चुगली से आनन्द रस की उत्पत्ति होती है
कभी मौका मिले तो चुगली करके देखिए कितना सकून मिलता है। हृदय तरोताजा हो जाता है जैसे-अभी अनार का जूस पीकर आ रहे हैं। जिससे चुगली कर रहे हैं, चुगली करके एक सज्जन पुरुष उसके सामने बन सकते हैं। बहुत बड़ा आपका समर्थक हो जायेगा।
चुगली करने में कोई खर्च नहीं गिरता है। एक कहावत है – हींग लगे न फिटकरी, रंग होय चोखा। चुगली करने में बड़े- बड़े महारथी लगे रहते हैं। नेता जब किसी की चुगली करता है तो अखबारों की सुर्खियां बन जाती हैं। मीडिया को क्या समझते हो?
एक चीज हम नहीं समझ पाते हैं जब मंच पर नेताओं की मंडली बैठी रहती है तो एक दूसरे के कान में क्या फुसफुसाते हैं, आज तक पता नहीं चल पाया। एक सज्जन कह रहे थे। नेता को कम न समझो, वो तो महाचुगलखोर होते हैं।
एक सज्जन साहित्यकार जब तक किसी की कोई चुगली नहीं कर लेते तब तक दातुन मंजन नहीं करते। चाय की चुस्की लेते समय भी कोई साथ में है तो चुगली की दो घूंट उसको भी पिला देते हैं। सामने वाला भी टानिक समझ कर गटक लेता है। अंत तक चाव से सुनता है। सुनने के बाद आत्म सुख तथा संतोष की संजीवनी जैसे मिल गयी हो।
औरते तो और माहिर होती हैं। चुगली करते समय कान में फुसुर- फुसुर ऐसा करती हैं जिसकी चुगली कर दे वह व्यक्ति सामाजिक रुप से विकलांगता प्राप्त कर लेगा। चुगली करते समय चेहरे की मुस्कान बराबर बनी रहती है। शब्दों को ताश के पत्तों की तरह फेंट-फेंटकर ऐसा फेंकती हैं। चुगली भी शरमा जाये।
एक सज्जन की चुगली हमने भी कर दी। मैं चुगली करने में ऐसे-ऐसे शब्दों को फेंक रहा था अगर सामने पड़ जाये तो वह मृत्यु शैय्या को प्राप्त कर लेगा। जैसे उस व्यक्ति को पता चला। उसका पूरा खानदान लाठी डंडों से वो हजामत मेरी बनायी। जिंदगी में आजतक किसी की चुगली नहीं की।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
