इमरान-इकरा की भिड़ंत से गरमाई सपा-कांग्रेस की सीटों वाली सियासत
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव भले अभी कई महीने दूर हो, लेकिन विपक्ष के भीतर चुनावी शतरंज बिछ चुकी है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ऊपर से गठबंधन की जरूरत समझती दिखती हैं, मगर नीचे सीटों और राजनीतिक प्रभाव की ऐसी लड़ाई शुरू हो गई है, जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा मैदान बन गया है। सहारनपुर के इमरान मसूद और कैराना की इकरा हसन के बीच हुई जुबानी भिड़ंत इसी अंदरूनी संघर्ष का चेहरा है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन किसे जवाब दे रहा है। असली सवाल यह है कि 2027 में उत्तर प्रदेश के विपक्ष की कमान किस राजनीतिक ताकत के हाथ में रहेगी।इमरान मसूद लगातार सीट बंटवारे को जल्दी अंतिम रूप देने का दबाव बना रहे हैं। उनका संदेश साफ है कांग्रेस को केवल सहयोगी नहीं, बराबर की राजनीतिक ताकत माना जाए। वह यह भी कह रहे हैं कि जरूरत पड़ी तो कांग्रेस अकेले चुनाव की तैयारी करेगी। यही वह बिंदु है जहां सपा की बेचैनी समझ में आती है। अगर कांग्रेस बार-बार सार्वजनिक रूप से अपनी ताकत का दावा करती रही तो सीटों की बातचीत बंद कमरे की सौदेबाजी न रहकर सार्वजनिक प्रतिष्ठा की लड़ाई बन जाएगी।
कांग्रेस के पास अपने दावे का एक बड़ा आंकड़ा है 2024 का लोकसभा चुनाव। उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं। दोनों मिलकर 43 पर पहुंचे। यह विपक्ष के लिए बड़ा बदलाव था। कांग्रेस इसी नतीजे को अपनी राजनीतिक वापसी का प्रमाण मान सकती है। लेकिन सपा के पास भी उससे ज्यादा पुराना और विधानसभा का ज्यादा प्रासंगिक आंकड़ा है। 2022 में भाजपा ने 255 विधानसभा सीटें जीतीं, सपा 111 पर रही और कांग्रेस सिर्फ 2 सीटों तक सिमट गई। सपा का मत प्रतिशत 32.03 प्रतिशत था, जबकि कांग्रेस करीब 2.33 प्रतिशत पर रही। यही अंतर सीट बंटवारे की मेज पर सपा का सबसे बड़ा तर्क है।यानी दोनों दलों के पास अपनी-अपनी जीत का आंकड़ा है। कांग्रेस कहेगी कि 2024 में उसके आने से विपक्ष का विस्तार हुआ। सपा कहेगी कि 2027 लोकसभा नहीं, विधानसभा का चुनाव है और विधानसभा में जमीन उसकी है। सितंबर की रिपोर्टों में सपा के कांग्रेस को लगभग 45 से 50 सीटों से ज्यादा न देने की रणनीति की चर्चा सामने आई, जबकि कांग्रेस इससे कहीं बड़ी हिस्सेदारी चाहती बताई जा रही है। 403 सीटों वाली विधानसभा में अगर दोनों के दावों के बीच इतना बड़ा अंतर है तो समझा जा सकता है कि असली खींचतान कितनी गहरी है।
2017 का इतिहास भी इस सौदेबाजी में सपा के पक्ष में तर्क देता है। तब सपा और कांग्रेस ने साथ चुनाव लड़ा था। कांग्रेस को 105 सीटें मिली थीं, लेकिन वह सिर्फ 7 सीटें जीत सकी। सपा भी 47 सीटों पर सिमट गई। गठबंधन सत्ता तक नहीं पहुंच पाया। इसलिए 2017 सपा को यह याद दिलाने का मौका देता है कि ज्यादा सीटें देना और ज्यादा सीटें जीतना दो अलग बातें हैं। 2027 में अखिलेश यादव शायद सीटों की संख्या से ज्यादा जीतने की क्षमता को आधार बनाना चाहेंगे।यहीं इमरान मसूद बनाम इकरा हसन की कहानी अचानक ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। इमरान को जवाब देने के लिए सपा ने किसी पुराने नेता को आगे नहीं किया। कैराना की युवा सांसद इकरा हसन सामने आईं। यह सिर्फ जवाब देने का तरीका नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। 2024 में सहारनपुर से इमरान मसूद ने 5,47,967 वोट लेकर भाजपा उम्मीदवार को 64,542 मतों से हराया था। उसी चुनाव में कैराना से इकरा हसन ने 5,28,013 वोट लेकर भाजपा उम्मीदवार को 69,116 मतों से हराया। यानी पश्चिमी यूपी में कांग्रेस के पास इमरान का आंकड़ा है तो सपा के पास इकरा का।
इसलिए इकरा का जवाब सपा के लिए महज बयान नहीं है। यह कांग्रेस को बताया गया वह संदेश है कि पश्चिमी यूपी की मुस्लिम राजनीति पर किसी एक दल का दावा नहीं चल सकता। इमरान मसूद जिस इलाके में कांग्रेस की ताकत दिखा रहे हैं, उसी इलाके में सपा अपनी जमीन का चेहरा इकरा हसन के रूप में पेश कर रही है। इकरा की राजनीति का महत्व यहां और बढ़ जाता है। उनकी पहचान युवा महिला सांसद के साथ-साथ पिछड़े वर्ग से जुड़ी सामाजिक पहचान वाली नेता के रूप में भी है। सपा की पीडीए राजनीति में यह संयोजन महत्वपूर्ण है। मुस्लिम, पिछड़े, दलित और युवा इन वर्गों को जोड़ने की कोशिश में इकरा का चेहरा सपा के लिए राजनीतिक संदेश को विस्तार दे सकता है। इसलिए उन्हें केवल इमरान मसूद का जवाब देने वाली नेता समझना सपा की रणनीति को छोटा करके देखना होगा।
मुस्लिम नेतृत्व के स्तर पर भी सपा एक संक्रमण से गुजर रही है। आजम खान लंबे समय तक पार्टी की सबसे प्रभावशाली मुस्लिम आवाज रहे। लेकिन अब पार्टी में कई पीढ़ियों और क्षेत्रों के चेहरे मौजूद हैं। इकरा हसन, जिया उर रहमान बर्क, मोहिबुल्लाह नदवी, अफजाल अंसारी, महबूब अली जैसे नेताओं के साथ 2026 में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सपा में आना भी महत्वपूर्ण है। इसलिए इकरा को आजम खान का विकल्प घोषित करना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन उन्हें नई पीढ़ी के राजनीतिक चेहरे के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश जरूर दिखाई देती है।कांग्रेस के सामने दूसरी चुनौती यह है कि लोकसभा की सफलता को विधानसभा की ताकत में कैसे बदला जाए। 2024 में 43 सीटों का संयुक्त आंकड़ा सपा-कांग्रेस के लिए बड़ी राजनीतिक पूंजी था, लेकिन विधानसभा में बूथ, उम्मीदवार और स्थानीय संगठन का गणित अलग होता है। 2022 में कांग्रेस की 2 विधानसभा सीटें बताती हैं कि लोकसभा की जीत को विधानसभा की सीटों में बदलना अपने आप नहीं होता।
इसीलिए इमरान मसूद का दबाव और इकरा हसन का जवाब आने वाले बड़े संघर्ष की शुरुआत भर है। कांग्रेस ज्यादा सीट चाहती है क्योंकि उसे लगता है कि 2024 ने उसकी राजनीतिक जमीन वापस बनाई है। सपा कम लेकिन जीतने योग्य सीटें चाहती है क्योंकि उसके पास विधानसभा का कहीं बड़ा संगठन और आधार है। दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है, लेकिन दोनों यह भी चाहते हैं कि गठबंधन में दूसरा दल बड़ा भाई बनकर न बैठे।यही 2027 की असली कहानी है। लड़ाई भाजपा से पहले विपक्ष के भीतर अपनी जगह तय करने की है। इमरान मसूद कांग्रेस की राजनीतिक कीमत बढ़ाने में जुटे हैं तो इकरा हसन सपा की ताकत का जवाब दे रही हैं। अब फैसला भाषणों से नहीं होगा। फैसला इस बात से होगा कि कौन कितनी सीट पर दावा करता है, किस सीट पर उसका संगठन है, किस उम्मीदवार के पास जमीन है और 2024 की जीत को 2027 की विधानसभा में कौन बदल सकता है। पश्चिमी यूपी में शुरू हुई यह जुबानी जंग अगर लंबी चली तो यह सिर्फ दो नेताओं की लड़ाई नहीं रहेगी। यह तय करने वाली लड़ाई बन जाएगी कि 2027 में सपा-कांग्रेस गठबंधन साझेदारी होगी या सीटों की ऐसी सौदेबाजी, जिसमें दोनों एक-दूसरे की ताकत नापते-नापते अपनी ही साझा जमीन कमजोर कर बैठें।
— स्वदेश कुमार ,लखनऊ
