कहानी – वो बुरे दिन
जून का महीना था। बारिश हुए को लगभग एक हफ्ता हो गया था। जून की इस बारिश को पहाड़ों में बत्र कहते हैं। यानी फसल बीजने के लिए होने वाली बारिश। इस बारिश के बाद किसान अपने-अपने खेतों में मक्की की फसल व इसके साथ की दूसरी फसलें बीजना शुरू कर देते हैं।
मोहणा के पास बैल नहीं थे।
इसलिए बत्र होने के बाद भी वह फसल नहीं बीज सकता था। वह इंतजार कर रहा था कि गांव में उसके पड़ोसी फसल बीज लें ताकि उनके बैल फ्री हो जाएं और वह भी उनसे बैल लेकर फसल बीज सके।
एक हफ्ते बाद मंगतू के बैल फसल बीज कर फ्री हुए तो वह उसके बैल मांग लाया।
अभी उसने खेत में जाकर बैल जोते ही थे और खेत में बीज बीजा ही था कि दूसरे गांव से उसके नाम की हांक पड़ी।
बैल रोककर खेत की मेढ़ पर खड़े होकर उसने बैल ध्यान से सुना तो दूसरे गांव से राजा का कारदार उसके नाम की हांक लगा रहा था। उस जमाने में संदेश को एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचाने के लिए इसी हांक के माध्यम का सहारा लिया जाता था।
गांव की किसी ऊंची जगह पर खड़े होकर जिस व्यक्ति को संदेश देना होता था उस व्यक्ति के नाम से हांक लगाई जाती थी। आवाज इतनी जोर की हुआ करती थी कि पूरी घाटी गूंज उठती थी।
गांव में हांक लगाने के लिए कुछ खास लोग भी हुआ करते थे, जिनको हांक लगाने का तजुर्बा हुआ करता था,जिनकी आवाज थोड़ी मजबूत हुआ करती थी, उनकी लगाई हांक दूर-दूर तक पहुंच जाया करती थी।
कभी गांव में किसी का स्वर्गवास हो जाता तो रिश्तेदारों को सूचना देने के लिए भी हांक का इस्तेमाल किया जाता था। जल्दी संदेश पहुंचाने का यही एक माध्यम था आज की तरह मोबाइल नहीं होते थे।
वह अपने नाम की हांक को सुनने के लिए खेत की मेढ़ पर खड़ा तो हो गया था। उसने अपने नाम की हांक पहचान ली
तब उसने हांक का जवाब दिया।
हांक के संदेश में सूचना थी कि आप को अमुक गांव से अमुक व्यक्ति के घर से एक हजार पत्तलें लेकर राजा के मुनीम यानी मेहता जी के घर राजा के नगर पहुंचानी हैं।
ये पतलें आपको कल शाम तक वहां हर हाल में पहुंचानी होंगी। यह राजा का आदेश है।
हांक वाले ने सूचित कर दिया था। “ये पत्तलें क्यों पहुंचानी हैं? और वह तो खेतों में फसल बीज रहा है आज तो उसके पास समय नहीं है।” ऐसा कहने की मोहणा तो क्या किसी में भी हिम्मत नहीं होती थी। कोई भी राजा के आदेश को मना नहीं कर सकता था। राजा के आदेश के आगे कोई भी दलील अपील नहीं चलती थी, यह तो सभी को पता था। मोहणा को मालूम था कि अगर आदेश नहीं माना तो उसका क्या हश्र होगा उसे वह बखूबी जानता था।
आदेश न मानने की सजा इतनी बड़ी होती थी कि आदमी अपनी उस सजा की कहानियां अपनी पीढ़ियों को सुनाता फिरता था और उन्हें आगाह करता था कि कभी राजा के हुक्म की अवहेलना मत करना।
यदि कोई राजा के हुक्म की अवहेलना करता तो राजा के कारदार उसे गांव की कोठी में बुला लेते और फिर वे खुद तय करते कि उसे कौन सी सजा दी जाए। सजा इतनी भयंकर होती थी की रूह कांप जाती थी पूरी तरह से अमानवीय। सी की क्या मजाल कि वह राजा की इस सजा के खिलाफ बोल पाए। कोठी गांव में वह स्थान हुआ करता था यहां से राजा के कारदार शासन चलाया करते थे।
डर बहुत बुरी चीज है। सत्ताएं हमेशा प्यार से कम डर से ज्यादा चलती रही हैं।
राजा के शासन में भी भय अपनी चरम सीमा पर था।
इसलिए उसने लगाये हुए बीज की परवाह किए बगैर जुते हुए बैल खोल दिए और पत्तलें लेने दूसरे गांव चला गया।
गांव दूर था जहां से उसने पत्तलें लानी थीं। बचा हुआ पूरा दिन उसे पत्तलें लेकर घर पहुंचने में लग गया।
जब वह घर पहुंचा तो रात उतर आई थी।
घर आकर उसने पत्तलों का गट्ठर जो किसी कपड़े में बंधा हुआ था फर्श पर रखा और एक लंबी सांस ली।
सुबह से उसने रोटी नहीं खाई थी।
घरवाली बच्चों को खिलाकर उसका ही इंतजार कर रही थी दोनों बच्चे अब तक सो गए थे।
मिट्टी के तेल के दिए की लौ में उसने अपनी गरीबी को निहारा।
दो कमरों का छोटा सा घर। जिसमें रंग रोगन हुए बरसों हो गए थे ऐसे कह सकते हैं जैसे कोई काली कोठरी हो। दो बान की चारपाइयां उन पर बिछी फटी हुई खिंदें, और टूटे-फूटे दो चार बर्तन पास के एक बोरे में थोड़ा सा अनाज यही उसकी संपत्ति थी।
उस जमाने में आज की तरह लाइट नहीं होती थी।मिट्टी के तेल के दीए जलाए जाते थे। वे भी बड़ी किफायत के साथ।
अगर कोई काम नहीं होता तो दीया बुझा दिया जाता था।तब चूल्हे की आग की रोशनी से ही काम चलाया जाता था।
और हां, रात को बची हुई आग को चूल्हे में दबा दिया जाता था। सुबह राख को कुरेद कर फिर से बची आग से आग जलाई जाती थी। माचिस खरीदने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे, कैसा युग था। घोर गरीबी के दिन।
उधर राजाओं के ठाठ।
अब पत्नी ने पुरानी पीतल की थालियों में दोनों को रोटी परोसी। सब्जी के नाम पर कुछ नहीं था,थाली में खाली दो दो रोटियां और प्याज और पुदीने की चटनी। दोनों ने रोटी खाई फिर राजा की कल की बेगार पर बातचीत की।
सुबह उसे जल्दी निकलना था इसलिए घरवाली ने उसके लिए छः रोटियां रात को ही बना दी थीं।उसके गांव से राजा का नगर पचास मील दूर था।
कोई गाड़ी नहीं चलती थी। पहाड़ की पगडंडियों को फलांघते हुए बड़ी मुश्किल से आदमी शाम तक राजा के नगर तक पहुंचता था।
फिर वहीं रात गुजारनी पड़ती थी। फिर अगली सुबहपौ फटने से पहले ही वापस आना होता था। पूरा दिन चलने के बाद शाम को घर नसीब होता था। मगर कई बार रास्ते में ही पढ़ने वाले गांव में किसी के घर रुकना पड़ जाता था। गांव वाले बेगार वाले व्यक्ति को अपने घर में शरण दे देते थे। रोटी भी खिलाते थे और सोने के लिए बिस्तर भी देते थे अच्छी आवभगत करते थे। क्योंकि वह बेगार वाले व्यक्ति की तकलीफ से अवगत होते थे।
कोई मजदूरी नहीं कोई रोटी नहीं सिर्फ रहने के लिए राजा की ओर से एक धर्मशाला होती थी वहां। वहां आग जलने के लिए थोड़ी सी लकड़ियां रखी होती थीं।
बेगार करने वाले लोग आते रुकते रोटियां सेंकते खाते और सुबह फिर अपने-अपने गांवों की ओर चल देते। हर एक परगना से हर रात कोई न कोई दो-चार लोग उस धर्मशाला में इकट्ठे हो ही जाते। सर्दियों के दिनों की लंबी ठंडी रातों में आग सेंकते अपने-अपने परगने की जानकारियां बांटते, कथाएं सुनाते और इस तरह अपने दिन भर की थकान और इस शोषण को भूल जाते।
मोहणा यह बेगार कोई पहली बार नहीं कर रहा था अपनी चालीस साल की उम्र में दर्जनों बार वह राजा की बगार कर चुका था। उसे रास्ते का भी पता था और रास्ते की मुश्किलों का भी।
सुबह वह उठा।पौ फटने को थी सारा परिवार सोया हुआ था वह पत्तलों की गठरी पीठ पर उठाकर चल दिया। पत्नी ने जो रोटियां उसे पका कर दी थी उसने उन्हें कपड़े में लपेटकर अपने झोले में डाल लिया था।
पचास मील का रास्ता पीठ पर बोझ उठाकर तय करना कोई बच्चों का खेल नहीं परंतु मोहणा मेहनत के खेल में पारंगत था। सड़कों और पगडंडियों पर चलने में बहुत फर्क होता है, पगडंडियों पर चलने के लिए टांगों में ताकत होनी चाहिए।
वह कदम दर कदम पगडंडियां फलांगने लगा, उधर धीरे-धीरे उजाला भी धरती पर बिखरने लगा था।
कहते हैं यदि सुबह चलो तो क़दम दर कदम उजाला पीछा करता है और यदि शाम के समय चलो तो कदम दर कदम अंधेरा पीछा करता है।
उस जमाने में पगडंडिया ही होती थीं। उसे कभी चार मील की खड़ी चढ़ाई चढ़ने के बाद चार मील नीचे उतरना पड़ता। फिर चार मील सीधे चलकर फिर खड़ी चढ़ाई। बस इसी तरह की उबड़ खाबड़ पगडंडियां।
कई खड्डें कई नाले क्रॉस करने पड़ते। दिन के 1:00 होंगे वह एक पनिहार पर जाकर रुका, अब उसे भूख लगी थी उसने खाना खाया पानी पिया और वही पेड़ के नीचे बैठ गया गर्मियों के दिन थे ना जाने थकावट की वजह से कब उसे नींद आ गई जब उसकी आंख खुली तो बहुत समय हो चुका था। रास्ता अभी भी काफी लंबा था परंतु उसे तो चलना था शाम तक ना सही रात तक ही सही।
पत्तलें पहुंचानी ही थीं। नहीं तो उसकी शामत आई समझो। डर भीतर से उसे डराता। उसके कदमों में डर के मारे तेजी आ जाती।
गर्मियों में वैसे भी दिन लंबे होते हैं। वह लगभग रात के दस बजेराजा के नगर पहुंच गया। उसने मेहता के घर पत्तलों की गठरी रखी और राम सलाम करके धर्मशाला की ओर आ गया। मेहता के किसी परिवार ने उसे रोटी तो दूर पानी तक नहीं पूछा।
कैसा जमाना था। उनके पानी तक के लिए न पूछने पर मोहणा के मन में न जाने कितनी गालियां आईं और वह उसने सारी की सारी भीतर ही भीतर उड़ेल दीं।
मोहणा फिर धर्मशाला में आ गया। रात काटी और सुबह पौ फटने से पहले वापिस घर आ गया और फिर पचास मील चलकर आधी रात तक घर पहुंच गया।
बीस वर्षों बाद फिर एक दिन देश आजाद हो गया। राजवाड़ा शाही खत्म हो गई उसके सारे कारदार शक्तिहीन हो गए और इसके साथ ही जनता के अंतहीन शोषण की यह प्रथा भी। बुरे दिनों का दौर गुजर चुका था, पूरे देश ने जश्न मनाया। उस दिन उसने भी खूब जश्न मनाए।
उसके बाद वह बीस साल और जिंदा रहा। तब वह अपने व प्रजा के उस शोषण की और राजवाड़ा शाही के काले कानूनों की अंतहीन कहानियां चूल्हे पर बैठकर अपनी अगली पीढ़ी को सुनाता।
— अशोक दर्द
