोकर से सीखकर,आज को सँवार लेना।
दूसरों की गलतियों पर हँसने से पहले,खुद को देख लिया करो,
अपने भीतर के अँधेरों में भी,थोड़ा दीप जला लिया करो,
किशन खर्राटे चाहे अपने हों या,किसी और के सुनाई दें,
पहले खुद को जगा लिया करो,फिर दुनियाँ को सीख दें।
— किशन सनमुखदास भावनानी
