कभी सलोना ख्वाब जब
कभी सलोना ख्वाब जब, जाता यूँ ही टूट।
मन का पंछी मौन हो, जाता पल में रूठ॥
आसों के पंखों तले, मन की सूनी डाल।
नींद खुले तो आँख में, बिखरे कितने ख्याल॥
पल में छिन जाता मगर, पलकों का सुख-रूप—
मन का पंछी मौन हो, जाता पल में रूठ॥
पानी पर प्राचीर-सी, ख्वाहिश रही सँवार।
बुलबुला बनकर मगर, मिट जाए संसार॥
रेत-महल-से स्वप्न सब, बहते जाएँ छूट—
कभी सलोना ख्वाब जब, जाता यूँ ही टूट॥
रात गहन जब हो गई, सोया सारा गाँव।
मौन अँधेरे में जगा, मन का अनकहा घाव॥
धड़कन के आँगन उठे, पीड़ा के प्रतिरूप—
कभी सलोना ख्वाब जब, जाता यूँ ही टूट॥
चाँद-सितारे हाथ थे, रेत बनी हर आस।
मुट्ठी भर उम्मीद में, डगमग हुआ विश्वास॥
नभ के सूने पृष्ठ पर, खोजे भाग्य-अनूप—
कभी सलोना ख्वाब जब, जाता यूँ ही टूट॥
ख्वाहिश की हर राह में, काँटे मिले हजार।
फिर भी मन ने थामा नहीं, सपनों का संसार॥
टूटे स्वप्नों की धूल से, रचता नव स्वरूप—
कभी सलोना ख्वाब जब, जाता यूँ ही टूट॥
छूट गया जो आज वह, अंत नहीं संसार।
राख तले भी साँस ले, जीवन का अंगार॥
घावों को सहला उठी, फिर आशा की धूप—
कभी सलोना ख्वाब जब, जाता यूँ ही टूट॥
टूटे सपनों से सदा, जन्मे नव विश्वास।
अँधियारे की कोख में, पलता सूरज-आस॥
हार नहीं है स्वप्न का, टूटना प्रतिरूप—
कभी सलोना ख्वाब जब, जाता यूँ ही टूट॥
कभी सलोना ख्वाब जब, जाता यूँ ही टूट।
मन का पंछी मौन हो, जाता पल में रूठ॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
