कुण्डलिनी छंद
अपना आज सुधारना, यही समय की सीख।
वरना फिर तैयार हो, चलो माँगने भीख।।
मांगोगे तुम भीख, और मत देखो सपना।
बोरा बिस्तर बाँध, कटोरा थामों अपना।।९३
अपने मन उद्गार पर, अंकुश रखिए आप।
इतने भर से आपको, नहीं लगेगा पाप।।
नहीं लगेगा पाप, देखिए सुंदर सपने।
इसका भी है लाभ, लगेंगे सब ही अपने।।९४
जिसका जीवन आधार, रहे नहीं मजबूत।
उसको कहते हैं सभी, मजबूरी का दूत।।
मजबूरी का दूत, दोष दे भी तो किसका।
किया खूब अपमान, सहारा मिलना जिसका।।९५
इतनी कोशिश की मगर, पूरी हुई न चाह।
शायद मैं चलता रहा, अब तक उल्टी राह।।
अब तक उल्टी राह, मगर आशा थी कितनी।
समझ में आया आज, राह खाली क्यों इतनी।।९६
तुमसे बढ़कर कौन है, कहना क्या आसान।
तू क्या मुझको समझता, मैं इतना नादान।।
मैं इतना नादान, नहीं होगा ये हमसे।
कहें मित्र यमराज, निवेदन करता तुमसे।।९७
कितना भी समझाइए, हम सब मद में चूर।
इसीलिए तो हैं नहीं, भेदभाव से दूर।।
भेदभाव से दूर, तमाशा करते जितना।
इतनी कोशिश बाद, अभी करना है कितना।।९८
उलझन सबकी एक तो, फिर कैसा है द्वंद्व।
झूठा करते हम सभी, नाहक ही छलछंद।।
नाहक ही छलछंद, बजाते घंटा टनटन।
खोया बुद्धि विवेक, नहीं सुलझाते उलझन।।९९
नाहक करना व्यर्थ है, अब तो ये तकरार।
अब चिंता क्यों कर रहे, कैसी हो सरकार।।
कैसी हो सरकार, बने घूमो अब बुड़बक।
चुनकर भेजे आप, झूठ अब रोते नाहक।।१००
माता रानी आइए, निर्धन के भी द्वार।
जिनका कोई भी नहीं, बेचारे लाचार।।
बेचारे लाचार, करें वो भी जगराता।
उन सबका उद्धार, आप अब करिए माता।।१०१
माता रानी आइए, नहीं कीजिए खेल।
पीड़ा इतनी जगत में, फ़ैले जस विष-बेल।।
फैले जस विष-बेल, आप तो हो सुखदाता।
विनय करो स्वीकार, जगत की जननी माता।।१०२
विनती मेरी भी सुनो, मैं हो रहा अधीर।
माता रानी आइए, हरिए सारी पीर।।
हरिए सारी पीर, नहीं अब करिए गिनती।
या लूँ अब मैं मान, व्यर्थ करना है विनती।।१०३
भूली बिसरी बात का, करिए नहीं गुमान।
हँसी-खुशी से लीजिए, आप सभी संज्ञान।।
आप सभी संज्ञान, नहीं ये कोई मूली।
कहें मित्र यमराज, बात है बिसरी भूली।।१०४
अब हर घर परिवार में, खिंची एक दीवार।
हो जाती मजबूत है, हिले नहीं आधार।।
मिले नहीं आधार, खून का रिश्ता भी जब।
नहीं किसी को पीर, भला हो सकता क्या अब।।१०५
आओ मिलकर हम करें, एक नई शुरुआत।
अलख जगाएँ देश में, मिटे भ्रष्ट सौगात।।
मिटे भ्रष्ट सौगात, सभी सुर ताल मिलाओ।
पकड़ो दूजा हाथ, साथ मेरे सब आओ।।१०६
सबकी अपनी भावना, सबके अपने भाव।
अलख जगाएँ हम सभी, फिर भी मिलता घाव।
फिर भी मिलता घाव, कहानी कैसी मन की।
कहें मित्र यमराज, समस्या यह है सबकी।।१०७
योगी अलख जगा रहे, मोदी हैं हैरान।
चलते सीना तान कर, बढ़े देश का मान।
बढ़े देश का मान, रहे कोई ना रोगी।
सत्य सनातन राह पर, रहे चल बाबा योगी।।१०८
सबको इतना है पता, प्रेम जगत का सार।
फिर भी कहते लोग हैं, झूठा है आधार।।
झूठा है आधार, कहेंगे हम क्या उनको।
कहें मित्र यमराज, आप समझा दो सबको।।१०९
किसको किससे आजकल, रहा कहाँ अनुराग।
सभी स्वार्थ में गा रहे, राग बेसुरा फाग।।
राग बेसुरा फाग, देखिए चाहे जिसको।
कहें मित्र यमराज, दोष दें भी तो किसको।।११०
झूठा मत दिखलाइए, आप हमें अनुराग।
हम तो देखें रोज ही, सतरंगी है झाग।।
सतरंगी है झाग, आप को रहना रूठा।
दुनिया कहती आज, सगा जो सबसे झूठा।।१११
माँगा जिसने भीख में, मिला नहीं अनुराग।
नाहक क्यों चिंता करें, बोल रहा है काग।।
बोल रहा है काग, नहीं मिलता अब झाँगा।
देख चुका यमराज, सभी से उसने माँगा।।११२
कुदरत के संकेत का, जिसने समझा सार।
वो ही इसका है बड़ा, सबसे प्यारा यार।।
सबसे प्यारा यार, करें जो इससे नफरत।
उसको करती दूर, पास से अपने कुदरत।।११३
भिक्षा कोई है नहीं, जो स्वतंत्र है देश।
लिखी गई इसकी कथा, बलिदानी परिवेश।।
बलिदानी परिवेश, लीजिए इसकी शिक्षा।
कहें मित्र यमराज, नहीं स्वतंत्रता भिक्षा।।११४
स्वतंत्रता का अर्थ है, सब अधिकार समान।
हर भारतवासी सदा, नित्य बढ़ाए शान।।
नित्य बढ़ाए शान, देश है उन्नति करता।
तभी हमें भी गर्व, यही है प्रिय स्वतंत्रता।।११५
गाथाएँ बलिदान की, कितना पढ़ते आज।
बुझकर दिए चिराग ने, ये स्वतंत्रता ताज।।
ये स्वतंत्रता ताज, आपने सुनी कथाएँ।
अभी बहुत है शेष, पर्त में बहु गाथाएँ।।११६
जिनके कारण है मिली, ये आजादी आज।
संघर्षों की राह में, छिपे बहुत हैं राज।।
छिपे बहुत हैं राज, नाम हम जाने किनके।
करिए सबको याद, नाम अनाम हैं जिनके।।११७
आजादी के गीत को, देश रखेगा याद।
ऐसा होता ही रहे, बिना किसी उन्माद।।
बिना किसी उन्माद, बनेंगे हम सब वादी।
नित नूतन उल्लास, हमें देगी आजादी।।११८
करते उनको याद हम, बलिदानी जो वीर।
भारत माँ की गोद में, मौन हुए रणवीर।।
मौन हुए रणवीर, आज मेले हैं सजते।
आजादी के नाम, नमन उन सबको करते।।११९
करिए उनको याद सब, दिये देश को मान।
आजादी के रंग से, रचा भारती गान।।
रचा भारती गान, हृदय में उनको रखिए।
कभी न भूलें आप, हमेशा इतना करिए।।१२०
कहना है बेकार अब, बोल बड़े अनमोल।
सभी बोलना चाहते, वाणी में विष घोल।।
वाणी में विष घोल, लगे अच्छा कब सहना।
अब मेरा सिद्धांत, नहीं कुछ भी अब कहना।।१२१
होना चाहो यदि सफल, चलो वक्त के संग।
पड़े जरूरत बदल लो, अपना जीवन रंग।।
अपना जीवन रंग, चैन से यदि है सोना।
कहें मित्र यमराज, हमेशा अच्छे होना।।१२२
रोके से कब है रुका, बड़ा प्रश्न ये आज।
हर कोई है चाहता, सजे शीश पर ताज।।
सजे शीश पर ताज, नहीं अच्छे ये झोंके।
चलन बढ़ा जो आज, इसे आओ हम रोकें।।१२३
जिसकी जैसी भावना, वैसी उसकी बात।
ईश्वर जब चाहे करें, खुशियों की बरसात।।
खुशियों की बरसात, करें चिंता कब इसकी।
करते अपना काम, कामना जैसी जिसकी।।१२४
मर्यादा का है नहीं, उनको इतना ज्ञान।
इसीलिए क्या टूटता, उनका नही गुमान।।
उनका नहीं गुमान, करें क्या इससे ज्यादा।
बने हुए बेशर्म, कहें क्या है मर्यादा।।१२५
मजबूरी की मार का, सहना है जब दंश।
लिखा ईश ने जन्म से, भाग्य हमारे वंश।।
भाग्य हमारे वंश, हमेशा सुख से दूरी।
इसमें क्या खास, नयी है क्या मजबूरी।।१२६
कच्ची गोली खेलकर, जीता किसने खेल।
इससे तो उत्तम यही, सबसे रखना मेल।।
सबसे रखना मेल, करो मत माथा-पच्ची।
अगर बुद्धि से हीन, खाइए रोटी कच्ची।।१२७
आया कैसा समय है, बिगड़े बोल जनाब।
सबसे ऊपर हो गए, आज सभी के ख्वाब।।
आज सभी के ख्वाब, देखिए कलयुग माया।
बिना बुलाए द्वार, हमारे चलकर आया।।११२८
भरिए आप उड़ान अब, उचित समय को मान।
मन से भेद निकाल दो, कैसे भरें उड़ान।।
कैसे भरें उड़ान, नहीं अब बिल्कुल डरिए।
डर को फेंको दूर, भाव अपने मन भरिए।।१२९
बढ़ता जाए रोग अब, मौसम के अनुसार।
सावधान रहते सभी, फिर भी बनता भार।।
फिर भी बनता भार, एक दूजे पर चढ़ता।
रहना चाहें दूर, मगर ये जाता बढ़ता।।१३०
रोना रोकर क्या करे, कोई नहीं करीब।
कौन नहीं है जानता, सहता मार गरीब।।
सहता मार गरीब, ढ़ूँढ़ता रहता कोना।
यह भी जब अपराध, चाहता छुपकर रोना।।१३१
पाला पोसा आपने, फिर क्यों रोते आज।
घाव बने नासूर कल, पहले समझो राज।।
पहले समझो राज, भले वो दिल का काला।
नहीं किया अहसान, अगर उसको है पाला।।१३२
सारी सच्ची राह क्यों, भूल गया नादान।
फिर भी कहते हम सभी, बड़े श्रेष्ठ इंसान।।
बड़े श्रेष्ठ इंसान, रहा लग जैसे गारी।
ऐसे लगता आज, नग्न मानवता सारी।।१३३
रक्षाबंधन/राखी
रक्षाबंधन जोड़ता, है अद्भुत संबंध।
चला युगों से आ रहा, रिश्तों का प्रबंध।।
रिश्तों का प्रबंध, भ्रात हर्षित होता मन।
आकर बहना आज, बाँध दे रक्षाबंधन।।१३४
रक्षाबंधन पर्व फिर, आज है खुशियां लाया।
बहना रही पधार, हमारा मन हर्षाया।।
हमारी मन हर्षाया, माथ पर टीका चंदन।
एक बार फिर आज, सजेगा रक्षाबंधन।।१३५
बंधन रक्षा बाँधकर, देती दुआ हजार।
बहनें केवल चाहती, बना रहे ये प्यार।।
बना रहे ये प्यार, भ्रात मेरा रघुनंदन।
पड़े नहीं कमजोर, हमारा नाता बंधन।।१३६
