अनबँधी कलाई का मौन
जिनकी बहन नहीं, उनकी राखी कैसी?
राखी आने से पहले बाज़ारों में रंग उतर आता है – लाल, पीले, हरे, सुनहरे धागों में जैसे बचपन अपनी उँगलियाँ फँसाकर किसी पुराने रिश्ते को फिर से पुकारता हो। दुकानों के बाहर छोटी-छोटी हथेलियाँ राखियाँ चुनती हैं और मिठाइयों की गंध में घुली होती है बहनों की हँसी। घर-घर थालियाँ सजती हैं, रोली मुस्कुराती है, अक्षत प्रतीक्षा करते हैं और कलाईयाँ एक पवित्र स्पर्श की राह देखती हैं।
लेकिन – हर घर में राखी की आहट एक जैसी नहीं होती। कुछ घरों में एक कलाई होती है, जिसके लिए कोई राखी नहीं आती। वह कलाई त्योहार के दिन भी वैसी ही रहती है, चुप, अकेली, अनबँधी।
वहाँ न कोई आवाज़ होती है – “भैया, हाथ आगे करो…” न किसी नन्हे हाथ की उँगलियाँ कलाई पर धागा तलाशती हैं। न माथे पर रोली का स्पर्श, न आँखों में वह परिचित शरारत, न अधिकार से माँगा गया कोई छोटा-सा उपहार। बस एक दिन होता है, जो दूसरों के घरों में त्योहार बनकर आता है और उसके भीतर एक प्रश्न बनकर ठहर जाता है –
जिनकी बहन नहीं होती, उनकी राखी कैसी?
शायद वह भाई भीड़ में चलते हुए किसी दुकान के सामने रुकता होगा। बहुत देर तक राखियों को देखता होगा। किसी धागे में उसे अपना बचपन दिखाई देता होगा – एक ऐसा बचपन, जो कभी आया ही नहीं।
वह सोचता होगा – काश! कोई छोटी-सी आवाज़ उसे ‘भैया’ कहकर पुकारती। काश! कोई उसकी किताब छीनकर भागती, उसकी शिकायत माँ से करती और फिर उसी शाम चुपके से उसके हिस्से की मिठाई बचाकर रख देती। काश! कोई उसकी कलाई पर धागा बाँधते हुए उसकी आँखों में आँखें डालकर कहती –
“भैया, हमेशा मेरे साथ रहना।”
लेकिन हर ‘काश’ किस्मत की किताब में पूरा नहीं होता। कुछ रिश्ते हमारी चौखट तक आ ही नहीं पाते, कुछ होते हुए भी दूरियों में खो जाते हैं और कुछ रिश्ते जन्म से नहीं मिलते – वे जीवन की राह में अचानक मिल जाते हैं।
फिर मन पूछता है – क्या राखी केवल उन कलाईयों का त्योहार है, जिन पर रक्त का रिश्ता पहले से लिखा हुआ है?
मैं सोचता हूँ – नहीं।
राखी शायद धागे से कहीं बड़ी चीज़ है। वह उस क्षण का नाम है, जब कोई किसी दूसरे के अकेलेपन को देखता है और बिना किसी स्वार्थ के उसके पास जाकर कहता है….. “तुम अकेले नहीं हो।”
रिश्ते हमेशा जन्म से नहीं मिलते। कभी वे एक मुस्कान से जन्म लेते हैं, कभी किसी की मदद करते हुए एक अदृश्य डोर दो मनों के बीच बँध जाती है। कभी कोई बच्ची किसी अनजान भाई की कलाई पर राखी बाँध देती है और अचानक दो अजनबी एक रिश्ते की भाषा सीख जाते हैं।
तब समझ आता है – रक्त रिश्ते की पहचान हो सकता है, पर रिश्ते का पूरा अर्थ नहीं। कभी-कभी अपनापन ही रक्त से गाढ़ा हो जाता है।
इसलिए इस बार राखी पर, जब तुम्हारी कलाई पर कोई धागा बाँधे, एक क्षण के लिए उस भाई को भी याद करना, जिसकी कलाई आज भी किसी अपने के स्पर्श की प्रतीक्षा में है। शायद उसके घर राखी की थाली न सजी हो, शायद मोबाइल पर बहन का संदेश न आया हो, शायद उसने भी दूसरों की कलाईयाँ देखी हों और अपनी कलाई चुपचाप जेब में छिपा ली हो।
उसके पास जाकर बस इतना कहना – “भैया, आज आपकी कलाई सूनी नहीं रहेगी।”
देखना, कभी-कभी एक वाक्य वर्षों की चुप्पी से बड़ा होता है। एक धागा सालों के अकेलेपन पर हाथ रख सकता है और एक छोटा-सा अपनापन किसी के भीतर बुझती हुई रोशनी को फिर से जगा सकता है।
राखी सिर्फ़ रक्षा का वचन नहीं है। यह उस मन की भी रक्षा है, जो भीतर से अकेला है; उस विश्वास की रक्षा है, जिसे दुनिया की भीड़ अक्सर कुचल देती है; उस संबंध की रक्षा है, जिसे नाम की आवश्यकता नहीं – सिर्फ़ सच्चाई की आवश्यकता है।
हम अक्सर कहते हैं – भाई बहन की रक्षा करेगा। लेकिन बहन भी तो भाई की बहुत-सी चीज़ों की रक्षा करती है -उसके बचपन की, उसकी हँसी की, उसके रहस्यों की, उसकी नादानियों की और उसके टूटे हुए मन की। शायद सबसे अधिक उस एहसास की कि इस विशाल संसार में कोई एक व्यक्ति ऐसा है, जिसके लिए वह विशेष है।
इसीलिए राखी का रिश्ता एकतरफ़ा नहीं। यह दो कलाईयों के बीच बँधा हुआ धागा नहीं – यह दो आत्मीयताओं के बीच जगा हुआ विश्वास है।
तो जिनकी बहन नहीं, उनकी राखी भी होनी चाहिए – किसी छोटी हथेली के स्नेह से, किसी पड़ोस के अपनत्व से, किसी विद्यालय की सरल परंपरा से, या किसी ऐसे रिश्ते से जिसे समाज ने नाम भले न दिया हो, पर दिल ने स्वीकार कर लिया हो।
क्योंकि हर रिश्ता वंशावली में दर्ज नहीं होता। कुछ रिश्ते स्मृतियों में लिखे जाते हैं, कुछ आँखों की नमी में, कुछ एक मुस्कान में और कुछ – सिर्फ़ एक धागे में।
इस बार राखी बाँधते हुए केवल कलाई मत बाँधना – एक विश्वास बाँधना, एक वचन बाँधना, एक ऐसा एहसास बाँधना जिससे सामने वाला अपने जीवन के किसी कठिन दिन में यह याद कर सके – “दुनिया में कोई तो है, जो मुझे अपना मानता है।”
तभी राखी अपने अर्थ तक पहुँचेगी। तभी त्योहार केवल एक तारीख नहीं रहेगा। तभी मिठाई की मिठास किसी अकेले मन तक पहुँचेगी और किसी सूनी कलाई पर खुशियों की रोशनी उतरेगी।
और शायद तब वह भाई, जिसने वर्षों से अपनी कलाई को सूना देखा है, पहली बार उसे देखकर मुस्कुराएगा। वह नहीं पूछेगा – “मेरी राखी कैसी हो?” वह बस अपनी कलाई को देखेगा और धीरे से कहेगा – “आज यहाँ धागा नहीं, किसी का विश्वास बँधा है।”
और उस क्षण राखी बहन से भाई तक जाने वाली एक डोर नहीं रहेगी; वह मनुष्य से मनुष्य तक जाने वाली मानवता की राह बन जाएगी।
उस दिन जिसकी बहन नहीं, उसकी भी राखी होगी। जिसकी कलाई सूनी है, उसके लिए भी स्नेह की डोर होगी। जिसके मन में खालीपन है, उसके लिए भी किसी का अपनापन होगा।
क्योंकि – राखी की सबसे सुंदर डोर वही नहीं, जो कलाई पर दिखाई दे; सबसे सुंदर डोर वह है, जो किसी के अकेलेपन तक पहुँचे और उसके मौन में उतरकर धीरे से कह दे….. “तुम अकेले नहीं हो।” और शायद यही राखी का सबसे पवित्र अर्थ है, यही रिश्तों की सबसे सुंदर भाषा, यही त्योहार की सबसे उजली रोशनी और यही – एक अनबँधी कलाई की सबसे मौन प्रार्थना।
— रूपेश कुमार
