कविता

कविता

आधुनिकता की आंधी ऐसी आई,
कि जाकर मोबाइल से टकराई,
रिश्ते नाते ने मोबाइल में बना लिया घर,
चाहे वो गाँव हो या फिर शहर।
गाँव की चौपाल अब मोबाइल पे बसती है,
दादी की कहानियां गुगल सुनाती है,
रोटी को पिज्जा ने हराया है,
पारंपरिक वस्त्र और जीवन शैली की जगह
पाश्चात्य सभ्यता ने परचम लहराया है।
रील ने रीयल लाईफ को पीछे दिया ढकेल,
गजब का जमाना आया ,गजब का है ये खेल।
फेसबुक पोस्ट पे जिसने दिया भ्यू और लाईक,
वो होते हैं अपने बाकी सब पराए,
पता नहीं आगे और क्या क्या
देखनो को मिल जाए।
व्हाटस्प पे सब भरे पड़े हैं डाक्टर, ज्योतिष,योगाचार्य और वैध,
झक मार रहें हैं डिग्रीधारी क्योंकि अज्ञानता
की बाजार सजा बैठे हैं ये अवैध।
आधुनिकता बुरी नहीं बस न हो ये अंधा,
अज्ञानी और फ्रॉड को न करने दें ठगमारी का धंधा।

— मृदुल शरण

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