गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

अब बच्चे घर में ही वृद्धाश्रम बनवाते हैं।
मां बाप को अकेले कमरे में छोड़ जाते हैं।।

और खैर खबर तनिक भी लेते नहीं उनकी।
समाज को अपना नहीं असली रूप दिखलाते हैं।।

दया है नहीं तनिक मात्र जिनके मन में।
जायदाद धोखे से अपने नाम करवाते हैं।।

चू-चपड़ अगर कर दी जो जरा भाई।
उनके ही पैसों से उनको ही मरवाते हैं।।

अब अहमियत रही नहीं मां- बाप की।
औलाद होकर भी नंगा नाच दिखलाते हैं।।

मौत तो बहुत ही आसान हो गई है अब।
सर पर लटकी तलवार देख जीते जाते हैं।।

जिन्हें ताउम्र रखा फूलों की तरह हिफ़ाजत से।
आज वही बच्चे देखो सूली पर लटकाते हैं।।

— प्रीती श्रीवास्तव

*प्रीती श्रीवास्तव

पता- 15a राधापुरम् गूबा गार्डन कल्याणपुर कानपुर

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