संस्मरण

धनचटानी का वह अद्भुत धान

कभी-कभी जीवन की सबसे खूबसूरत यात्राएँ बहुत दूर जाकर नहीं, बल्कि अपने ही आसपास की पगडंडियों पर मिल जाती हैं। हम अक्सर किसी अनजानी जगह, किसी प्रसिद्ध पर्यटन स्थल या किसी बड़े शहर को देखने के लिए दूर निकल जाते हैं, लेकिन हमारे आसपास बसे छोटे-छोटे गाँव और वहाँ रहने वाले सरल लोग अपने भीतर ऐसी अनमोल कहानियाँ समेटे रहते हैं, जिन्हें जानकर मन सचमुच ठहर जाता है। मेरे जीवन का एक ऐसा ही अनुभव है धनचटानी की वह यात्रा, जिसे मैं आज भी भूल नहीं पाई हूँ।

मेरे कार्यालय में जितेंद्र महतो नाम का एक बहुत अच्छा और मेहनती कर्मचारी था। हमारे यहाँ निर्माण कार्य के साथ पेंटिंग का काम भी होता था और जितेंद्र उसी काम से जुड़ा हुआ था। वह बहुत सरल, मिलनसार और आत्मीय व्यक्ति था। उसके घर में जब भी कोई शुभ अवसर आता, किसी की शादी हो, बच्चे का कोई संस्कार हो या कोई और पारिवारिक आयोजन, वह बड़े आग्रह से हमें अपने घर बुलाता। लेकिन हम कभी उसके घर जा नहीं पाए।

एक दिन उसने बहुत सहज भाव से कहा, “नहीं मैडम, आप लोग बड़े लोग हैं और हम आपकी कंपनी में काम करने वाले वर्कर हैं। हमारे घर आकर आप क्या करेंगी?” उसकी बात सुनकर मुझे सचमुच बहुत बुरा लगा। उसके शब्दों में शिकायत नहीं थी, लेकिन अपने और हमारे बीच बनाई गई एक दूरी जरूर थी। मन में आया।आखिर इंसान की आत्मीयता के आगे यह बड़ा-छोटा कहाँ से आ गया? मुझे उसकी यह बात भीतर तक छू गई।

हर वर्ष १४ जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर वह अपने घर से अनरसा बनाकर जरूर लाता। मेरी माँ भी उसे बहुत सम्मान देती थीं। उसे बड़े प्यार से बैठातीं, चाय-पानी करातीं और उसके लाए अनरसे को भी बड़े प्रेम से स्वीकार करतीं। एक दिन मैं और मेरी छोटी बहन बैठे-बैठे सोचने लगे “वह हमें इतने प्यार से अपने घर बुलाता है, तो एक बार उसके घर चलकर क्यों न आया जाए?” और फिर एक दिन हम दोनों उसके घर पहुँच ही गए।

हम जमशेदपुर के टेल्को स्थित घोड़ाबांधा में रहते हैं और उसका घर भी वहीं आसपास, धनचटानी की ओर था। हमारे पहुँचते ही जितेंद्र और उसके परिवार की खुशी देखते ही बनी । उन्हें जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हम सचमुच उनके घर आ गए हैं। वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि हमें कहाँ बिठाएँ, क्या खिलाएँ, कैसे हमारा स्वागत करें। उनके चेहरे की खुशी और अपनापन देखकर मन भर आया।

उसका घर मिट्टी का था। मिट्टी की चौड़ी दीवारें, सादगी से भरा आँगन और घर के भीतर जमीन में बना हुआ चूल्हा। उसकी पत्नी उसी चूल्हे पर लकड़ी जलाकर खाना बना रही थी। आश्चर्य की बात यह थी कि वहाँ धुएँ का लेशमात्र भी नहीं था। हमारे लिए उन्होंने बड़े प्यार से सूजी का मीठा व्यंजन बड़े प्रेम से बनाया। उसका स्वाद आज भी मेरी स्मृतियों में वैसा ही ताजा है।

उसका घर काफी बड़ा था। आसपास उसके रिश्तेदार और पाटीदारों के घर थे। पूरे वातावरण में एक अपनापन और सहजता थी। घर के पीछे की ओर बहुत बड़ा खेत था। थोड़ी दूर एक छोटा-सा पोखर था, जिसमें मछलियाँ थीं। इमली के पेड़, पके हुए पपीते और छोटी-छोटी मचान बनाकर उन पर फैली लौकियाँ पूरा वातावरण जैसे किसी चित्रकार की बनाई हुई सुंदर ग्रामीण पेंटिंग हो। हमने वहाँ तस्वीरें भी खिंचवाईं और उस ग्रामीण परिवेश को जी भरकर देखा। तभी जितेंद्र ने कहा “मैडम, हमारा गाँव धनचटानी क्यों कहलाता है, यह आपको जरूर देखना चाहिए।” हम उसकी बात सुनकर उसके साथ चल पड़े।

वह हमें अपने घर से कुछ दूर एक स्थान की ओर ले गया। वहाँ पहुँचने से लगभग बीस-पच्चीस फीट पहले ही उसने हमसे चप्पल उतारने को कहा। उसने बताया कि आगे की भूमि और वह पहाड़ी उनके लिए पवित्र और पूजनीय है। वहाँ चप्पल पहनकर जाना उचित नहीं माना जाता। हमने भी उस आस्था का सम्मान करते हुए वहीं अपनी चप्पलें उतार दीं और नंगे पाँव उस पवित्र भूमि की ओर बढ़ चले। सामने एक छोटी-सी पहाड़ी थी। लेकिन उसे देखते ही हमारी आँखें ठहर गईं।

ज़ब हम गये उस वक़्त धान नहीं था लेकिन उसके कुछ अंश थे। ज़ब मौसम होता है तो स्वतः धान उग आते हैं! ज्यादा नहीं थोड़ा। न कोई सामान्य खेत जैसा समतल भूभाग, न बहुत गहरी मिट्टी—फिर भी उस छोटी-सी पहाड़ी पर धान की फसल थी। मैंने आश्चर्य से जितेंद्र की ओर देखा। उसने बताया कि यह कोई आज की बात नहीं है। उनके बुजुर्गों के समय से, पीढ़ियों से यहाँ धान उगता आ रहा है। इस स्थान की अपनी एक पुरानी परंपरा और मान्यता है। इसी अद्भुत विशेषता के कारण इस स्थान का नाम धनचटनी पड़ा।

मैं उस दृश्य को देर तक देखती रही। प्रकृति का यह रूप मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। एक ओर उस भूमि के प्रति लोगों की आस्था और श्रद्धा, दूसरी ओर उसी पवित्र धरती पर सदियों से उगता धान। दोनों मिलकर उस स्थान को मेरे लिए और भी रहस्यमय और सुंदर बना रहे थे।

उस दिन मुझे एक और बात बहुत गहराई से समझ आई। जिस व्यक्ति को हम अपने कार्यालय में केवल एक वर्कर के रूप में जानते थे, उसके जीवन के भीतर अपनी एक समृद्ध संस्कृति, अपनी परंपराएँ और प्रकृति से जुड़ी कितनी अनमोल धरोहरें थीं, इसका हमें अंदाजा तक नहीं था। जितेंद्र जिसे अपना छोटा-सा गाँव समझकर सहजता से जी रहा था, हमारे लिए वह किसी खोज से कम नहीं था।

उस दिन उसके घर का मिट्टी का चूल्हा, उसकी पत्नी के हाथों का बनाया मीठा व्यंजन, माँ के लिए लाया हुआ अनरसा, खेत, पोखर, पेड़-पौधे और वह पवित्र पहाड़ी सब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन गए। इसी यात्रा ने मुझे यह भी सिखाया कि किसी व्यक्ति की  समृद्धि तो उसके व्यवहार, संस्कार, आत्मीयता और अपनी मिट्टी से जुड़े होने में होती है। हम अक्सर दुनिया देखने के लिए बहुत दूर निकल जाते हैं, जबकि हमारे अपने आसपास के छोटे-छोटे गाँव, वहाँ के लोग, उनकी परंपराएँ और प्रकृति अपने भीतर ऐसी अनगिनत कहानियाँ सँजोए बैठे हैं, जिन्हें सामने लाने की जरूरत है।

आज भी जब धनचटानी का नाम सुनती हूँ, तो आँखों के सामने वही दृश्य उभर आता है। नंगे पाँव उस पवित्र भूमि की ओर बढ़ते हम, सामने छोटी-सी पहाड़ी और उस पर धान। और मन कह उठता है- दुनिया सचमुच बहुत बड़ी है, लेकिन उसकी सबसे अनमोल कहानियाँ कभी-कभी हमारे अपने घर की चौखट से कुछ ही दूर मिल जाती हैं।

— सविता सिंह मीरा 

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

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