गीतिका/ग़ज़ल

यादें…

यादों की रौशनी हैं , मेरे दिल के शहर में,
तहज़ीब जिंदगी हैं , मेरे दिल के शहर में।

तेरा ख्याल, तेरी तलब, बस तेरी आरज़ू,
एक भीड़ सी लगी हैं, मेरे दिल के शहर में।

दुनियां की नेमतें तो, यहां दस्ताव हैं,
तेरी ही एक कमी हैं, मेरे दिल के शहर में।

गुजरेंगे वो इधर से, सुनी जब से ये खबर,
हलचल मची हुई हैं, मेरे दिल के शहर में।

ताबिश ये कम नहीं हैं, कि ज़ख्मों के रूप में,
फूलों की ताजगी हैं, मेरे दिल के शहर में।

— आसिया फ़ारूक़ी

*आसिया फ़ारूक़ी

राज्य पुरस्कार प्राप्त शिक्षिका, प्रधानाध्यापिका, पी एस अस्ती, फतेहपुर उ.प्र

One thought on “यादें…”

  • डॉ. विजय कुमार सिंघल

    एक प्यारी सी सजनी है, मेरे दिल के शहर में।
    वो चुपके से आ बसी है, मेरे दिल के शहर में।।

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