अब चलो कुछ नाम करें
बहुत कर लिए मौज मस्ती
अब आओ कुछ काम करें,
बदनामी तो बहुत सह लिए
अब तो चलो कुछ नाम करें,
धुंध छांटकर आलस की अब,
भीतर का इंसान जगाएं,
स्वार्थ की इस संकुचित गली से,
परमार्थ के पथ पर आएं,
सूखे होंठों को मुस्कान दें,
गिरे हुए को हाथ थाम लें,
जो भटके हैं अंधियारों में,
उनके जीवन में भोर तमाम करें,
बदनामी तो बहुत सह लिए
अब तो चलो कुछ नाम करें,
तन-मन अर्पित,जीवन अर्पित,
यह सारा यौवन अर्पित है,
इस जग के कल्याण की खातिर,
मेरा हर एक कण अर्पित है,
जाति-पाति के भेद मिटाकर,
मानवता का सम्मान करें,
कदम मिलाकर साथ चलें सब,
धरती को ही स्वर्ग समान करें,
अब तक जिए बस खुद की खातिर,
अब और न यह नादानी हो,
मिट जाएं इस समाज की खातिर,
ऐसी अपनी अमिट कहानी हो,
खुद जलकर जो राह दिखाए,
चलो वो दीपक आज तमाम करें,
बदनामी तो बहुत सह लिए
अब तो चलो कुछ नाम करें।
— राजेन्द्र लाहिरी
