मेरिट का मान, मेहनत का सम्मान, मानवता का मान
इस देश का हर नागरिक चाहता है कि जब वह अस्पताल जाए तो उसे सबसे अच्छा डॉक्टर मिले, जब उसका बच्चा स्कूल जाए तो उसे सबसे योग्य शिक्षक पढ़ाए, जब वह अदालत में न्याय मांगने जाए तो सबसे अनुभवी जज उसकी बात सुने और जब देश की सीमा पर खतरा हो तो देश की रक्षा सबसे सक्षम सैनिक के हाथों में हो। यह मांग किसी जाति, धर्म या वर्ग की नहीं है, यह हर भारतीय की स्वाभाविक मांग है।
इसी मांग के कारण भारत सरकार ने कुछ संस्थानों को आरक्षण से मुक्त रखा है। सेना में आरक्षण नहीं है, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति में आरक्षण नहीं है, इसरो और डीआरडीओ जैसे वैज्ञानिक संस्थानों में आरक्षण नहीं है और आईएएस, आईपीएस की वरिष्ठ पदोन्नति में भी आरक्षण नहीं है। सवाल यह है कि इन संस्थानों को ही क्यों अलग रखा गया?
इसका उत्तर एक ही शब्द में है – मेरिट, यानी योग्यता।
सरकार का तर्क बिल्कुल साफ है। सरकार कहती है कि रक्षा का मामला देश की सुरक्षा से जुड़ा है। वहां शारीरिक फिटनेस, मानसिक मजबूती और नेतृत्व क्षमता चाहिए। वहां अगर योग्यता से समझौता किया गया तो कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ेगी। न्यायपालिका के बारे में तर्क है कि जज का एक फैसला मिसाल बनता है, वह लाखों लोगों का भविष्य तय करता है। वहां अनुभव और कानून की गहरी समझ चाहिए, वहां आरक्षण से न्याय की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। इसरो और डीआरडीओ के बारे में कहा जाता है कि वे रॉकेट बनाते हैं, मिसाइल बनाते हैं। वहां एक छोटी सी गलती करोड़ों रुपये और देश की सुरक्षा दोनों को खतरे में डाल सकती है। इसलिए वहां भी योग्यता को ही सबसे ऊपर रखा गया है।
अब एक सीधा सा सवाल मन में उठता है। अगर देश की सुरक्षा के लिए योग्यता जरूरी है, तो देश की शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और विकास के लिए योग्यता जरूरी क्यों नहीं है? क्या एक गरीब आदमी के जीवन में डॉक्टर की भूमिका सैनिक से कम है? क्या एक बच्चे के भविष्य में शिक्षक की भूमिका वैज्ञानिक से कम है? क्या एक जिले के कलेक्टर की भूमिका किसी जज से कम महत्वपूर्ण है?
नहीं, बिल्कुल नहीं।
जब हम मान लेते हैं कि कुछ जगहों पर मेरिट से समझौता देश के लिए खतरनाक है, तो हमें यह भी मानना होगा कि हर जगह पर मेरिट से समझौता देश के लिए खतरनाक है। जनता को योग्य जन-सेवक चाहिए, सिर्फ जन-सेवक नहीं।
आज हमारे देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है? चुनौती यह है कि सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता पर आम आदमी का भरोसा कम हो रहा है। लोग सरकारी स्कूल की जगह प्राइवेट स्कूल में जाना चाहते हैं, सरकारी अस्पताल की जगह प्राइवेट अस्पताल में जाना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि वहां उन्हें योग्यता दिखती है। अगर सरकारी विभागों में भी शत-प्रतिशत योग्यता के आधार पर नियुक्ति होगी, तो यह भरोसा वापस आएगा।
मेरिट के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क समानता का है। हमारे संविधान की प्रस्तावना में लिखा है – हम भारत के लोग, समता का अधिकार। समता का मतलब है सबको समान अवसर मिलना। आरक्षण समान अवसर नहीं देता, वह परिणाम को पहले से तय कर देता है। मेरिट समान अवसर देता है। मेरिट में दौड़ सबके लिए खुली है। अमीर हो या गरीब, अगड़ा हो या पिछड़ा, सब एक ही रेखा पर खड़े होते हैं और जो सबसे तेज दौड़ता है, वह जीतता है। यह सच्ची समानता है। इसमें किसी के साथ भेदभाव नहीं होता।
दूसरा तर्क है देश की प्रगति का। 21वीं सदी प्रतिस्पर्धा की सदी है। दुनिया में वही देश आगे बढ़ रहा है जो अपने सबसे योग्य लोगों को आगे ला रहा है। अमेरिका, जापान, जर्मनी, इजरायल जैसे देशों ने विज्ञान और तकनीक में जो तरक्की की है, उसका एक ही राज है – उन्होंने हर पद पर सबसे योग्य व्यक्ति को बैठाया। अगर भारत को विश्वगुरु बनना है, विकसित भारत बनना है, तो हमें भी अपने हर विभाग में इसरो और डीआरडीओ वाला मॉडल अपनाना होगा। जहां योग्यता ही एकमात्र पैमाना हो।
तीसरा तर्क है सामाजिक समरसता का। आरक्षण व्यवस्था ने अनजाने में ही समाज को बांट दिया है। आज नौकरी के फॉर्म में सबसे पहले जाति पूछी जाती है, योग्यता बाद में। इससे युवाओं के मन में एक-दूसरे के प्रति कटुता पैदा होती है। जो युवा दिन-रात मेहनत करके 90 प्रतिशत अंक लाता है और फिर भी चयन से वंचित रह जाता है, उसके मन में निराशा आती है। और जो युवा आरक्षण के सहारे चयनित होता है, उसे भी जीवन भर यह सुनना पड़ता है कि वह योग्य नहीं है। दोनों ही स्थितियों में नुकसान समाज का ही है। अगर चयन सिर्फ मेरिट से होगा, तो न कोई खुद को कमजोर समझेगा, न कोई दूसरे को कम आंकेगा। सबको लगेगा कि जो मिला है, वह अपनी मेहनत से मिला है।
चौथा तर्क है गरीबी को सही मायने में खत्म करने का। अक्सर कहा जाता है कि आरक्षण गरीबों के लिए है। लेकिन सच्चाई यह है कि जाति के आधार पर दिया गया आरक्षण गरीबी को खत्म नहीं करता, वह गरीबी को जाति से जोड़ देता है। आज जरूरत है आर्थिक आधार पर मदद की। अगर किसी भी वर्ग का बच्चा गरीब है, उसे किताबें नहीं मिल रही, कोचिंग नहीं मिल रही, तो सरकार उसे पढ़ने के लिए पैसा दे, छात्रवृत्ति दे, हॉस्टल दे। उसे दौड़ने के लिए जूते दो, लेकिन दौड़ में उसे पहले ही विजेता घोषित मत करो। अगर हम आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को मजबूत करेंगे, तो वह मेरिट की दौड़ में खुद-ब-खुद आगे आ जाएगा। यही सच्चा सामाजिक न्याय होगा।
कुछ लोग कहते हैं कि हजारों साल के भेदभाव की भरपाई आरक्षण से ही होगी। यह बात भावनात्मक रूप से सही लगती है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका उल्टा असर हो रहा है। पिछले 75 सालों से आरक्षण लागू है, लेकिन क्या जातिवाद खत्म हुआ? नहीं, बल्कि जाति की पहचान और गहरी हो गई है। क्योंकि जब भी सरकारी लाभ जाति के आधार पर मिलेगा, लोग जाति को और मजबूती से पकड़ कर रखेंगे। अगर हम सच में जातिविहीन समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें जाति के आधार पर लाभ देना बंद करना होगा। योग्यता के आधार पर चयन ही जाति को अप्रासंगिक बना सकता है।
सेना, न्यायपालिका और इसरो ने हमें रास्ता दिखा दिया है। उन्होंने साबित कर दिया है कि जब चयन योग्यता से होता है, तो संस्थान दुनिया में नाम कमाते हैं। भारतीय सेना दुनिया की सबसे अनुशासित सेनाओं में से एक है। इसरो ने कम लागत में मंगलयान भेज कर दुनिया को चौंका दिया। सुप्रीम कोर्ट पर आज भी देश के लोगों का सबसे ज्यादा भरोसा है। इन तीनों की सफलता का एक ही मंत्र है – योग्यता से कोई समझौता नहीं।
तो क्यों न हम इस मंत्र को पूरे देश में लागू करें? क्यों न हर सरकारी नौकरी में, हर प्रमोशन में, हर कॉलेज में एडमिशन में सिर्फ और सिर्फ मेरिट को आधार बनाया जाए?
इसका लाभ सीधे जनता को मिलेगा। जब ब्लॉक में सबसे योग्य अधिकारी बैठेगा, तो गरीब की पेंशन समय पर बनेगी। जब सबसे योग्य इंजीनियर पुल बनाएगा, तो पुल गिरेगा नहीं। जब सबसे योग्य डॉक्टर अस्पताल में होगा, तो मरीजों को इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। जनता को जाति का अधिकारी नहीं चाहिए, जनता को योग्य अधिकारी चाहिए।
इसलिए अब समय आ गया है कि हम खुल कर इस पर चर्चा करें। उन तर्कों को, जिनके आधार पर सेना और इसरो को आरक्षण से मुक्त रखा गया है, उन्हीं तर्कों को पूरे सिस्टम पर लागू किया जाए। देश की सुरक्षा जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण देश की शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासन भी है।
हमें एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जहां किसी युवा से यह नहीं पूछा जाए कि तुम किस जाति के हो, बल्कि यह पूछा जाए कि तुममें क्या योग्यता है। जहां नौकरी जाति देख कर नहीं, प्रतिभा देख कर मिले। तभी हम जनता को सच में योग्य जन-सेवक दे पाएंगे और तभी बाबा साहेब अंबेडकर का वह सपना पूरा होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि हम एक ऐसा समाज बनाएंगे जहां हर व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार सम्मान मिलेगा।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
