धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

वेणु से सुदर्शन चक्र तक

समाज पर अत्याचार करने वाला कभी – कभार अपने परिजनों से बहुत प्रेम करता है जो उसके चरित्र का सकारात्मक पक्ष होता है। ऐसे अत्याचारी को परिवार में काफी मान – सम्मान मिलता है किन्तु इनके अत्याचार का दायरा बढ़ते – बढ़ते प्राय: परिवार तक भी आ जाता है और जब किसी परिजन अथवा प्रियजन से खतरा होने वाला होता है तो इनका प्रेम पानी का बुलबुला बनकर कालकवलित हो जाता है। यही पृष्ठभूमि बनी भगवान कृष्ण के उद्भव की।

अत्याचारी राजा कंश अपने पिता को पहले ही कारागार में डाल दिया था किन्तु वह अपनी बहन देवकी से बहुत प्रेम करता था। विवाह के उपरान्त देवकी और उसके पति वसुदेव को स्वयं सारथी बनकर उसके ससुराल पहुँचाने जा रहा था। अकस्मात आकाशवाणी ने उसको बदहवाश कर दिया। ‘हे कंश! तुम जिस बहन को इतने प्यार से उसके ससुराल पहुँचाने जा रहे हो, उसी के पुत्र द्वारा तुम्हारा संहार होगा।’ इतना सुनते ही कंश का बहन – प्रेम उड़ गया और बहुत अनुनय – विनय के बाद देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया, मारा नहीं। शर्त यह रखा कि पैदा होने वाली हर संतान को जन्म लेते ही मार देगा ताकि उसका विनाश न हो सके।

सन्तानोत्पत्ति के आठवें क्रम में भगवान कृष्ण का उद्भव हुआ। आजादी का संकेत मिला। सारे पहरेदार सो गये, कारागार के दरवाजे खुल गये, वसुदेव हथकड़ी और बेड़ी से मुक्त थे। आनन – फानन में उफनती यमुना के रास्ते बेटे को लेकर चल पड़े, मध्य काली निशा में। नंदगाँव में यशोदा – नंद के घर भी संतान पैदा हुआ था, जिसे बदलकर ले आये। कारागार में पहुँचते ही सब पूर्ववत् हो गया। कंश आया और नवजात संतान जो कि कन्या थी, दीवार पर दे मारा किन्तु सभी आश्चर्य में तब हुए जब कन्या आकाश के मार्ग से यह बोलकर चली गई कि ‘तुझे मारने वाला गोकुल में पल रहा है’। यह सुनते ही कंश पल – प्रतिपल मौत के साये में जीने लगा।

गोकुल के सभी घरों में नवजात शिशुओं की तलाश शुरु हुई जिसे मारकर कंश मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता था। इसी क्रम में कंश के गुप्तचरों की नज़र नंद नंदन पर पड़ी और यह निर्णय लिया गया कि येन केन प्रकारेण शिशु की हत्या कर दी जाये। कंश के पास मायावी राक्षसों की बड़ी संख्या थी जो बालकृष्ण को मारने का असफल व आत्मघाती प्रयास करती रही और कृष्ण की लोकप्रियता अनवरत बढ़ती रही।

बाल कृष्ण की गोकुल में बढ़ती लोकप्रियता का असर मथुरा में पहुँचने लगा था जो दिनोदिन कंश और उसके अनुयायियों की चिंता का कारण था। कृष्ण ने अधर्मी कंश के व्यापक व भयावह अत्याचार के कारणों पर विचार किया तो पाया कि समाज में बहुत सी बुराइयाँ व्याप्त हैं जो विसंगतियों की जननी हैं। जैसे- जातिवाद, ऊँच – नीच, निरक्षरता, अज्ञानता, अश्पृश्यता, असभ्यता, अधिकार व कर्त्तव्य के प्रति अनभिज्ञता, विपन्नता, बाहरी शक्तियों का बलात् हस्तक्षेप एवं अत्याचार को नियति मानने की विवशता। बालक कृष्ण ने आने वाली आशुरी शक्तियों का दमन जारी रखा और ऊँच – नीच का भेद मिटाकर सबके घरों में आना – जाना व खाना – पीना शुरु किया। इसका प्रभाव हुआ कि सामाजिक एकता और आपसी विश्वास का जन्म हुआ। कृष्ण के नेतृत्व में बच्चों की टोली बड़ी व व्यापक होने लगी। आस – पास के गाँवों से भी न सिर्फ बच्चे बल्कि वयस्क भी जुड़ने लगे। पर्दा प्रथा को तोड़ महिलायें भी जुड़ने लगीं। प्रकृति भी सहयोगी बनी। पालतू एवं वन्य जीव भी आकर्षित होने लगे। सब मिलाकर एक जागरुकता क्रान्ति का अभ्युदय हुआ।

कालिय नाग को भगाकर जब कृष्ण ने यमुना को मुक्त किया तो सामान्य जन मानस को उनकी शक्ति व सूझबूझ का परिचय मिला। गाँव की गोरियाँ कर के रूप में मथुरा में दही, माखन, घी आदि पहुँचाती थीं। उन्हें रोकने के उपक्रम में मटकी फोड़ एवं माखन चोरी अभियान चलाया गया जिससे अनाधिकार कर बंद हुआ। अज्ञानी बालायें यमुना में नि:वस्त्र स्नान करती थीं जिसका दुष्परिणाम उन्हें अपहरण व शीलभंग के रूप में झेलना पड़ता था। कृष्ण ने उनके वस्त्र चुराने शुरु किये और परिणाम यह हुआ कि नि:वस्त्र सार्वजनिक स्नान बंद हो गया। बाँसुरी रूपी एलॉर्म का उपयोग शुरु किये जिससे दूर – दूर तक गोपनीय संकेत भेजा जा सके (जो बाद में पांचजन्य हो आया)…….अपने साथियों को बुलाया जा सके। कृष्ण की प्रेमलीला भी सामाजिक समरसता की सूचक है जिसका दूरगामी परिणाम एक जुटता के रूप में मिला।

राधा का कृष्ण के जीवन में प्रवेश आसक्तिलिप्त एक सामान्य प्रेमिका के रूप में होता है किन्तु केशव का असर देखिये कि वही राधा जन कल्याण के लिए प्रेम की पराकाष्ठा का परिचय देकर कृष्ण को विदा करती है। जिन हाथों में बाँसुरी सरगम छेड़ती थी उन हाथों में शस्त्रास्त्र आ गये। जनता के सहयोग से जनता के बीच कंश जैसे अत्याचारी का संहार हुआ। जो जनता उसके नाम से पत्ते की तरह कापती थी वही जनता उसके मरने पर जयघोष की। कृष्ण की क्रांति अविराम चलती रही। बहन सुभद्रा के निश्छल प्रेम का मान रखते हुए अयोग्य दुर्योधन के बदले सुयोग्य अर्जुन को न सिर्फ चुना बल्कि बड़े भाई बलराम के निर्णय को भी अस्वीकार किया। धर्म की बहन द्रौपदी की लाज स्वयं के पीताम्बर से बचाये रखी। नारी सम्मान का ऐसा उदारण कम ही मिलेगा।

स्वयं कष्ट सहकर राजधानी तक बदल डाली किन्तु जब द्रौपदी के खुले केश को देखा तो जिन अधरों पर सरगम सुहाते थे, उन अधरों से गीता पाठ कर धर्मयुद्ध का श्रीगणेश किया। नटनागर सुअवसर पाकर योगिराज बन आये। निर्धन मित्र सुदामा से महाराज कृष्ण की मित्रता अद्वितीय है। साक्षात नारायण नर के सारथी बने। भक्त भीष्म की प्रतिज्ञा का मान रखने हेतु अपने वचन को तोड़ दिया। हाथों में वेणु की जगह सुदर्शन चक्र उठा लिये। अतएव कह सकते हैं कि कृष्ण का जीवन वेणु से सुदर्शन चक्र तक व्याप्त है।

— डॉ. अवधेश कुमार ‘अवध’

*डॉ. अवधेश कुमार अवध

नाम- डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’ पिता- स्व0 शिव कुमार सिंह जन्मतिथि- 15/01/1974 पता- ग्राम व पोस्ट : मैढ़ी जिला- चन्दौली (उ. प्र.) सम्पर्क नं. 919862744237 Awadhesh.gvil@gmail.com शिक्षा- स्नातकोत्तर: हिन्दी, अर्थशास्त्र बी. टेक. सिविल इंजीनियरिंग, बी. एड. डिप्लोमा: पत्रकारिता, इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग व्यवसाय- इंजीनियरिंग (मेघालय) प्रभारी- नारासणी साहित्य अकादमी, मेघालय सदस्य-पूर्वोत्तर हिन्दी साहित्य अकादमी प्रकाशन विवरण- विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन नियमित काव्य स्तम्भ- मासिक पत्र ‘निष्ठा’ अभिरुचि- साहित्य पाठ व सृजन

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