सामाजिक

रिश्तों के चौराहे पर,एक गहरी पड़ताल

“तुमने अभी देखा ही क्या है??”—यह महज़ एक सवाल नहीं, बल्कि एक तर्जुमा है उस लंबी और कठिन यात्रा का जो इंसान अपनों के बीच चलते हुए तय करता है। जब भरोसे की इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढहती हैं, तब जाकर इस जुमले की असल गहराई समझ में आती है। ज़िंदगी का कैनवास जितना ख़ूबसूरत बाहर से दिखाई देता है, उसके रंगों के पीछे गहरे दर्द और धोखों की परतें छिपी होती हैं।
जिंदगी के पन्नों पर बिखरे तल्ख़ (कड़वे) अनुभव,,,इस सफ़र में हर मोड़ पर एक नया चेहरा बेनक़ाब होता है। इंसान उम्मीदों के दिए जलाकर आगे बढ़ता है, मगर हालात उसे ऐसे मोड़ों पर ला खड़ा करते हैं जहाँ सिवाय मायूसी के कुछ नहीं मिलता।
घर और अपनों का उजड़ना, जिन दीवारों को कभी प्यार और अपनापन से सींचा जाता है, वही जब अपनों की साज़िशों से उजड़ती हैं, तो दिल का आशियाना हमेशा के लिए वीरान हो जाता है।
झूठे इल्जामों की सियासत,,मैंने देखा है कि कैसे बिना किसी ठोस सबूत के लोगों पर इल्ज़ामों की झड़ी लगा दी जाती है, ताकि कमज़ोर साबित किया जा सके।
रिश्तों का खोखलापन और मुनाफिक़त
(पाखंड),, ज़ुबान पर अपनापन और दिल में नफ़रत आज के रिश्तों की यह सबसे बड़ी सच्चाई बन चुकी है, जहाँ अपने ही पीठ पर वार करने से नहीं चूकते।
ख़ुलूस (समर्पण) का अपमान,सालों की वफादारी और मोहब्बत को ताक पर रखकर, सिर्फ एक गलती को हथियार बनाया जाता है और उस ख़ुलूस को इंसान के मुँह पर दे मारा जाता है।
चालाकियाँ और मतलबपरस्ती, दुनिया के हर कोने में लोग अपनी चालबाजियों से दूसरों को नीचा दिखाने और खुद को आगे बढ़ाने की फिराक में रहते हैं।दौलत की अंधी दौड़,आज रिश्तों की डोर मोहब्बत से नहीं, बल्कि नोटों की गड्डियों से बंधती है; जहाँ पैसा रिश्ता तय भी करता है और पल भर में तोड़ भी देता है।
कमदूसरों का हक खाना),मजबूत इंसान कमजोर का हक डकार जाता है, और समाज खामोशी से तमाशा देखता रहता है।
यह तमाम कड़वी सच्चाइयाँ इंसान को अंदर से झकझोर कर रख देती हैं। यह आलेख हमें इस बात का एहसास कराता है कि भले ही दुनिया बदल जाए और लोग अपने रंग दिखाएँ, हमें अपनी इंसानियत, अपना जमीर और अपनों के प्रति सच्चा प्यार कभी नहीं खोना चाहिए। क्योंकि अंत में हमारे कर्म ही हमारी असली पहचान बनते हैं।

— डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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