कविता

गतिरोध

कभी यह अड़ंगा डालते
तो कभी वह गला फाड़ते
एक मुद्दा सुलझाने से पहले ही
दूजे की पटकथा झट लिख डालते।

संसद को बना डाला है अखाड़ा
अध्यक्ष का आदेश तक भी न मानें
प्रजा के हितों की करें अनदेखी
बस अपने को ही सर्वस्व जानें ।

झुकने को कोई तैयार नही
सियासी रोटियां सेकने में सब लगे
जनता की दिक्कतों से न लेना-देना
आम जन की फिर कौन बात करे ।

कभी-कभी तो ऐसा लगता है
मानो कोई नूरा कुश्ती चल रही है
करदाता की गाढ़ी कमाई पर
सांसदों की पीढ़ियां पल रही हैं।

बस नाम भर के लिए संसद जाते
हल्ला- गुल्ला कर घर लौट आते
सार्थक विषयों पर चर्चा न हो पाती
लोकतंत्र का खुलकर मजाक उड़ाते

हर बार का लगभग यही हाल है
पूरा सत्र अड़ंगेबाजी में गुजरता
मढ़ते रहते एक दूजे पर दोषारोपण
जनता-जनार्दन का मन कुढ़ता।

रोज-रोज की इस रस्साकसी से
मतदाता ठगा सा महसूस करता
क्या इसीलिए इन्हें चुनकर भेजा था
कभी- कभी स्वयं से ही पूछ पड़ता।

प्रति दिन संसद की कार्यवाही में
करोड़ों रुपयों का खर्चा होता
जब संसद चलने ही न दी जाए
फिर किस बात का वेतन व भत्ता?

यह गतिरोध खत्म करने के लिए
प्रभावशाली कदम उठाना जरूरी
संसद में उठें जन-कल्याण के मुद्दे
न कि हो केवल खानापूरी।।

— नवल अग्रवाल

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

Leave a Reply