लघुकथा

लघुकथा – वंश

सरकारी अस्पताल के बरामदे में करीब साठ – पैंसठ साल की एक बुढ़िया बड़ी ही बेचैनी से टहल रही थी, पर उसका सारा ध्यान प्रसव गृह के दरवाजे की तरफ ही था । भीतर से जब भी प्रसूता की चीख सुनाई देती तो वह बुढ़िया बड़बड़ाने लगती ।
तभी प्रसव ग्रह का दरवाजा खुला । एक नर्स बाहर आई । मुस्कुराते हुए बोली- ‘दादी जी बधाई हो, लड़की हुई है ।’
‘लड़की हुई है’…. कहते हुए बुढ़िया का चेहरा उतर गया । बुढ़िया पास में पड़ी बेंच पर बैठ गई । तभी उसका लड़का आ गया, जो बाजार गया था, कुछ जरूरी सामान लेने ।
अपनी मां को मायूस बैठा देख वह समझ गया कि इस बार भी लड़की हुई है । तभी बुढ़िया बुदबुदायी- ‘ बेटा इस बार भी वंश आगे न बढ़ पाया । यह चौथी कलमुंही पैदा हो गई…।’

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111

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