राजनीति

हड़ताल — सुविधा मांगने का असुविधाजनक तरीका

मांग किसी की हो, कीमत अक्सर किसी और को चुकानी पड़ती है। बैंक कर्मचारियों की मांग हो तो बैंक बंद, बस मालिकों की हो तो परिवहन व्यवस्था ठप, ट्रक ऑपरेटरों की हो तो माल ढुलाई ठप, डॉक्टरों की हो तो अस्पतालों की रफ्तार धीमी और शिक्षकों की हो तो पढ़ाई प्रभावित। क्षेत्र अलग, समस्याएं अलग और संगठन अलग, लेकिन हड़ताल की पटकथा लगभग एक—चेतावनी, बंद, वार्ता, आश्वासन और फिर कुछ दिनों की शांति। फिर नया मुद्दा, नई चेतावनी और वही पुराना चक्र। इस सिलसिले का सबसे स्थायी किरदार वही है, जो न कर्मचारी है, न प्रबंधन और न नीति-निर्माता—आम आदमी, जो हर बार बिना मांग किए इसकी कीमत चुकाता है।

आठ लाख बैंक कर्मचारी पांच दिवसीय बैंकिंग सप्ताह, पीएलआई योजना की वापसी/संशोधन और पेंशन अपडेशन समेत अन्य लंबित मुद्दों की मांग को लेकर हड़ताल की चेतावनी दे रहे हैं। सवाल इन मांगों से ज्यादा उस व्यवस्था पर है, जो समाधान तक पहुंचने से पहले हड़ताल की स्थिति बना देती है। काम के घंटे, पारिश्रमिक, पेंशन और सेवा-शर्तें कर्मचारियों के महत्वपूर्ण मुद्दे हैं; इन पर बातचीत होना स्वाभाविक है। फिर समाधान हड़ताल तक क्यों पहुंचे? जब यूनियन और प्रबंधन के बीच संस्थागत संवाद का रास्ता मौजूद है, तो बैंक बंद करने की नौबत क्यों आए? और यदि मार्च 2024 में समझौता हो चुका था, तो उसकी अधिसूचना अब तक क्यों नहीं हुई? हर बार हड़ताल की तारीख नजदीक आने पर ही व्यवस्था क्यों जागती है?

हड़ताल की घोषणा कर्मचारी करते हैं, लेकिन उसकी तैयारी आम आदमी को करनी पड़ती है। खबर आते ही सलाह—जरूरी लेनदेन निपटा लें, नकदी निकाल लें, चेक जमा कर दें, पेंशन का काम करा लें। यानी व्यवस्था ठप होने का इंतजाम भी नागरिक करे! डिजिटल बैंकिंग बढ़ी है, पर भारत सिर्फ महानगरों की मोबाइल स्क्रीन नहीं। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में बैंक शाखा आज भी जरूरी है। पेंशनर को काउंटर चाहिए, छोटे व्यापारी को बैंकिंग व्यवस्था और लाखों लोगों के लिए हर काम ऐप से संभव नहीं। तीन दिन बैंक बंद रहना बड़े कारोबारी के लिए असुविधा हो सकता है, लेकिन बुजुर्ग की दवा, दुकानदार का भुगतान या परिवार की जरूरी रकम अटक जाए तो उसकी कीमत बड़ी होती है।

हड़ताल जहां काम रोकती है, वहीं उसका असर आम आदमी की जिंदगी रोक देता है। बस मालिक किराया बढ़ाने की मांग पर हड़ताल करें तो यात्री की राह और जेब, दोनों प्रभावित होते हैं। ट्रक ऑपरेटर लागत और टोल का मुद्दा उठाएं तो माल की आवाजाही रुकती है और कीमतें बढ़ती हैं। डॉक्टरों की हड़ताल में मरीज इंतजार करता है, बिजली कर्मचारियों के आंदोलन में घर-कारोबार प्रभावित होते हैं और शिक्षकों के आंदोलन में विद्यार्थियों का समय जाता है। हड़ताल खत्म होने पर वार्ता में मांगों का हिसाब होता है, लेकिन मरीज का इंतजार, मजदूरी का नुकसान, रुका कारोबार और बढ़ी कीमतों का हिसाब कहीं नहीं होता।

हड़ताल खत्म होते ही व्यवस्था ऐसे चल पड़ती है, मानो जनता की जिंदगी में कुछ रुका ही नहीं था। कुछ मांगें मान ली जाती हैं, कुछ समितियों के हवाले, कुछ आश्वासनों में और कुछ अगली बैठक की फाइल में चली जाती हैं। बैठकें होती हैं, बयान आते हैं और मामला शांत। लेकिन उन तीन दिनों का क्या, जब बैंक के चक्कर काटता नागरिक अपना काम नहीं करा सका? छोटे व्यापारी का अटका भुगतान, पेंशनर का टला काम, कर्मचारी की गई मजदूरी और मरीज का बिगड़ा इलाज—इनका हिसाब कौन देगा? न कोई मुआवजा, न जवाबदेही, न प्रतिपूरक व्यवस्था। जैसे आम आदमी की परेशानी कोई लागत ही नहीं, जिसे हर आंदोलन बेझिझक जनता के खाते में डाल दे।

बात हड़ताल का अधिकार छीनने की नहीं, उसे ऐसी व्यवस्था में बांधने की है जिसमें उसकी कीमत जनता न चुकाए। कर्मचारियों को अपनी मांग रखने और विरोध करने का अधिकार है, लेकिन अधिकार जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकता। बैंक हड़ताल पर हों तो न्यूनतम सेवाएं कैसे चलेंगी? सार्वजनिक परिवहन रुके तो वैकल्पिक व्यवस्था कौन करेगा? जरूरी सेवाएं प्रभावित हों तो नागरिकों के लिए आपात विकल्प क्या होंगे? और जब समझौता हो जाए, तो उसे लागू करने की समयसीमा क्यों न तय हो? सरकार, प्रबंधन और यूनियन यदि समयबद्ध बातचीत और फैसलों के लिए जवाबदेह हों, तो हड़ताल मजबूरी की आखिरी सीढ़ी बनेगी, हर मांग की पहली सीढ़ी नहीं।

हड़ताल अब आम आदमी के लिए खबर नहीं, पहले से जारी होने वाली चेतावनी बन गई है। बैंक हड़ताल की सूचना मिलते ही वह पैसे निकालने लगता है, बस हड़ताल की खबर आते ही दूसरा साधन खोजता है और ट्रकों की हड़ताल सुनते ही महंगा होने के डर से जरूरी सामान जुटाने लगता है। यानी नागरिक व्यवस्था से समाधान की उम्मीद छोड़, अव्यवस्था से बचने की तैयारी करने लगा है। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी? लोकतंत्र की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि हड़ताल के बाद कितनी मांगें मानी गईं; यह भी पूछा जाना चाहिए कि मांग और समाधान के बीच आम आदमी ने कितनी कीमत चुकाई।

मांगें बदलेंगी, हड़तालें आएंगी, पर सवाल वही रहेगा—हर संघर्ष की कीमत आम आदमी ही क्यों चुकाए? पांच दिवसीय बैंकिंग सप्ताह, पेंशन सुधार, वेतन वृद्धि या डीजल लागत—मांगें जायज हो सकती हैं, पर समाधान बातचीत, समयबद्ध फैसलों और जवाबदेही से होना चाहिए। हड़ताल जरूरी हो तो उसकी मार न्यूनतम रखने की जिम्मेदारी तय हो। वरना चक्र वही रहेगा—मांग, चेतावनी, हड़ताल, जनता की परेशानी, बैठक और आश्वासन; फिर नया मुद्दा। पोस्टर, नारे और मांगें बदलेंगी, लेकिन भुगतेगा वही—आम आदमी। हड़ताल की सफलता सिर्फ मांगें मनवाने में नहीं, उसकी कीमत जनता पर न पड़ने में है। विरोध का अधिकार जरूरी है, पर ऐसा विरोध किस काम का, जिसमें मांग सुनी जाए और जनता भुगते?

— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

प्रो. आरके जैन 'अरिजीत'

बड़वानी (मप्र)

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