कविता

वेणु से सुदर्शन चक्र तक

गोपाला बनकर सब बच्चे,
देखत मटकी को ललचाय l
आओ रे आओ सब साथी,
मटकी इज्जत बन गइ हाय ll

याद करो जसुमति के छींके,
जिनको तोड़े थे बहु बार l
जी भर माखन दधि खाते थे,
समझ न पाया जन ये सार ll

आओ तुमको भेद बताऊँ,
क्यों करता था वैसा खेल l
कंस राज का बचपन में ही,
तोड़ दिया था सुदृढ़ जेल ll

चौदह वर्ष राम ने वन में,
सीख सिखाया सबको नेक l
राजभवन औ वनवासी मिल,
भेद छोड़ हो आये एक ll

युग तक जो थे दुर्बल शोषित,
जागी उनके मन में आश ll
रावण जैसे अचल राज का,
कर डाला पूरा ही नाश ll

बनु चाबी खोला तालों को,
खुले जेल के सारे द्वार ll
राज कंश को पहला झटका,
देकर गया नदी के पार ll

ऊँच नीच का भेद बहुत था,
बँटा हुआ था लोक समाज l
सब लोगों को गले लगाया,
रच डाला समता का राज ll

पिछड़ेपन से ग्रसित जनों को,
सिखलाया समता औ प्रीत l
पशु – पक्षी से प्रेम जगाया,
ब्रज में विकसित पावन रीत ll

कालिय के फन को नाथा था,
यमुना नदी हुई आजाद l
पुतना सी नकली माता तो,
अब भी होगी सबको याद ll

अविकसित पिछड़े नर नारी,
अधनंगे करते स्नान l
दुर्जन पापी लाभ उठाकर,
करते थे उनका अपमान ll

मैने इसके ही कारण से,
सदा चुराया उनका चीर l
हुआ सुधार प्रकृति में उनके,
दूर हुई उनकी सब पीर ll

कराधान में निर्धन जन को,
देना पड़ता माखन खीर l
उपजाने वालेे भूखे थे,
खाता राजवंश पंजीर ll

नारी जन अपमानित होतीं,
सरेआम इज्जत की लूट l
इसीलिये मैने रोका था,
और चला था नीतिक कूट ll

मटकी फोड़ी माखन खाया,
रोकी थी मथुरा की राह l
राजभवन को धक्का पहुँचा,
बिखर गई थी उनकी चाह ll

स्वाभिमान का भाव जगाकर,
मिटा दिया वर्षों का रोग l
हँसी खुशी सब एक हुए थे,
अहा ! बहुत सुन्दर संयोग ll

गैया गोप गोपिका सारे,
बंशी धुन सुन रहते झूम l
चारों ओर खुशी का उत्सव,
मची दिवाली जैसी धूम ll

पागल हुआ कंस मतवाला,
जो घमंड में रहता चूर l
मूल मिटाकर मैने उसका,
मिटा दिया भू से नासूर ll

जिन हाथों में बंशी राजै,
उसी हाथ में सोहे चक्र l
प्रेम चाहिए सज्जन को औ,
दंड चाहिए जो हैं वक्र ll

तीन दिवस तक रामचन्द्र ने,
विनती की सागर के संग l
मान नहीं रख पाया सागर,
दिखलाया रघुपति ने रंग ll

मैने भी बहु बिधि समझाया,
माना नहीं दुष्ट शिशुपाल l
सौ गलती तक माफ किया औ,
उड़ा दिया फिर उसका भाल।।

कुरुक्षेत्र की पावन धरती,
को होना था निश्चय लाल।
बहुत रोकना चाहा था पर,
मंडराया था सिर पर काल।।

रास छोड़कर योग लिया तब,
हो आया श्री योगीराज।
गीता का संदेश सुनाकर,
किया धर्म हित में ये काज।।

मीत प्रीत गुरु नीति सखा के,
साथ किया उत्तम व्यवहार।
जो जैसा बोया, काटेगा,
जीवन का होता ये सार।।

इसीलिए सत्कर्म करो सब,
करो नहीं फल की तुम आस।
ईश्वर पर विश्वास रखोगे,
हरि आएंगे चलकर पास।।

बहुत भ्रांति है जग के भीतर,
समझो समुचित इसका राज।
योग भोग का भेद समझ लो,
संयम से हो स्वयं सुराज।।

धर्म हानि जब जब हो हूं पर,
लेता हूं मैं ही अवतार।
धर्मराज को स्थापित कर,
करता हूं सबका उद्धार।।

— डॉ. अवधेश कुमार अवध

*डॉ. अवधेश कुमार अवध

नाम- डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’ पिता- स्व0 शिव कुमार सिंह जन्मतिथि- 15/01/1974 पता- ग्राम व पोस्ट : मैढ़ी जिला- चन्दौली (उ. प्र.) सम्पर्क नं. 919862744237 Awadhesh.gvil@gmail.com शिक्षा- स्नातकोत्तर: हिन्दी, अर्थशास्त्र बी. टेक. सिविल इंजीनियरिंग, बी. एड. डिप्लोमा: पत्रकारिता, इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग व्यवसाय- इंजीनियरिंग (मेघालय) प्रभारी- नारासणी साहित्य अकादमी, मेघालय सदस्य-पूर्वोत्तर हिन्दी साहित्य अकादमी प्रकाशन विवरण- विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन नियमित काव्य स्तम्भ- मासिक पत्र ‘निष्ठा’ अभिरुचि- साहित्य पाठ व सृजन

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