राजनीति

वोट की चोट ही आज का अहिंसक हथियार

लोकतंत्र केवल सरकार बनाने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह समाज के प्रत्येक नागरिक को अपने भविष्य, अपने अधिकारों और अपनी गरिमा के संबंध में निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करने वाली व्यवस्था है। महात्मा गांधी ने अहिंसा को केवल संघर्ष से बचने का साधन नहीं माना था, बल्कि उसे अन्याय के विरुद्ध नैतिक शक्ति और जनशक्ति के रूप में देखा था। आज लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसी अहिंसक शक्ति का सबसे प्रभावशाली और संवैधानिक रूप मतदान है। वोट वह शक्ति है जिसमें न तलवार है, न हिंसा, न रक्तपात; फिर भी वह सत्ता के चरित्र को बदलने, प्रतिनिधियों को बदलने और शासन की दिशा निर्धारित करने की क्षमता रखता है। इसलिए यह कहना सार्थक है कि “वोट की चोट ही आज का अहिंसक हथियार है।” यह चोट किसी व्यक्ति या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि अन्याय, उपेक्षा, भेदभाव, असमानता और गैर-जवाबदेही के विरुद्ध लोकतांत्रिक चेतावनी है।

भारतीय समाज में सदियों से अनेक वंचित, पिछड़े, दलित, आदिवासी, अत्यंत पिछड़े, गरीब, श्रमिक, महिलाएँ और अन्य हाशिये पर स्थित समुदाय सामाजिक तथा आर्थिक विषमताओं का सामना करते आए हैं। स्वतंत्रता और संविधान ने समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा का मार्ग खोला, लेकिन संवैधानिक आदर्शों को वास्तविक जीवन में पूरी तरह उतारना अभी भी एक सतत प्रक्रिया है। आज भी जब किसी कमजोर वर्ग के साथ अन्याय होता है, जब किसी गरीब की आवाज दब जाती है, जब किसी वंचित व्यक्ति को न्याय पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है या जब किसी समुदाय की सामूहिक पीड़ा को राजनीतिक सुविधा के कारण नजरअंदाज किया जाता है, तब लोकतंत्र के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है—क्या हमारे प्रतिनिधि वास्तव में जनता की आवाज बन रहे हैं? यदि नहीं, तो मतदाता के पास शांतिपूर्ण ढंग से अपनी असहमति व्यक्त करने का सबसे बड़ा साधन उसका वोट ही है।

लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। प्रतिनिधित्व का वास्तविक अर्थ है—जनता की पीड़ा को समझना, अन्याय के समय उसके साथ खड़ा होना, उसकी आवाज को संस्थाओं तक पहुँचाना और उसके अधिकारों की रक्षा करना। विशेष रूप से कमजोर और हाशिये पर स्थित लोगों के लिए प्रतिनिधि का दायित्व और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि जिन लोगों के पास आर्थिक शक्ति, सामाजिक प्रभाव या संस्थागत पहुँच कम होती है, उनके लिए एक संवेदनशील और जवाबदेह प्रतिनिधि लोकतांत्रिक सुरक्षा-कवच का काम कर सकता है।

यहीं प्रतिनिधि के चरित्र की सबसे कठिन परीक्षा होती है। यदि कोई प्रतिनिधि अपने जातीय या सामुदायिक हित को पूरे समाज के हित से ऊपर रखता है, दूसरे समुदायों की पीड़ा के प्रति उदासीन रहता है और न्याय के प्रश्न पर भी अपनी संकीर्ण पहचान के चश्मे से निर्णय करता है, तो केवल उसकी मजबूत राजनीतिक पार्टी से संबद्धता उसके इस आचरण को उचित नहीं बना सकती। लोकतंत्र में शक्तिशाली दल किसी उम्मीदवार को चुनाव जिताने में सहायता कर सकता है, लेकिन वह उसके चरित्र को जनहितैषी नहीं बना देता। पार्टी की शक्ति प्रतिनिधि की राजनीतिक क्षमता हो सकती है; लेकिन निष्पक्षता, करुणा, न्यायप्रियता और सर्वहित की भावना उसके सार्वजनिक चरित्र की कसौटी होनी चाहिए।

इसका एक सरल उदाहरण समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी क्षेत्र में दो उम्मीदवार हैं। पहला उम्मीदवार अत्यंत शक्तिशाली राजनीतिक दल से आता है, उसके पास संगठन, संसाधन और प्रभाव सब कुछ है, लेकिन उसके सार्वजनिक व्यवहार में बार-बार यह दिखाई देता है कि वह अपने जातीय या सामुदायिक समूह के हितों को प्राथमिकता देता है और अन्य वर्गों की वास्तविक समस्याओं के प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाता। दूसरा उम्मीदवार राजनीतिक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर है, उसके पास न बड़ा संगठन है, न आर्थिक शक्ति और न ही सत्ता के बड़े केंद्रों तक पहुँच; लेकिन वह गरीब, कमजोर और वंचित व्यक्ति की बात सुनता है, अन्याय के समय पीड़ित के साथ खड़ा होता है और अपने व्यवहार से यह सिद्ध करता है कि उसके लिए मनुष्य की गरिमा किसी जातीय या सामुदायिक पहचान से बड़ी है। ऐसी स्थिति में मतदाता को केवल पार्टी की शक्ति देखकर निर्णय नहीं करना चाहिए। उसे दोनों उम्मीदवारों के चरित्र, कार्य और सार्वजनिक आचरण का स्वतंत्र मूल्यांकन करना चाहिए।

यहाँ एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक सिद्धांत सामने आता है—कमजोर राजनीतिक स्थिति वाला व्यक्ति आवश्यक रूप से कमजोर प्रतिनिधि नहीं होता और मजबूत राजनीतिक दल का उम्मीदवार आवश्यक रूप से मजबूत जनप्रतिनिधि नहीं होता। कभी-कभी सत्ता और संगठन की दृष्टि से कमजोर व्यक्ति नैतिक दृष्टि से अत्यंत मजबूत हो सकता है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका चरित्र, उसकी संवेदनशीलता और जनता के प्रति उसकी निष्ठा हो सकती है। इसके विपरीत, अत्यंत शक्तिशाली राजनीतिक मंच पर खड़ा व्यक्ति यदि संकीर्ण जातीय या सामुदायिक पक्षधरता से ऊपर उठने में असमर्थ है, तो उसकी राजनीतिक शक्ति जनता के वास्तविक हित की गारंटी नहीं बन सकती।

इसलिए मतदाता के सामने असली प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “कौन सबसे शक्तिशाली दल का उम्मीदवार है?” बल्कि यह होना चाहिए कि “कौन सबसे अधिक न्यायप्रिय, सक्षम, संवेदनशील, उदार और जवाबदेह है?” प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “कौन केवल मेरे समुदाय के हित की बात करता है?” बल्कि यह होना चाहिए कि “कौन मेरे समुदाय सहित पूरे समाज के कमजोर व्यक्ति के अधिकार और सम्मान की रक्षा करेगा?” यही वह परिवर्तन है जो मतदान को सामान्य राजनीतिक पसंद से उठाकर लोकतांत्रिक विवेक का प्रयोग बना देता है।

किसी उम्मीदवार का अपने समुदाय के प्रति लगाव अपने-आप में दोष नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब सामुदायिक लगाव न्याय और सार्वजनिक कर्तव्य पर हावी हो जाता है। एक जनप्रतिनिधि अपने समुदाय की समस्याओं को उठाए, यह स्वाभाविक और लोकतांत्रिक है; लेकिन उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि न्याय की कसौटी सभी नागरिकों के लिए समान रहे। यदि किसी प्रतिनिधि का व्यवहार लगातार इस बात का संकेत देता है कि वह केवल अपने जातीय या सामुदायिक समूह के हित को प्राथमिकता देगा, तो मतदाता को उसकी राजनीतिक शक्ति या दलगत संबद्धता से प्रभावित हुए बिना उसके सार्वजनिक आचरण पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

दूसरी ओर, जो व्यक्ति स्वयं राजनीतिक रूप से कमजोर है, लेकिन उदार हृदय रखता है, सभी के प्रति सम्मान रखता है और कमजोर व्यक्ति के अधिकार के लिए खड़ा होता है, उसे केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि उसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संगठन नहीं है। लोकतंत्र में संगठन महत्वपूर्ण है, लेकिन संगठन से ऊपर जनता का विश्वास है। संसाधन चुनाव जीतने में सहायता कर सकते हैं; लेकिन जनविश्वास लंबे समय के सार्वजनिक आचरण से अर्जित होता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी गरीब परिवार के साथ अन्याय होता है और शक्तिशाली प्रतिनिधि राजनीतिक गणना के कारण मौन रहता है, जबकि अपेक्षाकृत कमजोर उम्मीदवार बिना किसी स्वार्थ के पीड़ित परिवार के साथ खड़ा होता है, उसकी कानूनी और प्रशासनिक सहायता के लिए आवाज उठाता है और न्याय की मांग करता है, तो मतदाता को इस अंतर को अवश्य देखना चाहिए। चुनाव के समय के भाषण से अधिक महत्वपूर्ण वह आचरण है, जो संकट की घड़ी में दिखाई देता है। न्याय के समय कौन खड़ा हुआ—यही प्रश्न किसी प्रतिनिधि के वास्तविक चरित्र को समझने की सबसे प्रभावी कसौटियों में से एक हो सकता है।

इसी प्रकार, यदि किसी क्षेत्र में विकास की योजनाओं के लाभ का वितरण केवल प्रभावशाली समूहों तक सीमित रह जाता है और कोई प्रतिनिधि इस असमानता को देखकर भी मौन रहता है, जबकि कोई दूसरा व्यक्ति कमजोर और गरीब लोगों के लिए समान अवसर की मांग करता है, तो मतदाता को दोनों के सार्वजनिक व्यवहार की तुलना करनी चाहिए। लोकतंत्र में प्रतिनिधि का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने अपने समर्थकों के लिए क्या किया, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि उसने उन लोगों के लिए क्या किया जिन्होंने उसे वोट नहीं दिया या जो राजनीतिक रूप से उसके प्रभाव क्षेत्र से बाहर थे।

यही कारण है कि “अपना” और “पराया” की संकीर्ण धारणा लोकतांत्रिक विवेक के लिए बाधा बन सकती है। चुनाव के बाद प्रतिनिधि केवल अपने समर्थकों का प्रतिनिधि नहीं रहता; वह पूरे निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है। इसलिए मतदाता को भी चुनाव के समय अपनी पसंद निर्धारित करते हुए व्यापक सार्वजनिक हित को ध्यान में रखना चाहिए। जो व्यक्ति अपने समर्थकों के साथ-साथ अपने आलोचकों और राजनीतिक विरोधियों के अधिकारों का भी सम्मान करता है, उसमें लोकतांत्रिक नेतृत्व की अधिक परिपक्वता दिखाई देती है।

एक अत्यंत महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक सिद्धांत यह भी होना चाहिए कि मतदाता की निष्ठा किसी राजनीतिक दल की “लाइन” तक सीमित नहीं होनी चाहिए। राजनीतिक दल लोकतंत्र के आवश्यक संस्थागत माध्यम हैं, लेकिन किसी दल का नाम अपने-आप में किसी उम्मीदवार की जनसेवा, सदाशयता, क्षमता या न्यायप्रियता का प्रमाण नहीं हो सकता। पार्टी का मूल्यांकन अपनी जगह आवश्यक है, लेकिन उम्मीदवार के व्यक्तिगत चरित्र और उसके सार्वजनिक आचरण का मूल्यांकन भी उतना ही आवश्यक है।

मतदाता को ऐसे व्यक्ति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, जो वास्तव में समाज का शुभचिंतक हो और विशेषकर उन कमजोर तथा वंचित लोगों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील हो, जिनकी आवाज अक्सर सत्ता और व्यवस्था के बीच दब जाती है। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से गरीबों, श्रमिकों, महिलाओं, युवाओं, वंचितों और अन्य कमजोर वर्गों के अधिकार, सम्मान और सुरक्षा के लिए कार्य करता रहा है, तो उसके कार्यों को केवल उसकी पार्टी की पहचान से कमतर नहीं आंका जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सक्षम, उदार, न्यायप्रिय, संवेदनशील और संघर्षशील है तथा उसने वास्तविक जीवन में दबे-कुचले लोगों के पक्ष में अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध की है, तो उसके सार्वजनिक चरित्र को मतदान के निर्णय में गंभीर महत्व मिलना चाहिए।

मतदान का आधार केवल यह नहीं होना चाहिए कि “कौन किस पार्टी का है”, बल्कि यह होना चाहिए कि “कौन जनता का है, कौन न्याय के समय जनता के साथ खड़ा रहा है और कौन पूरे समाज के कल्याण को अपना दायित्व समझता है।” यही दृष्टिकोण मतदाता को अंधी दलगत निष्ठा से मुक्त करके विवेकपूर्ण लोकतांत्रिक निर्णय की ओर ले जा सकता है।

प्रतिनिधि की जवाबदेही का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब किसी कमजोर व्यक्ति या समुदाय के साथ अन्याय होता है और उसके अपने कहे जाने वाले प्रतिनिधि भी उस घटना का संज्ञान नहीं लेते, पीड़ित की आवाज नहीं उठाते या न्याय के लिए प्रभावी प्रयास नहीं करते, तब केवल सामुदायिक पहचान के आधार पर उनके प्रदर्शन को अच्छा मान लेना लोकतांत्रिक विवेक की दृष्टि से उचित नहीं होगा। प्रतिनिधि की असली परीक्षा उत्सव, भाषण और चुनावी मंच पर नहीं, बल्कि संकट के समय होती है।

मतदाता को चुनाव से पहले अपने आप से कुछ मूलभूत प्रश्न पूछने चाहिए—क्या उम्मीदवार केवल चुनाव के समय जनता के बीच आता है या सामान्य दिनों में भी जनता के साथ रहता है? क्या उसने किसी अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई है? क्या उसने कमजोर और वंचित लोगों की समस्याओं को समझने का प्रयास किया है? क्या वह अपने समुदाय से बाहर के लोगों के साथ भी समान सम्मान का व्यवहार करता है? क्या वह अपने विरोधियों के अधिकारों का भी सम्मान करता है? क्या उसका सार्वजनिक जीवन पारदर्शी और जवाबदेह रहा है? क्या उसकी दृष्टि केवल अपने समूह तक सीमित है या पूरे समाज के कल्याण तक विस्तृत है?

इन प्रश्नों के उत्तर ही मतदाता को उस व्यक्ति की वास्तविक पहचान समझने में सहायता कर सकते हैं। किसी उम्मीदवार की जाति, समुदाय, पार्टी, लोकप्रियता या राजनीतिक शक्ति उसके मूल्यांकन का केवल एक पहलू हो सकती है; लेकिन उसकी निष्पक्षता, ईमानदारी, संवेदनशीलता, क्षमता, जनसेवा और संकट के समय उसका आचरण कहीं अधिक महत्वपूर्ण कसौटियाँ होनी चाहिए।

साथ ही यह भी समझना आवश्यक है कि अपने समुदाय के हितों की बात करना और संकीर्ण सामुदायिक पक्षधरता दो अलग बातें हैं। कोई व्यक्ति अपने समुदाय की समस्याओं को उठाते हुए भी पूरे समाज के प्रति न्यायपूर्ण रह सकता है। वास्तविक आदर्श वही है, जिसमें अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान हो। बहुजन हित का व्यापक अर्थ यही है कि समाज के कमजोर और वंचित लोगों को न्याय, अवसर और सम्मान मिले तथा किसी भी व्यक्ति के साथ उसकी पहचान के कारण अन्याय न हो।

वोट की शक्ति का सबसे सुंदर पक्ष यही है कि यह बिना किसी हिंसा के सत्ता को जवाबदेह बनाती है। कोई नागरिक किसी प्रतिनिधि से असहमत हो सकता है, उसके कार्यों की आलोचना कर सकता है और अगले चुनाव में दूसरे उम्मीदवार को चुन सकता है—और यह सब संवैधानिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर रहकर किया जा सकता है। यही गांधी जी की अहिंसक संघर्ष की भावना का लोकतांत्रिक विस्तार माना जा सकता है। आज का मतदाता किसी सत्ता के विरुद्ध हिंसा नहीं करता; वह मतदान केंद्र तक जाता है और अपने विवेक से निर्णय करता है।

इसलिए “वोट की चोट” का अर्थ किसी व्यक्ति या समुदाय के विरुद्ध चोट नहीं है। इसका अर्थ है—अन्यायपूर्ण आचरण पर लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया, उपेक्षा पर जवाबदेही, वादाखिलाफी पर जननिर्णय और सत्ता के अहंकार पर संवैधानिक नियंत्रण। यह चोट जितनी शांत होती है, उतनी ही शक्तिशाली भी हो सकती है। लोकतंत्र में सबसे मजबूत संदेश कभी-कभी सबसे शांत तरीके से दिया जाता है।

विशेष रूप से कमजोर और वंचित वर्गों को अपने मताधिकार को केवल राजनीतिक समर्थन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की शक्ति के रूप में समझना चाहिए। लेकिन यह शक्ति तभी प्रभावी होगी, जब उसके साथ विवेक जुड़ा हो। किसी उम्मीदवार को केवल इसलिए समर्थन न मिले कि वह “अपना” है और किसी को केवल इसलिए अस्वीकार न किया जाए कि वह “दूसरा” है। अंतिम कसौटी हो—उसका चरित्र, उसका काम, उसकी संवेदनशीलता, उसकी क्षमता, उसकी न्यायप्रियता और पूरे समाज के प्रति उसका दृष्टिकोण।

अंततः लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति न तो केवल सत्ता में है और न केवल राजनीतिक दलों में; उसकी सबसे बड़ी शक्ति जागरूक नागरिक और उसका विवेकपूर्ण वोट है। जब मतदाता अपने वोट को जातीय आग्रह, दलगत अंधनिष्ठा, भावनात्मक उकसावे और व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठाकर संविधान, न्याय, मानव गरिमा और लोककल्याण के आधार पर प्रयोग करता है, तब मतदान वास्तव में परिवर्तन का अहिंसक हथियार बन जाता है। वंचित समुदायों की राजनीतिक शक्ति तब और सार्थक बनती है, जब वह अपने अधिकारों की रक्षा के साथ पूरे समाज में न्याय और समान अवसर की स्थापना का माध्यम बने।

वोट की चोट में रक्त नहीं बहता, लेकिन व्यवस्था को आईना अवश्य दिखता है। इसमें किसी के प्रति घृणा नहीं होती, लेकिन अन्याय के विरुद्ध स्पष्ट संदेश अवश्य होता है। इसमें हिंसा नहीं होती, लेकिन परिवर्तन की अपार शक्ति होती है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती है और यही गांधी जी की अहिंसा की भावना का आधुनिक लोकतांत्रिक रूप है—सत्य के साथ खड़ा होना, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना, प्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाना, दलगत अंधनिष्ठा से ऊपर उठना और अपने विवेक का प्रयोग करते हुए ऐसे प्रतिनिधित्व को महत्व देना, जो व्यक्ति, दल या संकीर्ण सामुदायिक हित से ऊपर उठकर कमजोरों की आवाज, सामाजिक न्याय और समूचे समाज के कल्याण को अपना दायित्व समझे।

यही वह लोकतांत्रिक चेतना है, जो वोट को केवल एक बटन दबाने की क्रिया से उठाकर परिवर्तन की शक्ति बना देती है। जब मतदाता पूछता है—“कौन मेरे समुदाय का है?” से पहले “कौन न्याय का है?”, “कौन जनता के साथ खड़ा रहा है?”, “कौन कमजोर के साथ खड़ा हुआ है?” और “कौन पूरे समाज के कल्याण के लिए समर्पित है?”—तभी लोकतंत्र अपने वास्तविक अर्थ में जीवंत होता है। जब वोट पहचान की दीवारों से ऊपर उठकर चरित्र, न्याय, क्षमता, उदारता और सर्वहित को चुनता है, तब वह वास्तव में गांधीवादी अहिंसक शक्ति का आधुनिक लोकतांत्रिक रूप बन जाता है।

वोट केवल अधिकार नहीं है; यह जिम्मेदारी है। वोट केवल प्रतिनिधि चुनने का साधन नहीं है; यह प्रतिनिधि को जवाबदेह बनाने की शक्ति है। वोट केवल वर्तमान का निर्णय नहीं है; यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का निर्माण भी है। इसलिए मतदाता का विवेक ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है और उसका शांतिपूर्ण, स्वतंत्र तथा सोच-समझकर किया गया मतदान ही उस शक्ति का सबसे प्रभावशाली अहिंसक प्रयोग है।

— डॉ. अशोक

डॉ. अशोक कुमार शर्मा

पिता: स्व ० यू ०आर० शर्मा माता: स्व ० सहोदर देवी जन्म तिथि: ०७.०५.१९६० जन्मस्थान: जमशेदपुर शिक्षा: पीएचडी सम्प्रति: सेवानिवृत्त पदाधिकारी प्रकाशित कृतियां: क्षितिज - लघुकथा संग्रह, गुलदस्ता - लघुकथा संग्रह, गुलमोहर - लघुकथा संग्रह, शेफालिका - लघुकथा संग्रह, रजनीगंधा - लघुकथा संग्रह कालमेघ - लघुकथा संग्रह कुमुदिनी - लघुकथा संग्रह [ अन्तिम चरण में ] पक्षियों की एकता की शक्ति - बाल कहानी, चिंटू लोमड़ी की चालाकी - बाल कहानी, रियान कौआ की झूठी चाल - बाल कहानी, खरगोश की बुद्धिमत्ता ने शेर को सीख दी , बाल लघुकथाएं, सम्मान और पुरस्कार: काव्य गौरव सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, कविवर गोपाल सिंह नेपाली काव्य शिरोमणि अवार्ड, पत्राचार सम्पूर्ण: ४०१, ओम् निलय एपार्टमेंट, खेतान लेन, वेस्ट बोरिंग केनाल रोड, पटना -८००००१, बिहार। दूरभाष: ०६१२-२५५७३४७ ९००६२३८७७७ ईमेल - ashokelection2015@gmail.com

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