कचहरी
चोरों की है खान कचहरी
निर्धन का अपमान कचहरी
झूठों को सच्चा बतलाना
सच्चों का अवसान कचहरी।
जिंदा मुर्दा बन जाता है
मुर्दा पेंशन तक पाता है
घिस जाते हैं जूते चप्पल
तारिख पर तारिख लाता है ।
काली कोट, हृदय भी काला
है इसका कानून निराला
तुम जिंदा हो तो सबूत दो
वरना सब कुछ गड़बड़झाला।
है वकील की शान कचहरी
गुंडों का वरदान कचहरी
आओ और तबाह होइए
बस, इतनी पहिचान कचहरी।
छाती पीट रहे हैं गम में
मम्मी पापा वृद्धाश्रम में
खेत बेंच करके पुस्तैनी
झूम रहे हैं बेटे रम में।
जो कातिल हैं,मिले जमानत
चुनकर वो संसद में जाएं
घूस लिए जो, देकर रिश्वत
पल में सभी बरी हो जाएं।
क्या इतनी नादान कचहरी ?
समझे न संविधान कचहरी
एससी-एसटी, यूजीसी का
करती क्यों गुणगान कचहरी।
भला कहां पर झोल नहीं है
इनमें किसका रोल नहीं है
ऊपर से नीचे तक बाबू
बोलो किसमें पोल नहीं है।
उनकी खातिर फास्ट ट्रैक है
निर्धन खातिर ट्रक के पहिए
न्याय बिकाऊ बना आजकल
भीगे नयन देखते रहिए।
योर ऑनर हों या चपरासी
सबकी अंखियां धन की प्यासी
जबसे पट्टी खुली आंख की
न्याय की देवी लगें रुआंसी।
सुनती सबकी तान कचहरी
रखती सबका मान कचहरी
सौ अपराधी भले बरी हों
रखती इतना ध्यान कचहरी।
है कानून भला यह कैसा
नकल निकालो तो भी पैसा
कील बनी तहसील हमारी
जैसा पद, रिश्वत भी वैसा।
जैसे-जैसे ऊपर जाना
बुना हुआ है ताना-बाना
या तो निर्धन मर जाता है
या गवाह बन जाय निशाना।
ले लेती है प्रान कचहरी
रखे न बिल्कुल ध्यान कचहरी
आम आदमी की खातिर अब
रही नहीं आसान कचहरी।
— सुरेश मिश्र
