व्यंग्य लेख – आजादी मिली थी, गुलामी हमने खुद चुन ली
कमाल की आज़ादी है हमारी! अंग्रेज़ों को भगाने के बाद हमने गुलामी के इतने नए दरवाज़े खोल लिए कि अब किसी विदेशी हुकूमत को मेहनत करने की जरूरत ही नहीं। 15 अगस्त को ध्वजारोहण होगा। राष्ट्रगान बजेगा। भाषणों में शहीदों का जिक्र होगा। तालियाँ पड़ेंगी। तस्वीरें खिंचेंगी। और फिर हम उसी दिन वापस अपनी-अपनी गुलामियों की ड्यूटी पर लौट जाएँगे।
कोई मोबाइल का गुलाम है, कोई सोशल मीडिया का; किसी की खुशी ‘लाइक’ से, तो किसी की हैसियत ‘फॉलोअर’ से तय होती है। कोई ट्रेंड के पीछे भागता है, कोई भीड़ के साथ, क्योंकि अपनी राय बनाने से आसान है दूसरों की नकल करना। कोई बाज़ार का गुलाम है—जरूरत हो या न हो, विज्ञापन कहेगा तो खरीदेंगे। कोई ब्रांड का, कोई दिखावे का, कोई किस्त और कर्ज का। जेब खाली हो सकती है, खरीदारी नहीं; घर छोटा हो सकता है, ईएमआई बड़ी होनी चाहिए।
कोई नौकरी और पद का गुलाम है, कोई पैसे का; कोई समाज क्या कहेगा का, तो कोई रिश्तेदारों की राय का। बच्चे अंकों के गुलाम हैं, युवा प्रतियोगिता और नौकरी की दौड़ के, और बड़े-बुजुर्ग अपनों के समय को तरस रहे हैं। लेकिन सबसे खतरनाक गुलामी जाति, धर्म और राजनीति की है। हम इतने ‘आज़ाद’ हैं कि अपने नेता की गलती को भी सही साबित करने में पूरी ताकत लगा देते हैं। सवाल पूछना देशद्रोह लगता है और आंख बंद करके समर्थन करना देशभक्ति।
अंग्रेज़ों की गुलामी में बेड़ियाँ हाथों में थीं, इसलिए गुलामी साफ दिखाई देती थी। हमारी गुलामी का अंदाज़ देखिए—जंजीरें भी अपनी, ताले भी अपने और चाबी भी अपनी; फिर भी हम इसे पसंद, सुविधा और आज़ादी कहकर गर्व से ढो रहे हैं। इस 15 अगस्त ध्वजारोहण कीजिए, तिरंगे को सलाम कीजिए, मगर एक सवाल खुद से भी कीजिए—अंग्रेज़ 1947 में चले गए, अब हमारी चुनी हुई गुलामियाँ कब जाएँगी?
— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
