कहानी – कोई वीरानी सी वीरानी है
‘‘मुझे तो वह सब याद भी नहीं था, पर प्रदीप ने कहा तब मुझे सब याद आ गया। मैं तो बस अपने संस्कारों से बंधी डोलती थी और मेरे दरवाजे से कोई भूखा न जाए सोचकर उसे घर में जो बना था थाल भरकर परोस दिया। एक आत्मतुष्टि का शायद अहंकार ही था।
हाँ! वे दिन ही ऐसे थे। बस हरियाली और सावन की बहार का आभास। कहीं कोई अभाव नहीं था, कोई कठिनाई नहीं। एक भरा-पुरा खुशहाल परिवार, सेब का बाग, और बस ऐश ही ऐश।“ श्रुति अब तनिक रुकी।
‘‘ओए! ये तुझे आराम से लेटे-लेटे क्या याद आ गया बोबो?“ साधना ने श्रुति को झिंझोड़ते हुए कहा, ‘‘मेरी तो आँख भी लग गई थी पर तू है कि दो मिनट भी चैन नहीं है। चल, अब खोल डाल इस पिटारे को भी। देखें क्या निकलेगा इस में से।“
गर्मियों की तपती दोपहरी में थोड़ी देर आराम करने की नीयत से दोनों सहेलियाँ पास-पास लेटी हुई थीं। श्रुति का जब भी मन उदास होता वह साधना के पास आ जाती।
जब से श्रुति वापस चण्डीगढ़ आ गई है, साधना भी उससे मिलने जाती पर कम ही जा पाती क्योंकि बृजेश का व्यापार इतना फैला हुआ था कि उन्हें अगले पल क्या करना है इसका पता नहीं रहता था। ऐसे में उन्हें हर पल पत्नी की जरूरत महसूस होती। कई बार तो वे बाहर जाते हुए उसे भी साथ ले जाते। रही श्रुति, तो वह तो एकदम अकेली थी, कोई बंधन नहीं। थोड़ी-बहुत पेंशन थी ही काम चलाने के लिए, अकेली जान के खर्च भी सीमित थे या उसने कर लिए थे। हाँ, स्वाध्याय तो चलता ही रहता था। कुछ पैसे बच जाते तो पुस्तकें खरीद लाती और पढ़ती रहती।
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वैसे तो बचपन साथ-साथ गुजरा था दोनों का, पर विवाह के बाद श्रुति बहुत दूर चली गई थी। उसे पता था कि करण को पहाड़ बहुत पसंद थे पर यह तो पता नहीं था कि अपने इस शौक के लिए वह नौकरी भी छोड़ सकता है, वह भी सरकारी नौकरी। पर हाँ, करण ने छोड़ ही दी थी नौकरी। चण्डीगढ़ की आसान ज़िन्दगी छोड़कर शिमला के दूर दराज पहाड़ पर जमीन खरीद ली और सेब का बाग लगा लिया। श्रुति को तो जैसे मुँह माँगी मुराद मिल गई हो। खुला आसमान, घर के चारों तरफ रंग-बिरगे फूल, हर दिन ऊँचे उठते सेब के नन्हें पौधे जो अब फलदार वृक्ष बन चुके थे, चेरी, नाशपाती, खुमानी और आलूबुख़ारे के फलदार पेड़, उस पर मस्तमौला पति। हँसते-गाते कट रही थी, उस पर यह उमर ही अल्हड़पने की थी।
पहाड़ों की सुरम्य सुषमा में श्रुति ऐसी रच बस गई कि कुछ होश हवास बाकी नहीं रहा। लेकिन दिन एक से कहाँ रहते हैं? श्रुति के भी नहीं रहे। वे लम्बे-लम्बे तीस साल तो जैसे पलक झपकते ही बीत गये थे कि फिर एक भयंकर वज्रपात हुआ। हमेशा की तरह सेब बेचकर चण्डीगढ़ से लौटते हुए करण की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई और सब कुछ समाप्त हो गया।
कुछ दिन और ऐसे ही गुज़र गए पर घर में झगड़े-फसाद कम नहीं हुए। समय बीतने के साथ-साथ बेटे-बहुओं का ताण्डव इतना बढ़ गया कि श्रुति घर छोड़कर मायके आ गई और वहीं अलग घर लेकर रहने लगी। इस बीच क्या झेला श्रुति ने वह कुछ इसी तरह साधना को धीरे धीरे टुकड़ों में ही पता चलता था। पर हाँ, भाग्य ही कहें इसे कि करण ने जीवन बीमा योजना के अन्तर्गत एक ऐसी योजना का चयन किया था कि करण के बाद उसे पेंशन लग गई थी।
‘‘अरे कहाँ खो गई बोबो?“ साधना ने श्रुति को एक बार फिर झिंझोड़ा।
‘‘हाँ साधना, मैं तुझे वही तो बता रही थी। कभी-कभार कोई दबी हुई टीस फिर उभर आती है न और मेरे ये पिटारे साधना के अलावा किसी और के सामने तो खुल भी नहीं सकते।
‘‘एक बात बता श्रुति, ये प्रदीप तो शायद वही पंडित है न जो तुम्हारे घर दुर्गा सप्तशती का पाठ और दूसरे कर्म काण्ड करता रहा है?“
करण ऐसे पूजा पाठ में मित्रों परिचितों को सोत्साह बुलाया करते थे। साधना भी दो बार नवरात्र पाठ में आई थी, इसीलिए शास्त्री से परिचय था उसका।
‘‘हाँ, है तो वही। पर……?
‘‘पर क्या? उसे तो तुम लोग शास्त्री जी कहते थे न, फिर यह प्रदीप?“
‘‘हाँ साधना! वह करण के रहते शास्त्री जी ही था, काशी का पढ़ा हुआ विद्वान ब्राह्मण, लेकिन करण के जाने के बाद वह बस एक पुरुष मात्र रह गया।“ श्रुति ने घृणा से मुँह बिचका दिया, ‘‘सिर्फ प्रदीप कुमार शर्मा, अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल ढाँणसा।“
‘‘क्या कह रही हो, यह तो आज पहली बार सुन रही हूँ तुम्हारे मुँह से। ऐसा क्या हुआ था?“
‘‘तुम्हें क्या लगता है मैं कोई कहानी सुना रही हूँ?’’
‘‘ऐसा तो मैं नहीं कह रही पर बताओगी या बस पहेलियाँ ही बुझाती रहोगी?“ साधना उठकर बैठ गई लेकिन श्रुति अभी भी आँखें बंद किये पीठ दीवार से टिकाए अधलेटी अवस्था में जैसे सपना देख रही हो फिर बोलने लगी। आँसू की दो बूंदें उसकी बंद आँखों से ढलक आई थीं।
‘‘धीरू की गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया था, ड्राइवर के पास लाइसेंस नहीं था इसलिए वह गाड़ी वहीं छोड़कर भाग गया था। अब धीरेंद्र बिलकुल खाली था, ऊपर से पत्नी और दो बच्चे सो कुछ तो करना ही था।
फिर एक दिन शहर से करण के एक मित्र का बेटा जनक हमारे बेटे के साथ आया था। बच्चों के दोस्त आते ही रहते थे कोई नई बात तो नहीं थी। जनक कहने लगा, ‘‘चाची जी, हमारे पड़ोस में एक दुकान खाली हुई है। आप कहो तो धीरू वहाँ दुकान कर ले।“
‘‘मैंने कब मना किया है? कर ले न।“ मैंने बेटे की तरफ देखा तो वो कुछ नहीं बोला। जवाब फिर जनक ने ही दिया,
‘‘तो कल चलकर आप उसे कुछ एडवांस दे देते। इसके पास क्या है, आपको माल डालने के लिए भी तो देना पड़ेगा पैसा।“
‘‘ठीक है, पर इसे सिफारिश की ज़रूरत क्यों पड़ी?“
‘‘डर गया था। शायद आप मना कर देंगे।“ हाँ, यह सच था कि कुछ समय पहले ही उसने ट्रक में भारी नुकसान किया था, इसलिए मैं नाराज़ थी। फिर भी मैंने 50 हज़ार की एफडी तोड़कर बेटे की दुकान खुलवा दी।
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दुकान अच्छी चल निकली तो कामनी और बच्चे भी शहर चले गये थे, फिर भी दो-चार दिन के बाद गाँव आ ही जाते और पूजा-पाठ, ब्रत-त्योहार के लिए गाँव के घर का ही उपयोग होता क्योंकि घर बड़ा था और वहाँ हर तरह की सुविधा भी थी।“
‘‘सचमुच, तेरा घर तो बृजेश को भी बहुत पसंद था। इन्होंने तो मोड़ से तेरा घर दिखाई देते ही कहा था, कि यह शायद कोई सरकारी रैस्ट हाउस है। जब मैंने इन्हें बताया कि वह तो तुम्हारा घर है तो बृजेश बहुत खुश हुए थे। याद है….?“
‘‘हाँ, जीजा जी ने बहुत तारीफ की थी हम दोनों की पसंद की। सच साधना! क्या दिन थे न वे दिन भी।“ श्रुति सीधी होकर बैठ गई, ‘‘चाय हो जाए साधना?“
‘‘जा! बना कर ला तू ही।“ फिर श्रुति जल्दी से दो कप चाय बना लाई और दोनों बिस्तर पर बैठकर ही चाय पीने लगीं।
‘‘तू अब रास्ते से भटक रही है, तू तो प्रदीप शास्त्री की कथा कह रही थी और तुझे घर याद आ गया, क्यों?“
‘‘हाँ! पिटारा खुल गया तो उसमें बंद जीव-जन्तु भी निकलेंगे ही।“ श्रुति फीकी हँसी हँसकर बोली,
‘‘तुम्हें पता ही है न हमारा सेब का बाग जिस ऊँचाई पर है, वहाँ अच्छी खासी बर्फ़ पड़ती है तो आँगन में बैठकर धूप सेकना अच्छा लगता है।’’
‘‘हाँ, वह तो स्वाभाविक ही हुआ।’’
‘‘हाँ! तो मैं कह रही थी कि उस दिन भी घर में नियम के अनुसार दुर्गा सप्तशती का पाठ चल रहा था।
चार अध्याय समाप्त करके वह बाहर आँगन में रखी कुर्सी पर मेरे सामने आ बैठा। मैं पहले से हल्की धूप का आनन्द ले रही थी। थोड़ा असहज होने के बावजूद मैं बैठी रही। रसोई आँगन के साथ होने से भीतर की आवाज़ बाहर तक सुनाई देती थी।
‘‘अब यह नाटक इनका झेलो पूरे नौ दिन, बनी हैं बड़ी देवी की भक्त। बहू है न नौकरानी, करेगी सारा काम झख मारकर।“ कामिनी भीतर से ही बड़बड़ा रही थी, वह शायद मुझे सुना रही थी हालांकि पाठ उसके खसम ने ही रखवाया था, मैंने नहीं। उसकी बात शास्त्री के कान में भी पड़ गई थी यह उसकी शकल से पता चल रहा था। मैंने बात आई-गई करने के लिए नौकर को आवाज़ दी,
‘‘माघी! मेरे और शास्त्री जी के लिए दो कप चाय बना ला। बाकी जिसे पीनी हो पूछ ले।“
‘‘जी माँ जी। मैंने गुरूजी को उठते देख लिया था।“ माघी दो कप चाय लिए हाजिर था। कामिनी भी स्वयं को समर्पित दिखाने या फिर धूप का आनन्द लेने के लिए चाय लेकर बाहर आ बैठी थी। माहौल को सहज करने के लिए बात शास्त्री ने ही छेड़ी थी,
‘‘कामिनी जी, आपको शायद पता नहीं बाबू जी के रहते बड़ा रौब था इनका। मैं आपकी सास जी से पहली बार जब मिला तो मैं बेहद डरा हुआ था। दरअसल मैं काशी से शास्त्री का कोर्स करके आया ही था कि मुझे स्कूल में नौकरी मिल गई और फिर पिता जी ने मुझे सेब की फसल समेटने के काम पर लगा दिया। उस दिन मैं आपकी दुकान पर सेब भरने के लिए पेटियाँ लेने आया था।
स्कूल की छुट्टी के बाद सीधा ही यहाँ आ गया था। दुकान पर भीड़ बहुत थी सो दिनभर भूखा रहना पड़ा और काम भी नहीं हुआ। दूसरे दिन भी भीड़ देखकर मुझे लगा आज भी भूखा ही रहना पड़ेगा। मैं बस यही बात किसी से कह रहा था जो आपकी सास जी ने ऊपर की खिड़की से सुन लिया। थोड़ी ही देर में आपका नौकर आकर कहने लगा, आपको घर में बीबीजी बुला रहे हैं। बस! मैं बुरी तरह डर गया। मुझे लगा, शायद कोई गलती हो गई है। किसी दुकान पर सामान लेने जाओ तो घर पर बुलाहट के कोई अर्थ नहीं होते, जबकि घर में आपका किसी से परिचय भी न हो। पर इन्होंने बिना कुछ पूछे मेरे हाथ धुलवाकर तुरन्त ही मेरे सामने भोजन की थाली परोस दी। मैं हैरान था फिर भूख भी लगी थी। स्कूल की छुट्टी के बाद घर जाकर खाना और खाकर लौटना सम्भव नहीं था, इसलिए स्कूल से सीधे आना पड़ता था।
इन्होंने भोजन करते समय मुझे बताया कि जब मैं साथ खड़े आदमी से बात कर रहा था तो ये ऊपर खिड़की में खड़ी सुन रही थीं। इन्होंने यह भी कहा कि इनके लिए यह एक गाली जैसा है कि कोई घर से भूखा चला जाए। बाबू जी ने तो मेरा परिचय बाद में लिया। पर आपकी सास ने पहले मेरी कुण्डली देख डाली, ये ऐसी ही हैं।“
कामिनी चाय के खाली बर्तन उठाकर भीतर चली गई तो प्रदीप शास्त्री ने दाद तलब नज़रों से मेरी तरफ देखा। पर मैंने उसकी तरफ़ ध्यान ही नहीं दिया, वह शायद मेरा पक्ष लिए जाने की प्रतिक्रिया देख रहा था। पर तब तक मैं उसकी नीयत को अच्छी तरह समझ चुकी थी और उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकने की तरकीबें सोच रही थी।
पाठ समाप्त हुआ तो सब लोग वापस शहर लौट गये, लेकिन शास्त्री का आना-जाना बदस्तूर जारी था। वह बस से हमारे ही दरवाजे पर उतरता हालांकि इससे अपने घर जाने के लिए उसे दो किलोमीटर पैदल अधिक चलना पड़ता था लेकिन इसका उस पर कोई असर होता दिखाई नहीं दे रहा था।
प्रदीप की पौ-बारह थीं बाजार जाकर मेरे बच्चों से सेवा कराता और गाँव में भी हाजरी देने से नहीं चूकता। वहाँ मेरी बहू का विश्वास जीतकर उनसे भेद निकलवाता और आकर मुझे बताता। जिससे मैं उसे अपना समझूँ और गेंद उसके पाले में आ गिरे, पर बच्ची तो मैं भी नहीं थी। वह जितना मेरे निकट होने का प्रयास करता मुझे उतनी ही अधिक खीज होने लगती। इधर गाँव की औरतें भी प्रदीप का नाम लेकर मेरे साथ छेड़छाड़ करने लगीं तो मैंने सारी पूजापाठ बंद कर दी। बेटे से कह दिया, ‘‘जो करना है वहीं अपने घर पर करो, यहाँ नहीं।’’
पहाड़ में गाँव की औरतें ऐसी चुहलबाजी को मामूली शुग़ल के तौर पर लेती हैं इसलिए कुछ कहा भी नहीं जा सकता था पर मुझे अब यह शुगल चुभने लगा था।
उस दिन कुछ महिलाएँ मेरे पास बैठी थीं कि शास्त्री को आता देखकर एक बोली,
‘‘चलो भाई चलना चाहिए अब।“ पर मैंने उनको पकड़कर बैठा लिया और हमारी बातें बदस्तूर जारी रहीं। एन सब के सामने उसे लज्जित करने के लिए शास्त्री को मैंने बैठने को भी नहीं कहा और न ही पानी को पूछा। वह अपने आप रसोई में जाकर पानी पीकर आ गया और चुपचाप घर की सीढ़ियाँ उतर गया, फिर एक दिन मौका देखकर मैंने उसे कह ही दिया,
‘‘शास्त्री जी यहाँ मत आया करें आप। लोग बातें बना रहे हैं तो वह बेशर्मी से हँसता हुआ बोला,
‘‘तो सच कर दो न तुम।“ उसके मुख से ‘तुम’ सुनकर एकबारगी मेरा दिमाग चकरा गया। वैसे भी वह आयु में मुझसे छोटा ही था। पर मुझे उसके इरादे अच्छी तरह नज़र आ रहे थे। वह मेरी तरफ बढ़ता इससे पहले ही मैं झपटकर दरवाजे से बाहर निकल आई और आँगन में खड़ी होकर हाँफने लगी। शोर मचाने का कोई मतलब ही नहीं था। कौन आता मेरी मदद को? वह गाँव का पूजनीय था। अब मेरे लिए बुद्धि का प्रयोग अनिवार्य था। वह भी बाहर आकर मेरे सामने एक कुर्सी पर बैठ गया और मुझे ऊँच नीच समझाने के साथ मेरा भविष्य सुरक्षित करने के वचन भी देने लगा। तो मैंने कहा, ‘‘मुझे समय दीजिए, अभी आप जाइए। मेरा मन अशान्त है।“
‘‘क्या बच्चों का आना जाना बंद हो गया था?“ साधना ने पूछा।
‘‘आते थे कभी-कभार फसल के काम से। तब उनके शास्त्री जी भी रोज ही आ जाते और सेवा करवाते। ऐसे ही एक दिन जब बेटा बहू, दोनों मेरे कमरे में बैठे थे तो मैंने कहा, ‘‘बेटा! शास्त्री को ज्यादा मुँह मत लगाओ। मुझे इसकी नीयत ठीक नहीं लग रही। मैं नहीं चाहती कि गाँव में बेमतलब चर्चा हो।“
मेरी बात का कामिनी ने भी तत्काल समर्थन किया लेकिन तीन-चार दिन बाद ही शास्त्री फिर आ धमका। कहने लगा, ‘‘आज मैं रामपुर गया था।“ मैं कुछ नहीं बोली तो कहने लगा, ‘‘पानी भी नहीं मिलेगा क्या?“ मैं फिर भी नहीं उठी तो वह अपने आप जाकर पानी का गिलास भर लाया,
‘‘आज तो आपकी बहू ने बहुत सेवा की मेरी। गोभी के परांठे पर खूब सारा मक्खन और गिलास भरकर दूध वह भी मलाई डालकर दिया।“ मैं फिर भी नहीं बोली तो कहने लगा, ‘‘आप ने क्या बहू वगैरह से मेरे बारे में कुछ कहा था? वह कह रही थी कि मम्मी आपकी शिकायत कर रही थी।’’ कहकर उसने मुझे ऐसे देखा कि मेरे तन बदन में आग लग गई, ‘‘तुम क्या समझती हो वे कुछ समझते नहीं हैं?“ वह फिर तुम पर उतर आया।
‘‘आप ने अपनी बात कह दी न, अब आप जा सकते हैं। मैं जानती हूँ कि मुझे क्या करना है।“ मैं खीज गई थी। अभी वह कुछ और कहता कि गाँव से कोई आ गया तो उसे उठना पड़ा। शायद लोग मुझे रंगे हाथ पकड़ना चाह रहे थे पर दरवाजे सपाट खुले थे और मैंने आगन्तुक का स्वागत ही किया क्योंकि यह मेरे हित में था। पर इस घटना के बाद मैं कई दिन डरी सहमी रही। एकदम नितांत एकांत में पुराना मकान, रात को कोई दो धक्के दे तो दरवाजे हाथ में होंगे परन्तु ईश्वर की कृपा रही कि ऐसा नहीं हुआ। उसके थोड़े दिन बाद ही सेब का सीज़न शुरू हो गया और सब लोग गाँव आ गए। अब कोई डर वाली बात नहीं थी।
इस बार कामिनी ने गाँव से सती नाम की एक लड़की को घर के काम के लिए रख लिया था। सेब तोड़कर लकड़ी की पेटियों में भरने और ट्रक में भरकर मण्डी भेजने तक दिन रात का काम होता और मजदूरों का खाना भी बनाना पड़ता। इन दिनों कामिनी की मेरे साथ अक्सर ही बोलचाल बंद रहने लगी थी सो इस बार भी अबोला चल रहा था।
उस दिन मैं कुछ सामान लेने बाज़ार जा रही थी कि सती बोली, ‘‘नानी! मुझे भीतर की बनियान वगैरह ला देना। नहीं है मेरे पास।“
‘‘ठीक है कहकर मैं बाहर निकल आई। दुकान पर आई तो वहाँ कामिनी ही थी, क्योंकि घर पर सेब भरे जा रहे थे। मैंने बिना कुछ कहे, सती के लिए एक जोड़ी अण्डर गारमेंट निकालकर लिफाफे में डाले और बाजार का काम निपटाकर घर लौट आई। पर लड़की को सामान देना भूल गई।
शाम को कामिनी भी घर आ गई, बाजार बंदी का दिन था। सुबह सवेरे ही शास्त्री जी भी पधार गए। फसल का काम लगभग समाप्त हो चुका था। अब ट्रक की प्रतीक्षा हो रही थी।
रसोई इस ओर से मेरे कमरे के साथ लगी हुई थी इसलिए धीरेंद्र और शास्त्री वहीं बैठकर जलपान करने लगे। मैं शायद नाश्ता कर चुकी थी और कुछ लिख रही थी। नाश्ते से निपटकर धीरेन्द्र बोला, ‘‘आप कल दुकान पर गये थे क्या?“
‘‘हाँ! क्यों क्या हुआ?“
‘‘वहाँ से आप अण्डर गारमेंट निकालकर लाए थे?“ उसका दूसरा सवाल था।
‘‘हाँ, पर तू यह क्यों पूछ रहा है?“
‘‘आप को शर्म तो नहीं आई होगी न अपने आप किसी दुकान से सामान निकालते हुए?“
‘‘क्या बक रहा है रे, मैं माँ हूँ तेरी।“ मैं हक्की बक्की उसका मुँह देख रही थी और शास्त्री प्रदीप कुमार सिर नीचे करके मुस्कुराहट बिखेर रहा था। यह देखकर पूरे बदन में आग ही तो लग गई मेरे। तभी मेरे सुपुत्र के मुख से फिर फूल झरे, ‘‘ऐसे तो कोई भी आकर दुकान से सामान उठाकर चलता बनेगा। माँग नहीं सकते थे?“
‘‘नहीं। क्योंकि हमारी बोलचाल बंद थी।“
‘‘तो मैं आ जाता, मुझसे माँग लेते, मर तो नहीं रहे थे इतनी जल्दी।“
‘‘मैं तुम से अधोवस्त्र माँगती? अपने बेटे से…..? शर्म नहीं आती तुम्हें?“ मैं मारे गुस्से के थरथर काँप रही थी। मेरी आँखों से आग निकल रही थी, सच साधना! उस समय मैं इतना अधिक बौखला गई थी कि शायद मैं हत्या भी कर सकती थी। लड़की सती रसोई के दरवाजे में हक्की बक्की खड़ी थी। बहू रानी आराम से रसोई में बैठी तमाशा देख रही थी और वह हराम की औलाद प्रदीप कुमार बड़े ही व्यंग्य से मुझे चुनौतीपूर्ण नज़रों से देख रहा था। जैसे उसके सामने मेरा अपमान होना ही चाहिए था।
मैं अपनी जगह से उठी और पर्स में से अण्डर गारमेंट का लिफ़ाफ़ा निकालकर धीरेन्द्र के मुँह के सामने जोर से जमीन पर पटकते हुए बोली,
‘‘ये ले और ले जाकर अपने बाप के साथ फूंक आ। साथ-साथ उसको यह भी कहकर आना कि इस कुतिया को भी ले जा। क्यों छोड़ गया कमीनी औलाद के पास। जिसके पास सिर्फ कान हैं, न तो दिल है और न दिमाग। अरे मैं यह सब तेरी बीवी की नौकरानी के लिए उसके मांगने पर लाई थी।’’ और मैं छाती पर दोहत्थड़ मारकर रोने लगी तो वे सब के सब खिसियाकर बाहर निकल गये। अपने कमरे का दरवाजा मैं बंद नहीं कर सकती थी, क्योंकि रसोई घर में जाने का वही रास्ता था पर मैं तीन दिन चुपचाप पड़ी रही बिना खाए पर एक फैसला ले चुकी थी। हालांकि मैं जानती थी कि सारी फसल चली गई तो सालभर क्या होगा। पर कुछ तो करना ही था। मुझे बहुत तेज़ बुखार हो आया था, पर मैंने कोई दवा नहीं ली। कभी कभी उठकर बस चाय बना लेती थोड़ी-सी। धीरू और शास्त्री की हिम्मत नहीं हुई फिर मेरे सामने आने की।
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तीन दिन बाद धीरू मेरे सामने खड़ा था, ‘‘मैं सेब लेकर दिल्ली जा रहा हूँ।’’ उसका सिर झुका हुआ था।
‘‘काम खतम हो गया?“ मैं तीन दिन बाद बोली थी,
‘‘हाँ जी।“
‘‘सारे सेब तोड़ लिए या हैं?“
‘‘नहीं सारा काम हो गया है, लेबर का हिसाब भी हो गया है। बच्चे आपके पास हैं, दवाई लेते रहना।“
‘‘ऐसा करो! अपना बाल बच्चा भी साथ ले जाओ और फिर कभी इधर मत आना। मैं अपना काम चला लूँगी।“
‘‘अरे ऐसे कैसे छोड़ जाऊँ आपको? अपनी हालत तो देखो। सती भी काम छोड़ गई है।“
‘‘मैंने कहा न। मुझे किसी की जरूरत नहीं है। जाओ।“
वह देर तक इस कोशिश में रहा कि मुझे मना लेगा लेकिन मुझपर असर होता न देखकर उसने कामिनी को चलने का संकेत किया। मैंने रसोई में जाकर देखा तो कुकर भर खिचड़ी पड़ी थी, उठाकर उनके सामने ही खेत में फेंक आई और दरवाजे बंद कर लिए।
दूसरे दिन सुबह ही सती आ गई थी। वह रोने लगी और कहने लगी, ‘‘नानी, मुझे माफ कर दो मुझे नहीं पता था कि आँटी-अंकल ऐसा करेंगे आपके साथ।’’ वह घर से मेरे लिए खाना बनाकर लाई थी। तीन दिन से अन्न पेट में नहीं गया था, बहुत जोर की भूख लगी थी।
— आशा शैली
