तेल के रास्ते बंद, सऊदी बेबस, ईरान के हाथ में दुनिया की नब्ज
मध्यपूर्व की इस जंग में अब असली निशाना सिर्फ जमीन, बंदरगाह या सैन्य अड्डे नहीं हैं। असली निशाना तेल के रास्ते हैं। सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर ड्रोन हमले ने दुनिया को फिर याद दिला दिया है कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था कितनी नाजुक है। करीब 1200 किलोमीटर लंबी यह पाइपलाइन फारस की खाड़ी के तेल को लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक पहुंचाती है और इसकी अधिकतम क्षमता करीब 70 लाख बैरल प्रतिदिन है। हमले के बाद इसका संचालन रोकना पड़ा।यही इस हमले का सबसे बड़ा अर्थ है। सऊदी अरब ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन इसलिए बनाई थी कि फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भरता कम हो। सामान्य परिस्थितियों में होर्मुज से प्रतिदिन करीब दो करोड़ बैरल तेल और तेल उत्पाद गुजरते हैं। अब जब होर्मुज युद्ध के कारण दबाव में है और सऊदी का वैकल्पिक पाइपलाइन मार्ग भी चोटिल हो गया, तो बाजार में डर लौटना स्वाभाविक है।कच्चे तेल का दाम 100 डॉलर के पार जाना इसी डर की कीमत है। ब्रेंट 109 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुका है। बाजार में भविष्य की कमी की आशंका आज की कीमत बढ़ाती है। यदि पाइपलाइन लंबे समय तक बंद रहती है, तो यानबू से निर्यात प्रभावित होगा और सऊदी अरब को आपूर्ति की नई गणित बनानी पड़ेगी। जिस पाइपलाइन से हाल में लगभग 40 से 50 लाख बैरल प्रतिदिन तेल गुजर रहा था, उसका रुकना वैश्विक बाजार के लिए बड़ा झटका है। यह वैश्विक आपूर्ति का लगभग चार प्रतिशत हिस्सा है।सऊदी अरब की मुश्किल यह है कि उसके सामने सिर्फ एक रास्ते का संकट नहीं है। पूर्व में होर्मुज है, दक्षिण में बाब अल-मंदब है और पश्चिम में लाल सागर। हूती हमलों ने बाब अल-मंदब और लाल सागर की जहाजरानी को जोखिम में डाल रखा है। होर्मुज में ईरान के साथ टकराव ने दूसरा बड़ा रास्ता असुरक्षित कर दिया। अब वह पाइपलाइन भी बंद है जिसे इन्हीं समुद्री जोखिमों का विकल्प माना जाता था।
इस घटना को सिर्फ सऊदी अरब पर हमला मानना भूल होगी। तेल की कीमत केवल उत्पादन से तय नहीं होती; परिवहन, बीमा, भंडार और जोखिम भी उसकी कीमत बनाते हैं। पाइपलाइन बंद होने का मतलब यह नहीं कि दुनिया से अचानक लाखों बैरल तेल गायब हो गया। मतलब यह है कि उपलब्ध तेल को बाजार तक पहुंचाना कठिन और महंगा हो गया।भारत के लिए असली चिंता यहीं से शुरू होती है। घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार की हर छलांग को उसी दिन नहीं दिखातीं। तेल कंपनियां पुराने स्टॉक और घरेलू परिस्थितियों के आधार पर झटका कुछ समय रोक सकती हैं। लेकिन यदि कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहता है, तो दबाव बढ़ेगा। भारत का आयात बिल बढ़ेगा, रुपये पर दबाव आएगा और महंगे परिवहन का असर खाद्य पदार्थों से लेकर उद्योग तक दिखाई देगा।इस संकट का राजनीतिक चेहरा भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्की के साथ मक्का रक्षा समझौता किया है। यदि सऊदी के तेल ढांचे पर लगातार हमले होते हैं, तो सवाल उठेगा कि सुरक्षा साझेदारी केवल राजनीतिक बयान है या जरूरत पड़ने पर सैनिक, हथियार और वायु रक्षा भी सामने आएगी।आज सऊदी अरब और हूती एक-दूसरे के कट्टर विरोधी हैं, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। 1934 में सऊदी-यमन युद्ध के बाद असीर और नजरान जैसे इलाके सऊदी नियंत्रण में आए। फिर 1962 में यमन की राजशाही गिरने के बाद मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर ने गणतांत्रिक सरकार के समर्थन में सेना भेजी। एक समय यमन में लगभग 70 हजार मिस्री सैनिक मौजूद थे। सऊदी अरब ने जवाब में जैदी राजशाही समर्थकों को पैसा, हथियार और मदद दी। जिन जैदी परंपराओं से आगे चलकर हूती आंदोलन निकला, उनके पूर्ववर्तियों को कभी सऊदी समर्थन मिला था।आधुनिक हूती आंदोलन ने बाद में सऊदी और यमनी सत्ता दोनों के लिए चुनौती पैदा की। 2004 से 2009 के बीच कई युद्ध हुए और 2009 में सऊदी सेना सीधे संघर्ष में उतरी। पहाड़ी भूगोल और गुरिल्ला युद्ध ने सऊदी सेना को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर किया। 2019 में हूतियों के हमले ने इसी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के पंपिंग स्टेशनों को निशाना बनाया था।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि ईरान की रणनीति क्या है। यदि होर्मुज को दबाव में रखकर और उसके समर्थक गुटों के जरिए लाल सागर तथा तेल ढांचे पर खतरा बढ़ाकर वह अमेरिका और उसके सहयोगियों की आर्थिक लागत बढ़ाता है, तो युद्ध का मैदान मिसाइलों से निकलकर वैश्विक बाजार में पहुंच जाता है। महंगा तेल अमेरिका के लिए आर्थिक ही नहीं, घरेलू राजनीतिक संकट भी बन सकता है।यहीं ईरान की परोक्ष युद्ध रणनीति का महत्व समझना होगा। ईरान पर सीधे हमला करना एक बात है, लेकिन उसके प्रभाव क्षेत्र में मौजूद सशस्त्र गुटों के जरिए ऊर्जा ढांचे को दबाव में लाना दूसरी। इससे जवाबदेही धुंधली रहती है और विरोधी को एक साथ कई मोर्चे संभालने पड़ते हैं। यही वजह है कि किसी हमले की जिम्मेदारी सामने न आने के बावजूद उसके रणनीतिक असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता अब। सऊदी अरब के लिए खतरा अब केवल सीमा पार से आने वाली मिसाइल नहीं, बल्कि किसी भी दिशा से आने वाला छोटा ड्रोन भी है।अगर पाइपलाइन ही निशाना बन जाए, तो होर्मुज का विकल्प मौजूद होकर भी कमजोर पड़ जाता है। सैकड़ों किलोमीटर लंबे ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा किसी सैन्य अड्डे जैसी नहीं की जा सकती। हर किलोमीटर पर सैनिक तैनात करना संभव नहीं। यही इस हमले की असली रणनीतिक ताकत है एक छोटा ड्रोन हजारों किलोमीटर की ऊर्जा रणनीति को अस्थायी रूप से पंगु बना सकता है।आने वाले दिनों में निर्णायक बात यह होगी कि सऊदी अरब पाइपलाइन कितनी जल्दी बहाल करता है और लाल सागर तथा होर्मुज की स्थिति कितनी सुधरती है। अगर एक रास्ता बंद, दूसरा असुरक्षित और तीसरा हमले की जद में रहा, तो 120 डॉलर का तेल भी असंभव नहीं होगा। तब संकट केवल पेट्रोल-डीजल की कीमत का नहीं रहेगा। आयात बिल, महंगाई, मुद्रा और वैश्विक विकास सभी पर असर पड़ेगा। सौ बात की एक बात यही है मध्यपूर्व की जंग अब सीमाओं के भीतर नहीं रही। उसकी असली लपटें तेल के रास्तों तक पहुंच चुकी हैं।
— अजय कुमार
