जब वेतन की राशि से रोशन हुए गरीब बच्चों के सपने
लालगांव, रीवा। मंदिर में चढ़ाया गया प्रसाद कुछ क्षणों की तृप्ति देता है, लेकिन किसी निर्धन विद्यार्थी के हाथ में थमाई गई किताब उसके पूरे जीवन की दिशा बदल सकती है। पूजा-पाठ और धार्मिक आस्था अपनी जगह हैं, लेकिन किसी जरूरतमंद बच्चे की शिक्षा में सहयोग करके उसके भविष्य को संवारना और उसे राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा से जोड़ना भी अपने आप में किसी साधना से कम नहीं।
शिक्षक राहुल सिंह के जीवन और शिक्षा के प्रति उनके समर्पण को इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। लालगांव, रीवा से ताल्लुक रखने वाले राहुल सिंह ने शिक्षक के रूप में नौकरी को केवल जीविकोपार्जन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को निभाने का अवसर बनाया।
सरकारी शिक्षक के रूप में मिलने वाली राशि का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने विद्यार्थियों की पढ़ाई-लिखाई, शैक्षणिक आवश्यकताओं तथा विद्यालय परिसर को सुंदर और हरा-भरा बनाने जैसे कार्यों में लगाने का प्रयास किया। उनके लिए विद्यालय महज चारदीवारी नहीं, बल्कि भविष्य गढ़ने वाली कर्मभूमि था।
2005 से 2012 तक चली ज्ञान की अविरल धारा
वर्ष 2005 से 2012 तक राहुल सिंह ने लालगांव के शिव मंदिर में बच्चों को लगातार नि:शुल्क शिक्षा प्रदान की। खास बात यह थी कि उनका ध्यान विशेष रूप से उच्च कक्षाओं—10वीं, 11वीं और 12वीं के विद्यार्थियों पर रहता था, क्योंकि यही वह पड़ाव है जहां से विद्यार्थी अपने भविष्य की दिशा तय करते हैं।
एक बैच में लगभग 70 विद्यार्थी होते थे और सुबह से शाम तक लगभग चार बैच संचालित किए जाते थे। इस प्रकार प्रतिदिन लगभग 280 विद्यार्थी शिक्षा के इस नि:शुल्क अभियान से जुड़े रहते थे। आठ वर्षों की इस लंबी अवधि में बैचवार विद्यार्थी सहभागिता का अनुमान लगाया जाए तो यह संख्या दो हजार से अधिक बैठती है।
हालांकि यह केवल संख्या नहीं थी। इन आंकड़ों के पीछे सैकड़ों परिवारों की उम्मीदें, हजारों सपने और एक शिक्षक का अथक परिश्रम छिपा था।
जब विद्यार्थियों की सफलता में छलक उठती थीं गुरु की आंखें
राहुल सिंह की शिक्षा-यात्रा की सबसे भावुक और गौरवपूर्ण तस्वीर तब सामने आती थी, जब उनके पढ़ाए हुए विद्यार्थी भारतीय वायु सेना, नौसेना, पुलिस और भारतीय सेना जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं में चयनित होकर सबसे पहले अपने प्रिय शिक्षक से मिलने या उन्हें अपनी सफलता की खबर देने पहुंचते थे।
विद्यार्थी जब कहते—“सर, आपका पढ़ाया हुआ आज काम आ गया”, तो उनके चेहरे पर गर्व के साथ आंखों में भावनाओं की नमी उतर आती।
विद्यार्थी अपनी सफलता पर खुश होता और उसके साथ ही राहुल सिंह भी भावुक हो उठते। आखिर एक शिक्षक के लिए इससे बड़ा पुरस्कार क्या हो सकता है कि जिस बच्चे को उसने कभी अक्षर और विषय का ज्ञान दिया था, वही बच्चा आगे चलकर देश की वर्दी पहनकर राष्ट्रसेवा के लिए खड़ा हो जाए।
इसी क्रम में राहुल सिंह द्वारा पढ़ाए गए 19 विद्यार्थी भारतीय सेना में चयनित हुए, जो किसी भी शिक्षक के लिए अत्यंत गौरव और संतोष का विषय है।
शासकीय विद्यालयों में 24 वर्षों की सेवा
राहुल सिंह की सेवायात्रा केवल नि:शुल्क शिक्षा तक सीमित नहीं रही। उन्होंने लगभग 12 वर्ष शासकीय बालक विद्यालय, लालगांव और लगभग 12 वर्ष शासकीय कन्या विद्यालय, लालगांव में शासकीय शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
लगभग 24 वर्षों की इस सेवा ने उन्हें लालगांव और आसपास के क्षेत्र के विद्यार्थियों के बीच एक ऐसे शिक्षक के रूप में स्थापित किया, जिसकी भूमिका केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले शिक्षक की नहीं थी, बल्कि शिक्षा की नींव मजबूत करने वाले मार्गदर्शक की थी।
उनका प्रयास रहा कि ग्रामीण और सामान्य परिवारों के बच्चे भी शिक्षा के उस स्तर तक पहुंचें, जहां से वे अपने लिए बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकें।
कक्षा से लेकर मैदान तक—बहुआयामी व्यक्तित्व
राहुल सिंह की पहचान केवल शिक्षक के रूप में ही नहीं रही। उन्होंने एनसीसी ऑफिसर के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं और विद्यार्थियों में अनुशासन, नेतृत्व और राष्ट्रभावना के संस्कार विकसित करने में भूमिका निभाई।
वे स्वयं राज्य स्तरीय वालीबॉल प्रतियोगिता के स्टेट लेवल खिलाड़ी भी रहे हैं। खेल और शिक्षा के इस समन्वय ने उनके व्यक्तित्व को और व्यापक बनाया।
शिक्षा उनके लिए केवल किताबों तक सीमित नहीं थी। उनका मानना रहा कि एक विद्यार्थी को पढ़ाई के साथ अनुशासन, शारीरिक क्षमता, आत्मविश्वास और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का बोध भी होना चाहिए।
विद्यालय का प्रांगण भी बना उनकी पाठशाला
राहुल सिंह का पर्यावरण के प्रति लगाव भी उनके कार्यों में दिखाई देता रहा। विद्यालय परिसर में बागवानी और हरियाली के लिए किया गया प्रयास इस बात का प्रमाण है कि वे बच्चों को केवल किताबों में प्रकृति का पाठ पढ़ाने के पक्षधर नहीं थे, बल्कि उन्हें प्रकृति के बीच जीवन का पाठ पढ़ाना चाहते थे।
एक पौधा लगाना उनके लिए केवल हरियाली बढ़ाना नहीं था। वह आने वाली पीढ़ी के लिए छाया, स्वच्छ हवा और जीवन के प्रति संवेदनशीलता का बीजारोपण था।
एक शिक्षक की सबसे बड़ी कमाई
किसी शिक्षक की वास्तविक कमाई उसके बैंक खाते में नहीं, बल्कि उसके विद्यार्थियों के जीवन में दिखाई देती है।
राहुल सिंह के लिए वह कमाई तब दिखाई देती है, जब उनका कोई विद्यार्थी सेना की वर्दी पहनता है, कोई पुलिस सेवा में जाता है, कोई एयर फोर्स या नेवी में चयनित होता है और कोई अपने जीवन में सफलता की नई कहानी लिखता है।
शायद इसीलिए राहुल सिंह को यह विचार अधिक प्रिय रहा कि मंदिर में प्रसाद चढ़ाने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण किसी गरीब और निर्धन विद्यार्थी की पढ़ाई में सहयोग करके उसके भविष्य को संवारना और राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाना है।
यह विचार केवल एक शिक्षक का विचार नहीं, बल्कि शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानने वाली भारतीय परंपरा का आधुनिक रूप है।
राहुल सिंह—एक नाम नहीं, एक शैक्षणिक संस्कार
लालगांव के शिक्षा इतिहास में राहुल सिंह का योगदान किसी एक पद, किसी एक विद्यालय या किसी एक उपलब्धि तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
नि:शुल्क शिक्षा से लेकर शासकीय विद्यालयों में दीर्घ सेवा तक, विद्यालय परिसर की हरियाली से लेकर विद्यार्थियों के अनुशासन तक और कक्षा-कक्ष से लेकर सेना की वर्दी तक—उनकी यात्रा अनेक पड़ावों से होकर गुजरती है।
उन्होंने जिन बच्चों को पढ़ाया, उनमें से जब कोई राष्ट्र की सेवा के लिए आगे बढ़ता है तो वह केवल उस विद्यार्थी की सफलता नहीं होती; वह उसके गुरु के संस्कारों की भी सफलता होती है।
19 विद्यार्थियों का भारतीय सेना में चयन इस यात्रा का ऐसा अध्याय है, जिसे कोई भी शिक्षक जीवन भर गर्व से याद कर सकता है।
आज शिक्षक दिवस के अवसर पर जब हम गुरु की महिमा का स्मरण करते हैं, तब राहुल सिंह जैसे शिक्षकों को याद करना इसलिए आवश्यक हो जाता है, क्योंकि ऐसे शिक्षक हमें बताते हैं कि शिक्षक होना केवल नौकरी करना नहीं, बल्कि पीढ़ियों के भविष्य को आकार देना है।
एक शिक्षक चॉक से ब्लैकबोर्ड पर कुछ शब्द लिखता है, लेकिन उसके संस्कार विद्यार्थियों के जीवन पर वर्षों तक लिखे रहते हैं।
राहुल सिंह ने भी लालगांव की धरती पर ऐसे ही संस्कारों की इबारत लिखी है।
शिक्षक दिवस पर ऐसे समर्पित शिक्षक को नमन, जिन्होंने शिक्षा को सेवा बनाया, सेवा को संस्कार बनाया और संस्कारों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की राह में अपनी भूमिका निभाई।
— कवि आशीष तिवारी निर्मल
