विवाह क्यों नहीं करना चाहते आज के युवा?
पिछले एक दशक में भारत में विवाह को लेकर जो आंकड़े आए हैं, वे व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि बड़े प्रामाणिक शोधों पर आधारित हैं। पहला बड़ा शोध YouGov-Mint-CPR मिलेनियल सर्वे है, जिसमें बीस से पैंतीस साल के सात हजार तीन सौ अठानवे युवाओं से बात की गई। इस सर्वे ने बताया कि हर चार में से एक युवा विवाह नहीं करना चाहता, उन्नीस प्रतिशत युवा विवाह और संतान दोनों से इनकार करते हैं, और नौ प्रतिशत विवाह चाहते हैं पर संतान नहीं। आय के साथ सीधा संबंध निकला, दस हजार से कम आय वाले परिवारों में चालीस प्रतिशत युवा विवाह से कतराते हैं, जबकि साठ हजार से अधिक आय में यह आंकड़ा बीस प्रतिशत रह जाता है।
दूसरा स्रोत भारत सरकार के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की यूथ इन इंडिया रिपोर्ट और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण है। इसके अनुसार कभी विवाह न करने वाले युवा पुरुषों की संख्या दो हजार ग्यारह में बीस दशमलव आठ प्रतिशत थी, जो दो हजार उन्नीस में छब्बीस दशमलव एक प्रतिशत हो गई। महिलाओं में यह आंकड़ा तेरह दशमलव पांच से बढ़कर उन्नीस दशमलव नौ प्रतिशत हो गया। विवाह की औसत आयु दो हजार पांच-छह में सत्रह दशमलव चार वर्ष थी, जो दो हजार उन्नीस-इक्कीस में उन्नीस दशमलव सात वर्ष हो गई। बारह वर्ष से अधिक शिक्षा प्राप्त महिलाओं की शादी की उम्र अशिक्षित महिलाओं से साढ़े पांच वर्ष अधिक पाई गई।
तीसरा शोध कॉर्नेल विश्वविद्यालय की समाजशास्त्री प्रोफेसर अलका बसु का है, जो पॉपुलेशन स्टडीज जर्नल में नवंबर दो हजार बाइस में प्रकाशित हुआ। उन्होंने भारतीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण का विश्लेषण कर बताया कि पुरुषों में विवाह में देरी मौज-मस्ती के लिए नहीं, बल्कि बेरोजगारी के कारण है। अब वधू पक्ष केवल डिग्री नहीं, रोजगार वाला वर चाहता है। चौथा साक्ष्य यूनिसेफ के युवा मंच यूवाह और यू-रिपोर्ट का सर्वे है, जिसमें अठारह से उनतीस साल के चौबीस हजार युवाओं ने भाग लिया। पचहत्तर प्रतिशत युवाओं ने कहा कि पढ़ाई के बाद महिलाओं के लिए सबसे जरूरी कदम नौकरी है, विवाह नहीं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष यूएनएफपीए ने तिहत्तर देशों के एक लाख से अधिक युवाओं पर सर्वे कर बताया कि युवा रिश्तों को नकार नहीं रहे, बल्कि आर्थिक सुरक्षा के बाद उन्हें करना चाहते हैं। इन शोधों की पृष्ठभूमि में आज के सवाल को समझना जरूरी है।
विवाह भारतीय समाज में केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि संस्कृति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा का संगम रहा है। पहले विवाह समय पर हो जाना परिपक्वता का प्रमाण था। पर आज युवा विवाह को टाल रहे हैं। इसे विद्रोह कहना आसान है, पर समझना अधिक जरूरी है। पहला कारण आर्थिक है और सबसे कठोर भी। आज स्थिर नौकरी पाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। किराया, शिक्षा ऋण, माता-पिता की जिम्मेदारी और भविष्य की अनिश्चितता के बीच विवाह अतिरिक्त वित्तीय बोझ लगता है। जब YouGov सर्वे कहता है कि कम आय में विवाह की इच्छा आधी रह जाती है, तो स्पष्ट होता है कि विवाह अब केवल भावना नहीं, बजट का प्रश्न है। युवा पहले अपने पैरों पर खड़ा होना चाहते हैं। दूसरा कारण शिक्षा और स्त्री स्वतंत्रता का उदय है। जब लड़की बारह साल से अधिक पढ़ती है तो उसकी शादी औसतन पांच साल देर से होती है। यह देरी उसकी महत्वाकांक्षा की जीत है। वह अब केवल पत्नी बनने के लिए नहीं पढ़ी, वह अधिकारी, शिक्षक, उद्यमी बनना चाहती है। वह ऐसा जीवनसाथी चाहती है जो उसकी नौकरी और सपनों का सम्मान करे। यदि ऐसा साथी नहीं मिलता, तो अकेले रहना उसे गरिमा लगता है। तीसरा कारण स्वतंत्रता और पहचान की खोज है। आज के युवाओं ने अपने माता-पिता की समझौते वाली शादियां देखी हैं। उन्होंने घर में चुपचाप सहती मां और थका हुआ पिता देखा है। वे उस कहानी को दोहराना नहीं चाहते। वे प्रेम में मित्रता चाहते हैं, बंधन में नहीं। वे घूमना चाहते हैं, लिखना चाहते हैं, असफल होना चाहते हैं, फिर खड़े होना चाहते हैं। विवाह उन्हें लगता है कि इन सब पर विराम लग जाएगा। यह स्वार्थ नहीं, आत्म-खोज है।
चौथा कारण रिश्तों का बदलता मनोविज्ञान है। सोशल मीडिया ने परफेक्ट पार्टनर की अवास्तविक अपेक्षा बना दी है। छह फुट लंबा, अच्छी नौकरी, कविता भी लिखे और खाना भी बनाए, ऐसा व्यक्ति मिलना कठिन है। दूसरी ओर तलाक, घरेलू हिंसा और दहेज की खबरें युवाओं में डर पैदा करती हैं। वे सोचते हैं कि जल्दबाजी में गलत व्यक्ति से बंधने से अच्छा है, प्रतीक्षा की जाए। पांचवां कारण विकल्पों की उपलब्धता है। पहले विवाह ही एकमात्र मान्य सहजीवन था। आज लिव-इन, लंबी मित्रता और अकेले रहने को भी समाज स्वीकार कर रहा है। कानून भी लिव-इन को संरक्षण देता है। जब विकल्प हैं, तो अनिवार्यता खत्म हो जाती है। विवाह अब मजबूरी नहीं, चुनाव बन गया है।
क्या इसका अर्थ युवा विवाह संस्था के विरुद्ध हैं? नहीं। यूएनएफपीए का वैश्विक सर्वे कहता है कि युवा प्रेम और परिवार चाहते हैं, पर भय में नहीं, भरोसे में चाहते हैं। वे देर से शादी करना चाहते हैं, पर बेहतर शादी करना चाहते हैं। वे ऐसी शादी चाहते हैं जहां संवाद हो, बराबरी हो, और जरूरत पर अलग होने की स्वतंत्रता भी हो। समाज को इस परिवर्तन को कोसने की बजाय समझना होगा। यदि बेरोजगारी देरी का कारण है, तो रोजगार बढ़ाना होगा। यदि लड़कियों की शिक्षा विवाह टाल रही है, तो यह उत्सव का विषय है। यदि युवा बराबरी वाला रिश्ता खोज रहे हैं, तो लड़कों को भी घर संभालना और भावना व्यक्त करना सिखाना होगा।
विवाह कभी खत्म नहीं होगा, क्योंकि मनुष्य को साथ की जरूरत रहेगी। पर उसका स्वरूप बदलेगा। पहले विवाह दो परिवारों का अनुबंध था, अब वह दो व्यक्तियों की दोस्ती बन रहा है। पहले वह जीवन की शुरुआत थी, अब वह ठहराव के बाद लिया गया परिपक्व निर्णय बन रहा है। इसलिए जब कोई युवा कहे कि मुझे अभी शादी नहीं करनी, तो उसे गैर-जिम्मेदार न समझें। वह जिम्मेदार बनने की तैयारी कर रहा है। वह ऐसी जमीन तैयार कर रहा है जहां विवाह बेड़ी नहीं, दो स्वतंत्र लोगों की साझा उड़ान बन सके। यही नए भारत की चेतना है, जो देर से आती है पर दूर तक जाती है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
