साधारण सी कविता
साधारण सी कविता
भी चोंच मारती है
आपकी गलतियों पर
कीचड़ उछालती है
भले छोटी है
पर आपकी औकात को
नापती है
झूठी बातों पर
ताला लगा देती है
बड़े-बड़ों को भी
धूल चटा देती है
छोटी भले हूँ
एक दिन के लिए ही सही
खिलकर
खुशबू बिखेर देती हूँ
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
