कविता

डर

डर से अब सब डरना छोड़ो।
दिशा आप जीवन की मोड़ो।।
तब जीवन खुशहाल बनेगा।
शीश तुम्हारे ताज सजेगा।।

जितने भी हैं भ्रष्टाचारी।
डरते उनसे हैं अधिकारी।।
यही समस्या सबसे भारी।
करो मिटाने की तैयारी।।

मातु-पिता अब आज हैं डरते।
बच्चे उनको नहीं समझते।।
घर घर की अब यही कहानी।
भूल रहे सब दादी नानी।।

रिश्ते डर से कब हैं चलते।
प्रेम भाव जब तक न बरतें।।
डर को हमें डराना होगा।
वरना कल को होगा रोगा।।

जीवन में डर बहुत जरूरी।
मगर नहीं कोई मजबूरी।।
डर से करनी होगी यारी।
यही बनेगी बड़ी दुलारी।।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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